6-07-2026 कही अनकही में प्रकाशित ----
Wednesday, August 5, 2026
Saturday, August 1, 2026
एक भाषा के मरने पर एक संस्कृति का क्षरण हो जाता है –सन्दर्भ हल्बी-शकुंतला तरार
जय माँ दंतेश्वरी
-1-एक भाषा के मरने पर एक संस्कृति का क्षरण हो जाता है –सन्दर्भ
हल्बी
30-07-2026 -कही अनकही में छप चुका है
किसी भी अंचल के विकास का मापदंड वहाँ की कला, साहित्य और सांस्कृतिक उत्कर्ष पर अवलंबित होता है । हमारा
यह जो छत्तीसगढ़ अंचल है ना यहाँ की धानी धरती अपने गर्भ में अकूत नैसर्गिक
सम्पदा और वैभव छिपाये हुए है तो लोक कलाओं ,लोक संस्कृति, लोक साहित्य, परम्पराओं
का अक्षय भण्डार भरा होने का गौरव भी इसे विरासत में मिला है |
अपने सांस्कृतिक वैभव पुरातात्विक धरोहरों एवं भौगोलिक
विशेषताओं के कारण सम्पूर्ण विश्व में अपनी अलग पहचान रखता है छत्तीसगढ़ अंचल का यह
बस्तर संभाग | सामजिक रहन-सहन, पूजा पद्धति, संस्कार परम्पराओं के कारण इसका अलग
ही आकर्षण है | यह एशिया महाद्वीप का सबसे बड़ा ‘’आदिवासी’’ अंचल है |
यहाँ निवास करने वाले मुरिया, माड़िया, अबूझमाड़िया, दण्डामी माड़िया, हल्बा, भतरा, धुरवा, गदबा, गोंड, दोरला
जनजातियों के साथ ही, अन्य पिछड़ी जातियों में कोष्टा, कलार, धाकड़, पनारा, राउत, केंवट, कुम्हार, घसिया, पनका, लोहार, गाँडा, माहरा इत्यादि यहाँ की मूलतः
निवास करने वाली जातियाँ हैं | बस्तर से बाहर के लोगों को यदि छोड़ दें तो सभी जातियों-जनजातियों के रहन-सहन, खान –पान लगभग एक जैसे ही हैं |
रही बात सीमावर्ती भाषाओं में हल्बी के स्थान की तो, पूर्व में उड़ीसा, दक्षिण में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना , पश्चिम में महाराष्ट्र से लगे
होने के करण यहाँ आपको ओड़िया संस्कृति, तेलुगु
संस्कृति एवं मराठी संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है | ओडिया भाषा के संपर्क संसर्ग से भतरी लोक भाषा विकसित
हुई और साथ ही बामनी बोली भी | दक्षिण में आंध्र व तेलंगाना के
राज्य के संपर्क से गोंडी ,दोरली, माड़ी लोक
भाषा का विकास हुआ | हल्बी लोक भाषा में ओड़िया, मराठी
और संस्कृत का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है | आप यदि
भोपालपट्टनम , बीजापुर की तरफ जाएँगे तो हल्बी के साथ ही गोंडी लोक भाषा बोलने वालों
की संख्या ज्यादा पाएँगे |
यहाँ व्यवहृत बोलियों में प्रमुख रूप से हल्बी , गोंडी, माड़िया, बस्तरी, धुरवा, भतरी के अलावा अनेक जातिगत लोक
भाषा, बोलियाँ भी व्यवहार में लाई जाती हैं | किन्तु “हल्बी” बस्तर की प्रमुख संपर्क लोक भाषा है अब छत्तीसगढ़ी भी
बोली जाने लगी है |
डब्ल्यू ए ग्रियर्सन ने 1936 में लिखा है कि बस्तर में उनकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से
हुई जो बस्तर की 36 बोलियाँ
जानता था। आज वे सभी बोलियाँ कहाँ गईं, किसी को नहीं पता। अगर बस्तर की लोक भाषा , बोलियों की ऐसे ही उपेक्षा होती रही तो ये भी कब विलुप्त हो
जाएँगी, पता भी नहीं चलेगा।
हल्बी बस्तर क्षेत्र में बहुतायत से निवास करने वाले हल्बा
लोगों की मुख्य भाषा है। यह एक आर्य बोली है एवं भाषा शास्त्री इसे पूर्व हिन्दी
भाषा के अंतर्गत रखते हैं । मुझे याद है पति की नौकरी के दौरान मेरे पड़ोस में एक
रीवाँ निवासी रहते थे जब कपड़ों की गंदगी की बात करते तो कहते एत्तो रोंगट एत्तो
रोंगट इसी को हल्बी में हम कहेंगे इतरो रोंगट रली या खूबे रोंगट होलिसे | अर्थात भाषा बोलियाँ एक दूसरे प्रान्त से इतनी गुम्फित हैं
कि विद्वान यह दबाव नहीं डाल सकते कि हल्बी लोक भाषा इस भाषा का अपभ्रंश है या इस
भाषा से बनी है | किन्तु हल्बी लोक भाषा का स्वतन्त्र अस्तित्व था, है और रहेगा |
हल्बी की उत्पत्ति हल्बा लोगों की उत्पत्ति से जुड़ी
हुई है। हल्बी एक संपर्क भाषा के रूप में विकसित हुई है | इसमें
संस्कृत, हिन्दी, मराठी,अवधी, छत्तीसगढ़ी, फारसी इत्यादि भाषा के शब्दों
का समावेश है। छिंदक नागवंशी राजाओं के शासन काल से ही हल्बा बस्तर क्षेत्र में
निवास किया करते थे आज भी वे अपने को नागवंश का ही मानते हैं । काकतीय नरेशों के
शासन काल में हल्बा जनजाति विश्वसनीय सैनिकों का कार्य किया करते थे।
अतः इस सम्बन्ध में मेरा मानना है कि ---- किसी भी भाषा में लोक तत्वों का समावेश होना
जरूरी है। “जब तक जंगल है गाँव है, जब तक गाँव है तब तक लोक है ,जब तक लोक है तब तक गाँव है ”वहीँ“ जब तक गाँव है तब तक भाषा है, जब तक भाषा है संस्कृति जिंदा रहेगी” | यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि एक भाषा के
मरने पर एक संस्कृति का क्षरण हो जाता है | बिना संस्कृति, बिना लोक दिग्दर्शन के भाषाई
सौंदर्य का दर्शन कठिन है।
रूप और सुगंध से रहित फूल- प्रो कोलाकालूरी ENOCH-अनुवाद-शकुंतला तरार
रूप और सुगंध से रहित फूल
प्रो कोलाकालूरी ENOCH
पूर्व
कुलपति
(Vice-Chancellor): तिरुपति स्थित प्रसिद्ध
श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय
श्री कृष्णदेवराय विश्वविद्यालय (SK University) के पूर्व
प्रिंसिपल, यूजीसी (UGC) के मानद प्रोफेसर और नई
दिल्ली साहित्य अकादमी के 'राइटर इन रेजीडेंस' अनंतपुर
प्रो. कोलाकालूरी एनोच जिन्होंने अपनी तेलुगु से हिंदी अनुवाद की कविता मुझे हल्बी में अनुवाद करने को दिया था
हिंदी से हल्बी अनुवाद
अनुवादक :- शकुंतला तरार -
-1-
भारत फूलों का इंद्रधनुष है लेकिन
इसकी सुगंध मुझसे दूर रहती है।
भारत में दिव्य रोटी, पेय और घर का आनंद मिलता है, लेकिन यह
मेरी भूख, प्यास और आश्रय को करने में विफल रहता है।
मैं आपकी सहानुभूति के लिए तरसता
रहा लेकिन आपने मुझे बहिष्कृत
कहने के लिए हाशिये पर,
किनारे पर धकेल दिया है
“रूप आरू खुसबू बिगर फूल”
भारत फूलमन चो इंदरधनऊ आय मांतर
एचो मंगमंगासी मचो ले लाफी रहेसे
भारत ने नंगत रोटी, पिवतो जिनिस आरू घरे रतो चो हरिक मिरेसे , मांतर ए
मचो भूक, पियास आरू रतो चो कुड़िया
के
बनाऊक नी सके |
मयं तुमचो लाड़ काजे अफारते रलें
मांतर तुमी मके घुचातो काजे
बलले कठा, कठा
ढेकलुन दिलास
मुझे आपके घर में प्यार के फल की आशा
थी
परन्तु तूने मुझे एकान्त में कैद कर रखा
है।
इस अलगाव के बच्चे का पिता कौन है?
और अस्पृश्यता?
एक सामाजिक धोखाधड़ी?
एक सामाजिक धोखाधड़ी?
एक राष्ट्रीय त्रासदी?
एक मानवीय शर्म?
मके तुमचो घरे मया चो पाक फर चो आस
रली
मांतर तुमी मके एकलाय बंधन करून
राखलास |
ए अलगालो पिला चो बाप कोन आय ?
आरू छियालाता ?
आरू समाज ने धोका देतोर ?
गोटोक राष्ट्रीय बिपति ?
गोटोक मनुख होतो चो लाज ?
छुआछूत के जन्म पर देवता
चुप रहे हैं, लेकिन मनुष्य
मुखर रहे हैं। अगर यह असत्य नहीं
होता तो ब्रह्मा को अपनी
दुकान बंद कर देनी चाहिए थी।
क्या आपने उत्पीड़न
शापित अस्पृश्यता
और वंचना,
पीड़ादायक अलगाव
और निंदा से
उत्पन्न अत्याधिक पीड़ा का एहसास किया
है?
छियालाता चो जनम होलो ने देव धामी
ओगाय रला , मान्तर मनुख
गोठियालासत | जे ए असत नी
होती जाले बरमा के आपलो
दुकान के बंद करतो रली
काय तुमी डंड
सरापलो छियालाता
आरू ठगा धंदा,
ने होतोर दुःख पीरा
अलग करतो चो डंड आरू निंदा
ने जनमलो खूबे दुःख के समंझलासाहास ?
सदियों से भारत पर या
तो विदेशियों ने लूटपाट करने
के लिए शासन किया या भारतीयों ने
कमजोर और नम्र लोगों को अपमानित
करने, बांटने और राज करने
के लिए शासन किया। उन्होंने कभी भी भारत
को मानवीय नहीं बनाया, कभी भी भारतीयों
को सम्मान नहीं दिया।
कितरोय सौ बरख चो भारत ने
जे बिदेसी मन लूटपाट करतो
काजे सासन करला नाहाले भारत चो मनुख मन के
कमजोर आरू सोज मनुख के टेचराउन
बाटतो आरू राज करतो
काजे सासन करला | हुनमन केभय बले भारत
के मनुख रतो बरन नी बनाला , कभी बले भारतीय मन के
मान नी दिला |
इस समृद्ध, उपजाऊ मिट्टी पर
अस्पृश्यता बेरोकटोक पनपती रही।
मानवता शर्मसार!
कौन पूर्ववत करेगा
अमानवीयकरण का ऐतिहासिक दोष?
हमें मालूम था
हमारे पूर्वजों ने समाज को विभाजित किया
और मानवता को दूर किया
क्या यह हमारा कर्तव्य नहीं है कि हम
गलत को सुधारें,
मानवता को अपनाएं,
ए समरत , उबजातोर माटी ने
छुआछूत बिन बाधा चो पोडराउन गेली |
मनुख जीवना लाज ने मरे
कोन लेताय बरन चो करे
मनुख नी होतोर चो लेताय जुग चो दोस ?
हामी जानते रलूँ
आमचो सियानमन समाज के बाटून दिला आरू
मनुख जीवना के लाफी करला
काय ए आमचो कर्तब्य नुहाय कि आमी गलती के सुधारुंदे
मनुख जीवना के आपलो बनावा |
-4-
भविष्य को उज्ज्वल करने के लिए?
एकजुट होकर हम बचे
भविष्य को उज्ज्वल करने के लिए?
एकजुट होकर हम जीवित रहेंगे,
विभाजित होकर हम नष्ट हो जाएंगे
जीवित रहने
के लिए "भारतीय जातियों को नष्ट
करो और भारतीय धन वितरित करो।"
यदि ऐसा
नहीं हुआ तो परेशानियां
और अशांति बनी रहेगी।
भविस के उजर करतो काजे ?
संगे जुहुन आमी बाचूँ
भविस के उजर करतो काजे ?
संगे जुहुन आमी जीवते रहूँदे,
बाटा होउन आमी नसट होउन जाऊँदे
जीवना रतो काजे
“भारत चो जातमन के नसट
करा आरू भारत चो धन के बाटून दिहा |”
जे असन
नी होली जाले परिसानी
आरू असान्ति बनू रहेदे |
पीड़ितों और पीड़ितों
के गठबंधन से सावधान रहें!
एक बार आग लग जाने पर, यदि
उसे बुझाया न जाए तो वह
पूरे कपड़े को अपनी चपेट में ले लेती
है।
दुखी मनुख आरू दुखी मन
चो गठजोड़ा ले साचेत राहा !
एक हार आईग बरून गेले, जे
हुनके नी बुताले हुन
जमाय कपड़ा के जराउन दयेसे |
भारत इंद्रधनुष के फूलों के असंख्य गुच्छों
की माला है।
यदि फूलों के गुच्छे बिखर कर बिखर जाएं
और अनेक राष्ट्र उभर आएं,
जो हमारे अस्तित्व को सदैव के लिए चुनौती
दे देंगे।
प्रिय बहनों और भाइयों
आने वाले खतरे से सावधान रहें
इसका इलाज प्यार में है
"भारतीयों को खुशी से जीने के लिए
प्यार करो।"
भारत विभिन्न रंगों के पुष्प-गुच्छों
का समूह है।
अनंत आनंद की प्रचुर सुगंध
का आनंद लें।
भारत इंदरधनऊ फूलमन चो खूबे असन गोछा
आय |
जे फूलमन चो गोछा बिखरून-बिखरून
जायदे आरू कितरोय देस ऊपरे एवत,
जे आमचो अस्तित्व के सदा काजे
ललकारून देदे
लाडरी बईन मन आरू भाई मन
एतो बीती खतरा ले हुसियार राहा
एचो इलाज मया ने आसे
"भारतीय मन के हरीक ने जीवतो
काजे मया करा |”
भारत अलग-अलग रंग चो फूल चो गोछा
चो गोहड़ी आय |
खूबे हरीक उदीम चो मंगमंगासी
चो खुसी मनावाँ |
हिंदी से हल्बी अनुवाद ----शकुंतला
तरार
प्लाट नं-32, सेक्टर-2, एकता नगर,
गुढ़ियारी, रायपुर (छ.ग.)पिन-492009
