भरथरी गायिका
: सुरूज बाई खाण्डे
हाथी रोवय हाथी सार मा , मोर रानी ये वो
महल मा रोवय मोर राजा रोवय दरबार मा
दरबारे मा भाई एदे जी।
सुरहिन गइया के गोबर, ए मँगाइके गा।
खुंटधर अंगना लिपाइके, मोतियन के ए ना।
मेर चउके ना, मोर घीये के दिया जलाइके।
ए जलाइके भाई ए दे जी........
सुन तो नारी मोर बाते ला
मोर बाते ला ओ, कातो जुवानी ए दिये हो।
भगवाने ह ओ, मोर करमे मा ना।
एदे का जोगनी मोला दिये हो, मोला दिये हो भाई ए दे जी...
बरजे बाते नइ तो मानथे
मोर भरथरी हा, हरके बाते नइ तो मानत हे।
घोड़ा के सवार चले जावत दीदी
ए दे मिरगा के पाछू कुदावत हो, कुदावत हो,
जब इन पंक्तियों के साथ राजा भरथरी की गाथा का गायन प्रारंभ होता है शरीर में झुरझुरी सी होने लगती है रोंगटे खड़े हो जाते हैं लगता है गाथा का आरंभ अगर इतना ही रोचक, आनंद दायक, अनुभूतिपरक है तो आगे न जाने क्या होगा ? कौन है जो इतने दर्द भरे स्वर में सुरों की पंक्तियों की माला पिरो रहा है ? और इन पंक्तियों को स्वर देने वाली साधिका का नाम है सुरूज बाई खाण्डे। सूरज को दीपक नहीं दिखाया जाता क्योंकि सूर्य तो स्वयं प्रकाश देकर संसार को जीने की राह दिखाता है। मगर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपनी उर्जस्विता से अपनी प्रतिभा की रोशनी से संसार में अपना और अपने परिवार का अपनी आने वाली पीढ़ी के नाम को प्रकाशवान बनाते हैं और ऐसे ही ओजस्वी कला सम्पन्न कलाकार प्रसिद्ध भरथरी गायिका का नाम है सुरूज बाई खाण्डे। आंचलिकधुन को अपने हृदय में समेटे लोक जीवन को समर्पित, मोहक, सुरीली, कर्णप्रिय, धुन से राजा भर्तृहरि के गाथा का गायन करने वाली सुमधुर कंठ की मलिका हैं-सुरूज बाई खाण्डे।
राजा भृर्तहरि जिसे छत्तीसगढ़ में भरथरी नाम उच्चारित किया जाता है, उनकी जीवनी का वर्णन, कि कैसे वे राजगद्दी पर बैठे फिर उनके संन्यास लेने की करूण कहानी को गाथा के रूप में प्रस्तुत करना यह सुरूज बाई ही कर सकती हैं। उनके गायन की प्रस्तुति का अंदाज ही सबसे अलग है। कोई भी कथा कहानी लोक गीत जब प्राचीन समय से चले आते हैं, तबवे परम्परा का स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं।
हाथों
में इकतारा लेकर कई-कई घण्टे की प्रस्तुति देना सहज बात नहीं है। अपने नाना की
परम्परा को उन्होंने जीवंत कर दिया। जब वे भरथरी का गायन करती हैं तो कथा के
प्रसंगों के उतार-चढ़ाव के साथ ही श्रोता उनके भावों के प्रवाह में बहता चला जाता
है। अवसर-अवसर की बात होती है और किस्मत की बात-पùविभूषण तीजन
बाई जी को भिलाई स्टील प्लांट ने सुअवसर प्रदान किया और उन्होंने देश ही नहीं
अपितु विदेशों में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर ख्याति अर्जित की। दोनों में कितनी
साम्यता है कि सुरूज बाई खाण्डे जी और तीजन बाई जी दोनों ने ही अपने-अपने नाना से
इस परम्परागत गाथाओं की विधा को सीखा।
वाचिक परंपरा को संजोकर उसे प्रस्तुत करने का काम बहुत कठिन है जिस तरह से हम अपनी संस्कृति को बचाए रखने के लिए पुरातत्व को बचाए रखने के लिए यत्न करते हैं संग्रहालयों का निर्माण, रख-रखाव पर ध्यान देते हैं उसी तरह लोक कला, लोक संस्कृति की रक्षा के लिए लोक कलाकारों का संरक्षण उनके व्यवस्थापन पर ध्यान देना शासन के लिए आवश्यक है। ये एक ऐसा विषय है जिस पर मेरी आलोचना हो सकती है किंतु कुछ जन्मजात कलाकार हमारी धरोहर हैं। इन्हें यूं ही धूप में जलने से,शीत में ठंड से, वर्षा में भीगने से बचाने का यत्न होना चाहिए। अपनी भाषा अपनी बोली में पूरी दुनिया के आगे अपनी प्राचीन कला से अवगत कराया अभाव और गरीबी से जूझती रही। उम्र के चौथे प्रहर में आकर जब इंसान अभाव झेलता है तो वह समय से पहले ही टूटकर बिखर जाता है।
यह
एक अतृप्त स्त्री की व्यथा है जिसे वे प्रस्तुति में तो व्यक्त नहीं करती किंतु जब
भी मैं उनसे मिली हूँ उनके भावों में दीनता परिलक्षित होती, मुझे
ऐसे आशा भरी निगाहों से देखती मानो मैं ही पùश्री हूँ।
मुझे उनकी आंखों में एक प्यास दिखाई देती। पीड़ा भरी प्यास, जीवन भर की
साधना के प्रतिफल की प्यास। यह एक कटु सत्य है कि जब सुरूज बाई ने गायन सीखना
प्रारंभ किया वह उनके लिए एक गुरूकुल के समान था, वे नहीं
जानती थी कि उन्हें आगे चलकर किसी सम्मान के लिए प्रस्तुति देनी है। किन्तु उनके
मन की ललक,
कुछ नया कुछ अच्छा करने की ललक, लोक कला के प्रति उनका झुकाव यह मात्र शौक नहीं था ना ही
पैसा कमाने का जरिया था। जब उनसे साक्षात्कार के लिए मैं उनके एस.ई.सी.एल. के
निवास में पहुँची थी तब उन्हांने मुझे बताया था कि उनके गांव में भी रहस का आयोजन
किया जाता था साल में एक बार तब मैं रहस देखने जाया करती थी। रहस के कलाकारों की
बेबाक और खूबसूरत प्रस्तुति से मेरा भी लोक के प्रति झुकाव हुआ और मेरे नाना तो
लोक गायक थे ही सो मैंने उनसे ही लोक की समस्त विधाएँ ददरिया, करमा, लोक
गीत और राजा भर्तृहरि की गाथा भरथरी, चंदैनी, ढोला
मारू इत्यादि जो उन्हें कंठस्थ थी उन्हें आत्मसात किया।
आपका कहना था कि वरिष्ठ लोक कलाकार होने के नाते मुझे भी यह सम्मान मिलना चाहिए था किंतु शासन के मापदंड का मुझे पता नहीं। पद, प्रतिष्ठा, पहुँच, नेतागिरी वालों को ही बड़ा सम्मान दिया जाता है और अब तो छत्तीसगढ़ में यह सामान्य बात हो गई है। उनका दुख जायज है। सुरूज बाई जी ने किसी सम्मान के लालच में इस क्षेत्र को नहीं चुना था अपितु कुछ लोगों के सम्मान होने से सम्मान स्वयं सम्मानित होता है। वे तो एक निर्बाध नदी की तरह थीं जो सदा अविरल बहती थी किसी परिस्थिति देशकाल की परवाह किये बिना अपनी भाव धारा में और इसमें साथ देते थे उनके स्वयं के पति श्री लखन खाण्डे जी। लखन खाण्डे जी भी एस.ई.सी.एल. में ही नौकरी करते थे। अच्छे कलाकारों के साथ कुछ दुर्भाग्य भी होता है। सुरूज बाई जी ने दुर्घटना की वजह से नौ साल पहले ही रिटायमेंट ले लिया था।
रूस, दुसाम्बे आदि 18 देशों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी देश भर में अपनी प्रस्तुति से सबका मन मोह लेने वाली सुरूज बाई खाण्डे एसईसीएल में बतौर कलाकार चतुर्थ वर्ग कर्मचारी की हैसियत से रिटायरमेंट होने तक अधिकारियों को पानी पिलाने का काम करती रहीं। वर्षों पूर्व मध्यप्रदेश के देवी अहिल्या सम्मान के अलावा अन्य कई सम्मानों से सम्मानित सुरूज बाई को हमेशा से यह मलाल रहा है कि 50 वर्षों से अधिक समय तक अपनी लोक कला के माध्यम से प्रदेश ही नहीं अपितु देश का नाम रौशन करने के बाद भी क्या मुझे पùश्री लिए बिना ही इस दुनिया से विदा लेना होगा। आगे वे कहती हैं अपनी कला और मंच को मैं छोड़ नहीं सकती कला ही मेरी ऊर्जा है और कला ही मेरा जीवन।
दरअसल छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी साहित्य को सामर्थ्यवान बनाने में लोक कलाकारों का योगदान अतुलनीय है। इन्होंने देश में ही नहीं अपितु विदेशों में भी छत्तीसगढ़ी भाषा में अपनी मौखिक कला का प्रदर्शन कर स्वयं तो ख्याति अर्जित की साथ ही भाषा को भी समृद्ध किया, एवं विश्व में छत्तीसगढ़ प्रदेश को सम्मानजनक नाम दिलाया।
प्रदेश का गौरव बढ़ाने वाली देश के कई स्थानों में रायपुर, भोपाल, दिल्ली, महाराष्ट्र, ओड़िसा, इंदौर आदि कई शहरों और राज्यों में अपनी प्रस्तुति से प्रभावित करने के बाद लगभग 18 देशों में कला का प्रदर्शन कर ख्याति अर्जित करने वाली सुरूज बाई खाण्डे, पùविभूषण डॉ. तीजन बाई सहित समकालीन स्व. देवदास बंजारे एवं अन्य वरिष्ठ लोक कलाकारों के साथ अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी हैं छत्तीसगढ़ के कला मर्मज्ञ और संस्कृति विभाग सभी को ज्ञात है कि सुरूज बाई खाण्डे को वर्षों पूर्व ही पùश्री मिल जाना चाहिए था। मृत्यु के अंतिम क्षणों तक वे इसी आस में थी कि उनके शव को भी तिरंगा में लपेट कर विदा किया जाय किंतु पùश्री की, तिरंगे की उनकी आस अधूरी ही रह गई और छत्तीसगढ़ महतारी की यह होनहार लोक गायिका के जीवन का सूरज भी अस्त हो गया। आज भी सतनामी समाज और सतनामी धर्म परिषद प्रयासरत है कि मृत्युपरांत भी उनके नाम के आगे सम्मानजनक पùश्री जुड़ जाए।
किंतु क्या उनका नाम या उनकी कला कभी अस्त हो पाएगी? नहीं! कलाकार भले ही मरते हों किंतु उनकी कला कभी मरती नहीं। उसी तरह जब तक मानव जीवन है सुरूज बाई जी की कला यानि भरथरी और सुरूज बाई एक दूसरे के पूरक बनकर साहित्याकाश में सदा के लिए चमकते रहेंगे धु्रवतारे की तरह।
संदर्भ-1-साक्षात्कार
–बिलासपुर निवास से लिया था
2-नारी का
संबल ,
3-गूगल से

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