Friday, May 15, 2026

राजमाता सुवर्ण कुमारी (सुबरन कुँवर) स्वतंत्रता सेनानी--------शकुंतला तरार- 15-05-2026

 

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  राजमाता सुवर्ण कुमारी (सुबरन कुँवर) स्वतंत्रता सेनानी

             बस्तर का इतिहास रानी सुवर्ण कुमारी के अदम्य साहस, वीरता, त्याग, अंग्रेजों के साथ जूझने की अदम्य जीजिविषा, भूमकाल की उद्घोषणा के साथ ही आटविक युद्ध के आगाज की घोषणा के लिए सदैव स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।

अंग्रेजों के जुल्म से समूचा भारत त्राहि-त्राहि कर उठा था। इसका असर सुदूर अंचल बस्तर पर भी पड़ा था। 1854 में बस्तर का शासन पूरी तरह से अंग्रेजों के अधीन हो गया। इस तरह से अंग्रेजों के द्वारा सत्ता में दखल से राजा भैरमदेव और दीवान दलगंजन सिंह सहित बस्तर की जनता भी अप्रसन्न थी। अंग्रेजों की नीतियाँ लगातार बस्तर के शोषण की रही थी।

राजा भैरम देव की रानी राजमाता रानी सुवर्ण कुमारी देवी भूमकाल के विप्लव की प्रमुख सूत्रधार थीं। सीलपरा जमींदार के उत्तम कुल के क्षत्रिय (रीवां, बघेल खण्ड) को बस्तर लाकर उनकी दो कन्याओं से श्रीमान पण्डित लोकनाथ ठाकुर राजगुरु ने महाराज का विवाह करवाया था।   सुवर्ण कुमारी ही बड़ी महारानी के रूप में प्रतिष्ठापित हुई।  

यह वह दौर था जब राज घराने की प्रत्येक गतिविधियों पर अंग्रेजों की नजर रहती थी फिर भी रानी ने अंग्रेजों के विरूद्ध संगठित हो रहे विद्रोहियों का न केवल साथ दिया अपितु अपने ओजस्वी भाषणों से विद्रोहियों में जोश और साहस का संचार करती थी।

रानी सुवर्ण कुमारी ने ही सर्वप्रथम अंतागढ़ के तोड़ोकी में सभा को संबोधित करते हुए मुरिया राज की स्थापना का शंखनाद किया जिससे उपस्थित जन समूह में आजादी के लिए ब्रिटिशशासन के खिलाफ विद्रोह का स्वर मुखरित हुआ।

लाल कालेन्द्र के साथ मिलकर रानी ने प्रतीकों का विस्तार किया। रूद्रप्रताप देव 1903 में बालिग हो चुके थे किंतु टालमटोल करते हुए ब्रिटिश प्रशासन ने उन्हें 1908 में विधिवत राजा घोषित किया।     किंतु सुवर्ण कुमारी और लाल कालेन्द्र सिंह उनकी इस चाल को समझ गए थे। उनकी यह लड़ाई बस्तर के हित के लिए थी, बस्तर की जनता के लिए, बस्तर के लोगों के आत्म सम्मान की रक्षा के लिए, बेटियों को शोषण से बचाने के लिए, जनता के नर संहार को बचाने के लिए और अंग्रेज मुक्त बस्तर करने के लिए थी। वे जानती थीं सामने ब्रिटिश सेना गोला, बारूद बंदूक से तैयार है और उनके राज्य के वीरों के पास मात्र तीर, कमान और भाला का ही अस्त्र है फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी एक महिला होकर भी अदम्य साहस का परिचय देते हुए डटी रहीं।

 अक्टूबर 1909 में दशहरे के दिन राजमाता सुबरन कुँवर ने लाल कालेन्द्र सिंह, अंग्रेजों द्वारा निकाले गए भूतपूर्व सभासदों तथा हजारों आदिवासियों को तोड़ोकी में संबोधित किया और उन्होंने याद दिलाया उन्हें कि 1876 में वे किस प्रकार ब्रिटिश कुशासन के विरूद्ध एकजुट होकर उठ खड़े हुए थे और ब्रिटिशशासन को अंत में उनकी बात माननी पड़ी थी।

 रानी सुबरन कुँवर ने पुनः उपस्थित जनता को उत्साहित करते हुए कहा कि ‘‘आप लोग अंग्रेजों द्वारा नियुक्त दीवान के खिलाफ तत्काल संघर्ष छेड़ दें। उन कर्मचारियों को निकाल बाहर फेंकें जो बस्तर के दुश्मन हैं और बस्तर को घुन के समान चाट रहे हैं। इन आततायी कर्मचारियों के संरक्षक अंग्रेजी-राज को नेस्तनाबूत कर दें।

  राजमाता सुबरन कुँवर के उक्त उद्बोधन से जनता में उत्साह और जोश की लहर दौड़ गई। रानी के ही सुझाव से तब लाल कालेन्द्र सिंह ने गुण्डाधुर को उपस्थित समस्त जन समुदाय के आगे उस महान भूमकाल का प्रमुख नेता चुना तथा परगने के अनुसार परगना स्तर पर नेताओं का चयन किया, जिसकी घोषणा उसीमंच से राजमाता सुबरन कुँवर ने की।

            6 फरवरी 1910 को राजमाता सुबरन कुँवर ने अपने अनुयाइयों को आदेश दिया कि पंडा बैजनाथ जहाँ भी हो उसे पकड़कर उसके सम्मुख लाएँ। ताकि वह उसे राजद्रोह के आरोप में सजा दे।

            7 फरवरी को रानी ने एक गुप्त सभा किया जिसमें गुण्डाधुर के साथ ही हिड़मा पेडा, रोंडा पेडा, कोरिया माझी, धनीराम सुकरू, भेड़िया, महादेव हुन्तान उर्फ हुंगा तथा कुराटी सोमा थे, के समक्ष उन्होंने उद्घोषणा की कि अब बस्तर से ब्रिटिश राज समाप्त हो गया है तथा आज हम पुनः मुरियाराज की स्थापना पर संकल्प लेते हैं। इसका असर समस्त राज पर पड़ा और 7 फरवरी को गीदम को इन विद्राहियों ने अपने कब्जे में ले लिया और तय हुआ कि अब धीरे-धीरे सम्पूर्ण बस्तर से सभी कस्बों पर अधिकार करेंगे। अंग्रेजों के खिलाफ एक महिला का निरंतर विद्रोहियों को संघर्ष के लिए प्रेरित करते रहना अद्भुत साहस का कार्य था।

              आदिवासियों द्वारा लगातार संघर्ष के पश्चात जब भूमकाल का पराभव हुआ। 5 मार्च को अंग्रेजों ने छापेमारी करके रानी सुबरन कुँवर को गिरफ्तार कर उन्हें महल में लाकर नजरबंद कर दिया। बाद में राजमाता सुबरन कुंअर को रायपुर भेज दिया गया जहाँ अक्टूबर 1910 में उनकी मृत्यु हो गई।

     इस तरह बस्तर के इतिहास में कई ऐसी महिला नेत्रियाँ हुईं जिन्होंने बस्तर के लिए, आदिवासी हितों के लिए, अपने राज्य की खुशहाली के लिए अपने प्राणों की भी परवाह न करते हुए संघर्ष कर अपना बलिदान किया। धन्य है उनमें से राजमाता सुबरन कुँवर वे इतिहास में सदैव अमर रहेंगी।

Sunday, March 22, 2026

भरथरी गायिका : सुरूज बाई खाण्डे-शकुंतला तरार

 

भरथरी गायिका : सुरूज बाई खाण्डे


घोड़ा रोवय घोड़सार माघोड़सारे मा वो

हाथी रोवय हाथी सार मामोर रानी ये वो

महल मा रोवयमोर राजा रोवय दरबार मा

दरबारे मा  भाई एदे जी।

सुरहिन गइया के गोबर, ए मँगाइके गा।

खुंटधर अंगना लिपाइके, मोतियन के ए ना।

मेर चउके ना, मोर घीये के दिया जलाइके।

ए जलाइके भाई ए दे जी........

सुन तो नारी मोर बाते ला

मोर बाते ला ओ, कातो जुवानी ए दिये हो।

भगवाने ह ओ, मोर करमे मा ना।

एदे का जोगनी मोला दिये हो,

मोला दिये हो भाई ए दे जी...

बरजे बाते नइ तो मानथे

मोर भरथरी हा, हरके बाते नइ तो मानत हे।

घोड़ा के सवार चले जावत दीदी

ए दे मिरगा के पाछू कुदावत हो, कुदावत हो,

भाई ए दे जी............।


 जब इन पंक्तियों के साथ राजा भरथरी की गाथा का गायन प्रारंभ होता है शरीर में झुरझुरी सी होने लगती है रोंगटे खड़े हो जाते हैं लगता है गाथा का आरंभ अगर इतना ही रोचक, आनंद दायक, अनुभूतिपरक है तो आगे न जाने क्या होगा ? कौन है जो इतने दर्द भरे स्वर में सुरों की पंक्तियों की माला पिरो रहा है ? और इन पंक्तियों को स्वर देने वाली साधिका का नाम है सुरूज बाई खाण्डे। सूरज को दीपक नहीं दिखाया जाता क्योंकि सूर्य तो स्वयं प्रकाश देकर संसार को जीने की राह दिखाता है। मगर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपनी उर्जस्विता से अपनी प्रतिभा की रोशनी से संसार में अपना और अपने परिवार का अपनी आने वाली पीढ़ी के नाम को प्रकाशवान बनाते हैं और ऐसे ही ओजस्वी कला सम्पन्न कलाकार प्रसिद्ध भरथरी गायिका का नाम है सुरूज बाई खाण्डे। आंचलिकधुन को अपने हृदय में समेटे लोक जीवन को समर्पित, मोहक, सुरीली, कर्णप्रिय, धुन से राजा भर्तृहरि के गाथा का गायन करने वाली सुमधुर कंठ की मलिका हैं-सुरूज बाई खाण्डे।

     राजा भृर्तहरि जिसे छत्तीसगढ़ में भरथरी नाम उच्चारित किया जाता है, उनकी जीवनी का वर्णन, कि कैसे वे राजगद्दी पर बैठे फिर उनके संन्यास लेने की करूण कहानी को गाथा के रूप में प्रस्तुत करना यह सुरूज बाई ही कर सकती हैं। उनके गायन की प्रस्तुति का अंदाज ही सबसे अलग है। कोई भी कथा कहानी लोक गीत जब प्राचीन समय से चले आते हैं, तबवे परम्परा का स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं।

     हाथों में इकतारा लेकर कई-कई घण्टे की प्रस्तुति देना सहज बात नहीं है। अपने नाना की परम्परा को उन्होंने जीवंत कर दिया। जब वे भरथरी का गायन करती हैं तो कथा के प्रसंगों के उतार-चढ़ाव के साथ ही श्रोता उनके भावों के प्रवाह में बहता चला जाता है। अवसर-अवसर की बात होती है और किस्मत की बात-पùविभूषण तीजन बाई जी को भिलाई स्टील प्लांट ने सुअवसर प्रदान किया और उन्होंने देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर ख्याति अर्जित की। दोनों में कितनी साम्यता है कि सुरूज बाई खाण्डे जी और तीजन बाई जी दोनों ने ही अपने-अपने नाना से इस परम्परागत गाथाओं की विधा को सीखा।

     उज्जयिनी नगरी जो आज भी प्रसिद्ध है महाराजा विक्रमादित्य की नगरी के नाम से, महाकवि कालिदास के नाम से, महाकुंभ के नाम से, भगवान महाकालेश्वर के नाम से और प्रसिद्ध है उज्जैन, राजा भर्तृहरि के नाम से।

 

उज्जैन के उन्हीं राजा भर्तृहरि की जीवन यात्रा को गाथा के रूप में गाए जाने की परम्परा न जाने कब से चली आ रही है किंतु इस परम्परा को आत्मसात करने वाली सुरूज बाई खाण्डे एक पर्याय के रूप में जानी जाती हैं। भरथरी यानि सुरूज बाई और सुरूज बाई यानि भरथरी।

     सुरूज बाई से जब मैंने इस बाबत कुछ वर्षों पूर्व साक्षात्कार किया था तो उन्होंने बताया था कि उनके गांव में जब रहस (कृष्ण लीला) का मंचन होता था तो उन्हें भी लगता काश मैं भी इसमें अपनी सहभागिता दे पाती किंतु उस वक्त नाटकों में पुरुष पात्र ही स्त्री पात्र की भूमिका निभाया करते थे। अर्थात् बाल्यावस्था में ही मन के अंदर जो हलचल पैदा हुई कुछ करने की चाह थी, इसी ललक ने ही उसे भरथरी गायन सीखने का रूझान पैदा किया।

     सुरूज बाई हमेशा सूरज की तरह दैदिप्यमान रही। जहाँ-जहाँ पùभूषण तीजन बाई जी का नाम लिया जाता है वहाँ सुरूज बाई को लोग अवश्य याद रखते हैं। आज भरथरी के गाथा गायन करने वाले कलाकार यद्यपि अभी भी सिर्फ उंगलियों में गिने जा सकने लायक भर हैं तथापि 80, 90 के दशक में हमारे सम्मुख सिर्फ एक ही नाम उभरकर आता है और वह नाम है सुरूज बाई खाण्डे। विडम्बना देखिए कि हमारे बीच इतने मूर्धन्य महान कलाकर होते हैं और हम उनकी कला का सम्मान करने का दिखावा करते हैं लेकिन जो नींव डालकर ये कलाकार जाते हैं वे हमारी धरोहर के रूप में होते हैं। उनकी महानता को सभी जानते हैं उनके आगे नत मस्तक भी होते हैं किंतु राजाश्रय के बिना उनका सही-सही मूल्यांकन नहीं हो पाता। उनकी कला की सराहना तो होती है किंतु व्यक्ति की, कलाकार की उपेक्षा की जाती है। वैसे ही सुरूज बाई के साथ भी हुआ। इतनी मूर्धन्य कलाकार जिसने अपने बचपन को, बालपन को समर्पित कर दिया लोक के लिए, बच्चों के साथ फुगड़ी खेलने की उम्र में वह हाथ में चिकारा लिए नाना के संग राजा भर्तृहरि की पावन गाथा, जिसे हम छत्तीसगढ़ में भरथरी के रूप में जानते हैं, के जीवन का विशद वर्णन है, 7 वर्ष  की उम्र से बाल्यावस्था में ही अपने नाना स्व. रामसाय घृतलहरे से मौखिक परम्परा के तहत भरथरी गायन सीखना शुरू किया और बहुत जल्द कंठस्थ भी कर लिया।

              ऐसा नहीं है कि उनके साथ कोई मजबूरी थी सीखने की! या उन्हें अर्थार्जन करना था। नहीं बल्कि लोक के प्रति झुकाव, सीखने की जिज्ञासा ने सुरूज बाई को वह दिव्यता प्रदान की जिसके लिए अच्छे से अच्छे गुणी, ज्ञानी, संत-महात्मा सारा जीवन खपा देते हैं। किंतु यह सौभाग्य तो सौभाग्यशालियों को ही प्राप्त होता है।

     आध्यात्मिक लोक नायक के रूप में प्रतिष्ठित राजा भर्तृहरि के जीवनवृत्त उनकी त्यागमूर्ति छवि, उनके उपदेशों, उनके पत्नी को माता रूप प्रदान करने की उदारता का नाम है भरथरी। अपना वैभव, अपना राजपाट, अपना सुख सब कुछ तो त्यागा उन्होंने। राजा-महाराजाओं के बारे में हम हमेशा सुनते आए हैं कि किस राजा ने कितनी शादियाँ की। किसी ने संतान न होने पर, किसी ने पराजित राजा-महाराजाओं की पुत्रियों से, तो कभी शिकार पर गए राजा को वन की किसी कन्या पर आसक्त होना। यह सब राजाओं के लिए आम बात थी किंतु एक पत्नी व्रती आदर्श के प्रतीक राजा भतृहरि के लिए यह सब संभव न था।

     जब-जब भी छत्तीसगढ़ का इतिहास लिखा जाएगा, वह इतिहास प्रख्यात लोक गायिका सुरूजबाई खाण्डे के नामोल्लेख के बिना अधूरा ही रह जाएगा। स्व. झाड़ूराम देवांगन, ùविभूषण तीजन बाई, स्व. देवदास बंजारे, स्व. पùश्री पूनाराम निषाद के समकक्ष सुरूज बाई ने आज जिस मुकाम को छुआ है निसन्देह छत्तीसगढ़ के लिए गौरव की बात है। वे जिस संस्कृति का गौरव गान करती हैं वे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य के बंटवारे में कहीं बंटकर रह गया है। हमने सोचा इस छोटे राज्य में हमारा आगत स्वर्णिम होगा, सृजन का नया प्रतिमान गढ़ेंगे। किंतु ऐसा होते हुए भी कहीं कुछ है क्या रिश्वत खोरी के चलते या राजनीतिक पहुँच का अभाव, चमचागिरी की अधिकता के कारण या कोई ऐसा मार्गदर्शक जो आगे बढ़ाने में मदद करे, का न होना भी राह में बहुत बड़ा बाधक बनता है।

     छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी भाषा को हमारे यहाँ की महिलाओं ने दुनिया के नक्शे में अमर कर दिया। आज पùभूषण तीजन बाई जी को लोक कला संस्कृति के क्षेत्र में पूरी दुनिया के लोग जानते हैं उन जैसी दबंग और साहसी महिला जिसके द्वारा 18 देशों में अपनी कला का हुनर दिखाना किसी आम व्यक्ति की बात नहीं फिर भी कहीं कुछ ऐसा घटित हो रहा है कि हमें मजबूरन स्त्री विमर्श का मुद्दा उठाना पड़ रहा है।

वाचिक परंपरा को संजोकर उसे प्रस्तुत करने का काम बहुत कठिन है जिस तरह से हम अपनी संस्कृति को बचाए रखने के लिए पुरातत्व को बचाए रखने के लिए यत्न करते हैं संग्रहालयों का निर्माण, रख-रखाव पर ध्यान देते हैं उसी तरह लोक कला, लोक संस्कृति की रक्षा के लिए लोक कलाकारों का संरक्षण उनके व्यवस्थापन पर ध्यान देना शासन के लिए आवश्यक है। ये एक ऐसा विषय है जिस पर मेरी आलोचना हो सकती है किंतु कुछ जन्मजात कलाकार हमारी धरोहर हैं। इन्हें यूं ही धूप में जलने से,शीत में ठंड से, वर्षा में भीगने से बचाने का यत्न होना चाहिए। अपनी भाषा अपनी बोली में पूरी दुनिया के आगे अपनी प्राचीन कला से अवगत कराया अभाव और गरीबी से जूझती रही। उम्र के चौथे प्रहर में आकर जब इंसान अभाव झेलता है तो वह समय से पहले ही टूटकर बिखर जाता है।

     यह एक अतृप्त स्त्री की व्यथा है जिसे वे प्रस्तुति में तो व्यक्त नहीं करती किंतु जब भी मैं उनसे मिली हूँ उनके भावों में दीनता परिलक्षित होती, मुझे ऐसे आशा भरी निगाहों से देखती मानो मैं ही पùश्री हूँ। मुझे उनकी आंखों में एक प्यास दिखाई देती। पीड़ा भरी प्यास, जीवन भर की साधना के प्रतिफल की प्यास। यह एक कटु सत्य है कि जब सुरूज बाई ने गायन सीखना प्रारंभ किया वह उनके लिए एक गुरूकुल के समान था, वे नहीं जानती थी कि उन्हें आगे चलकर किसी सम्मान के लिए प्रस्तुति देनी है। किन्तु उनके मन की ललक, कुछ नया कुछ अच्छा करने की ललक, लोक कला के प्रति उनका झुकाव यह मात्र शौक नहीं था ना ही पैसा कमाने का जरिया था। जब उनसे साक्षात्कार के लिए मैं उनके एस.ई.सी.एल. के निवास में पहुँची थी तब उन्हांने मुझे बताया था कि उनके गांव में भी रहस का आयोजन किया जाता था साल में एक बार तब मैं रहस देखने जाया करती थी। रहस के कलाकारों की बेबाक और खूबसूरत प्रस्तुति से मेरा भी लोक के प्रति झुकाव हुआ और मेरे नाना तो लोक गायक थे ही सो मैंने उनसे ही लोक की समस्त विधाएँ ददरिया, करमा, लोक गीत और राजा  भर्तृहरि की गाथा भरथरी, चंदैनी, ढोला मारू इत्यादि जो उन्हें कंठस्थ थी उन्हें आत्मसात किया।

     एक अच्छी शिष्या बनकर उनके नाम से दुनिया को परिचित होने का अवसर मिला। वे एक ऐसी लोक गायिका हैं जो भरथरी का पर्याय बन चुकी हैं। बाद में उनकी कई शिष्याएँ हुईं किंतु देश विदेश में अपने भरथरी गायन कला से प्रसिद्धि प्राप्त करने वाली आप एक मात्र गायिका हैं। आपके अलावा भरथरी गायन करने में रेखा जलछत्री, रेखा देवार, सीमा कौशिक, वंदना वर्मा आदि का नाम लिया जा सकता है।

     सुरूज बाई खाण्डे का जन्म (तारीख ज्ञात नहीं) 1949 को बिलासपुर जिला के ग्राम पौंसरी सरगांव में हुआ। इनका विवाह रतनपुर के लखन खाण्डे से हुआ। वे दो बेटों की मां भी बनीं किंतु गांव में इलाज के अभाव में उनकी मृत्यु हो गई। तब वे बिलासपुर के कुदुदण्ड में आकर रहने लगी और मेहनत मजदूरी कर पेट भरती। आपने बताया कि अपने नाना रामसाय धृतलहरे से भरथरी लोक गाथा, ढोला मारू, चंदैनी आदि सीखा है बाल्यावस्था से ही जब वे 5-7 साल की रही होंगी अपने नाना को भरथरी का गायन करते सुनती तो भाव विभोर हो उठती और मन लगाकर सुनते-सुनते उन्हें पूरा भरथरी कंठस्थ होने लगा। इसी तरह ढोला मारू और चंदैनी को भी उन्होंने अपने नाना से ही सीखा। आपको पहली बार गाने का अवसर रतनपुर के मेले में मिला। शहर के लोक कलाकार श्री जवाहर बघेल ने पहली बार मंच दिलवाया। पश्चात मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद ने आपकी हुनर को पहचानकर 1986-87 में सोवियत रूस में आयोजित भारत महोत्सव में कार्यक्रम प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया। इसके अलावा प्रख्यात रंगकर्मी श्री हबीब तनवीर के साथ बहुत सारा कार्यक्रम देने का अवसर मिला।

     1985 में पूर्व मंत्री बी आर यादव ने विधानसभा चुनाव के प्रचार का जिम्मा दिया। उन्हीं की सिफारिश सेएवं लोक कला के सरंक्षण के लिएएस.ई.सी.एल. ने आपकी प्रतिभा को देखते हुए आपको बतौर संरक्षण अपने यहाँ चतुर्थ श्रेणी की नौकरी पर रख लिया जहाँ वे अधिकारियों को पानी पिलाने का काम करती थीं। उन्होंने बताया था कि लोक के माध्यम से निरक्षर होने के कारण उन्हें एसीसीएल में चाय और पानी पिलाने की नौकरी मिली। आज भी मैं सभी अधिकारियों के कमरों में बॉटल में पानी भरकर रख के आती हूँ डाक पहुँचाती हूँ। छुट्टी न मिलने से मुझे बहुत से अच्छे-अच्छे कार्यक्रमों से इन्कार करना पड़ता है। कई बार तो कार्यक्रमों के आमंत्रण की जानकारी भी नही देते। रोजी-रोटी का जरिया तो मिला िंकंतु मेरी कला का क्षरण होना शुरू हो गया।

     2000-01 में मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने देवी अहिल्या बाई सम्मान से सम्मानित किया था। छत्तीसगढ़ में दाऊ रामचंद्र देशमुख सम्मान और स्व. देवदास बंजारे सम्मान से आप सम्मानित हुई..............में छत्तीसगढ़ शासन का प्रतिश्ठित राज्य सम्मान दाउ मंदराजी सम्मान से आप सम्मानित हुईं। किंतु आपका असल सम्मान तो तब था जब आपको देश का उच्च सम्मान पùश्री सम्मान से सम्मानित किया जाता। जीवन भर लोक कला के माध्यम से अपनी आवाज के हुनर को प्रदर्शित करने वाली इस स्वर साधिका ने पùश्री की आस लिए ही इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

आपका कहना था कि वरिष्ठ लोक कलाकार होने के नाते मुझे भी यह सम्मान मिलना चाहिए था किंतु शासन के मापदंड का मुझे पता नहीं। पद, प्रतिष्ठा, पहुँच, नेतागिरी वालों को ही बड़ा सम्मान दिया जाता है और अब तो छत्तीसगढ़ में यह सामान्य बात हो गई है। उनका दुख जायज है। सुरूज बाई जी ने किसी सम्मान के लालच में इस क्षेत्र को नहीं चुना था अपितु कुछ लोगों के सम्मान होने से सम्मान स्वयं सम्मानित होता है। वे तो एक निर्बाध नदी की तरह थीं जो सदा अविरल बहती थी किसी परिस्थिति देशकाल की परवाह किये बिना अपनी भाव धारा में और इसमें साथ देते थे उनके स्वयं के पति श्री लखन खाण्डे जी। लखन खाण्डे जी भी एस.ई.सी.एल. में ही नौकरी करते थे। अच्छे कलाकारों के साथ कुछ दुर्भाग्य भी होता है। सुरूज बाई जी ने दुर्घटना की वजह से नौ साल पहले ही रिटायमेंट ले लिया था।

     रूस, दुसाम्बे आदि 18 देशों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी देश भर में अपनी प्रस्तुति से सबका मन मोह लेने वाली सुरूज बाई खाण्डे एसईसीएल में बतौर कलाकार चतुर्थ वर्ग कर्मचारी की हैसियत से रिटायरमेंट होने तक अधिकारियों को पानी पिलाने का काम करती रहीं। वर्षों पूर्व मध्यप्रदेश के देवी अहिल्या सम्मान के अलावा अन्य कई सम्मानों से सम्मानित सुरूज बाई को हमेशा से यह मलाल रहा है कि 50 वर्षों से अधिक समय तक अपनी लोक कला के माध्यम से प्रदेश ही नहीं अपितु देश का नाम रौशन करने के बाद भी क्या मुझे पùश्री लिए बिना ही इस दुनिया से विदा लेना होगा। आगे वे कहती हैं अपनी कला और मंच को मैं छोड़ नहीं सकती कला ही मेरी ऊर्जा है और कला ही मेरा जीवन।

     दरअसल छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी साहित्य को सामर्थ्यवान बनाने में लोक कलाकारों का योगदान अतुलनीय है। इन्होंने देश में ही नहीं अपितु विदेशों में भी छत्तीसगढ़ी भाषा में अपनी मौखिक कला का प्रदर्शन कर स्वयं तो ख्याति अर्जित की साथ ही भाषा को भी समृद्ध किया, एवं विश्व में छत्तीसगढ़ प्रदेश को सम्मानजनक नाम दिलाया।

     प्रदेश का गौरव बढ़ाने वाली देश के कई स्थानों में रायपुर, भोपाल, दिल्ली, महाराष्ट्र, ओड़िसा, इंदौर आदि कई शहरों और राज्यों में अपनी प्रस्तुति से प्रभावित करने के बाद लगभग 18 देशों में कला का प्रदर्शन कर ख्याति अर्जित करने वाली सुरूज बाई खाण्डे, ùविभूषण डॉ. तीजन बाई सहित समकालीन स्व. देवदास बंजारे एवं अन्य वरिष्ठ लोक कलाकारों के साथ अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी हैं छत्तीसगढ़ के कला मर्मज्ञ और संस्कृति विभाग सभी को ज्ञात है कि सुरूज बाई खाण्डे को वर्षों पूर्व ही पùश्री मिल जाना चाहिए था। मृत्यु के अंतिम क्षणों तक वे इसी आस में थी कि उनके शव को भी तिरंगा में लपेट कर विदा किया जाय किंतु पùश्री की, तिरंगे की उनकी आस अधूरी ही रह गई और छत्तीसगढ़ महतारी की यह होनहार लोक गायिका के जीवन का सूरज भी अस्त हो गया। आज भी सतनामी समाज और सतनामी धर्म परिषद प्रयासरत है कि मृत्युपरांत भी उनके नाम के आगे सम्मानजनक पùश्री जुड़ जाए।

     किंतु क्या उनका नाम या उनकी कला कभी अस्त हो पाएगी? नहीं! कलाकार भले ही मरते हों किंतु उनकी कला कभी मरती नहीं। उसी तरह जब तक मानव जीवन है सुरूज बाई जी की कला यानि भरथरी और सुरूज बाई एक दूसरे के पूरक बनकर साहित्याकाश में सदा के लिए चमकते रहेंगे धु्रवतारे की तरह।

     संदर्भ-1-साक्षात्कार –बिलासपुर निवास से लिया था

2-नारी का संबल ,

3-गूगल से

 

 

Tuesday, December 9, 2025

 

(10 दिसंबर पुण्यतिथि पर विशेष )

छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानीशहीद वीरनारायण सिंह

v शकुंतला तरार

 

जो भरा नहीं है भावों से,जिसमें बहती रसधार नहीं ।

वह हृदय नहीं है पत्थर है,जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।

                                                                      (राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त)

 

          इतिहास के पन्ने यदि हम पलटें तो देश की आजादी के लिए स्वतंत्रता संग्राम में सभी धर्म, जाति, सम्प्रदाय के लोगों ने बिना किसी भेदभाव के देश भक्ति की भावना से प्रेरित होकर बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था,अपना तन-मन-धन से सर्वस्व न्यौछावर किया था। प्राकृतिक सम्पदा से युक्त गौरवशाली ऐश्वर्य से अभिमण्डित हिमालय से कन्याकुमारी तक के इस भू-भाग पर स्थित माँ भारती अपनी करोड़ों भारतीय संतानों के होते हुए भी निराश्रित हो गई थी | दीन-हीन दुर्बल हो गई थी, गुलामी का अभिशाप ढोते-ढोते थक गई थी। उसकी संतानें भूखी, प्यासी, कुंठित, शोषित और अज्ञानता से ग्रस्त थीं। तब उनमें जज्बा और जोश भरने, जागरूकता पैदा करने, हमारे वीरों ने देशवासियों को उनकी इस दीन-हीन दशा का बोध कराया था, देश के लिए जीने और देश के लिए मरने का भाव उत्पन्न कराया था और अपना प्राणोत्सर्ग किया था।

          भारत की दुर्दशा से व्यथित अन्यायी शासन के विरूद्ध 1857 में झाँसी में महारानी लक्ष्मीबाई ने नारी होकर भी अपनी प्रजा के लिये,अपनी झाँसी के लिये, संघर्ष का बिगुल फूंका और समरभूमि में कूद पड़ी थी। क्या एक झाँसी ही अंगे्रजों के दमन चक्र में था, किन्तु देश के लिए अपने आत्म सम्मान की रक्षा के लिए, आतंक के विरूद्ध उठ खड़े होने का विरोध का साहस हर किसी में हो यह जरूरी तो नहीं । तभी तो कहा गया है कि--

तम को पराजित करने का बिहान वन्दे मातरम्।

चहुं दिसि शोभित झरनों का जय गान वन्दे मातरम्।

(शकुंतला तरार)

          भारत एक कृषि प्रधान देश है और धान का कटोरा कहे जाने वाले छतीसगढ़ में भी तब राजा-महाराजाओं का शासन था, जमींदारी थी, मालगुजारी थी। कुछ अत्याचार सहने के आदी होते हैं, समर्थ के आगे झुक जाते हैं वहीं कुछ लोगों से अत्याचार सहन नहीं होता और वे मातृभूमि की रक्षा के लिये विद्रोही तेवर अपना लेते हैं। तब शुरू होता है उनके दमन का सिलसिला। मगर देशभक्त किसी के आगे झुकते नहीं अत्याचारों को सहते नहीं।

          छत्तीसगढ़ की माटी ने भी सोनाखान नामक जमींदारी में 1795 में एक बिंझवार आदिवासी के घर में एक प्रेरणास्पद देश भक्त को जन्मा था । नाम था जिसका ‘‘नारायण सिंह”। जिसे आज लोग मातृभूमि पर मर मिटने वाले आदिवासी जननायक ‘‘शहीद वीर नारायण सिंह” के नाम से  जानते हैं और संबोधित करते हैं।

1818-19के दौरान आपके पिता जमींदार रामसाय ने भी अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह किया था किंतु कैप्टन मैक्सन द्वारा विद्रोह को दबा दिया गया और क्षेत्र में उनके प्रभाव, आदिवासी संगठन शक्ति को देखते हुए उनसे संधि कर ली। पिता की मृत्यु के पश्चात 1830 में वीर नारायण जमींदार बने। जब सोनाखान का विलय कर अंग्रेजों ने 1854 में उनपर टाकोली (कर) लगा दिया तब नारायण सिंह ने उसका विरोध किया और तभी शुरू हुआ दमन का सिलसिला। रायपुर के डिप्टी कमिश्नर इलियट जमींदार के विरोधी हो गए।  1857 में जब देश जल रहा था उसके ठीक पहले  1856 में छत्तीसगढ़ में भीषण सूखा पड़ा । लोग दाने-दाने को तरसने लगे |         वीरनारायण सिंह ने देखा कि अंग्रेजों  ने ‘‘धान के कटोरा” में छेद कर दिया है |

भूखी प्यासी जनता के सम्मुख रोजी-रोटी की विकराल समस्या आ गई है,मगर वहीं कसडोल के साहूकार (व्यापारी) का गोदाम,अनाज से भरा हुआ है माँगने पर देने को तैयार नहीं है।  ऐसे समय में वे अपनी जनता के लिए गोदाम से अनाज न निकालते तो क्या करते, जमींदार थे वे, उनके आदेश का पालन किया जाना था, डर जाने वालों में से नहीं थे वे । वीर नारायण ने जनता के दिलों में राष्ट्रीय चेतना जगाने के लिए उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई। अदम्य साहस, जोश, वीरता, शौर्यता और राष्ट्र भक्ति से ओत-प्रोत स्वाभिमान की रक्षा करते हुए उन्होंने साहूकार  के गोदाम के ताले तुड़वा दिये।गोदाम से अनाज लूटा, भूखी जनता को तृप्त किया ।

व्यापारी की शिकायत पर अंग्रेज  उनके पीछे लग गए उनके नाम वारंट जारी कर दिया, वे उन्हें छकाते रहे किन्तु अत्याचारियों ने जनता को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। 24 अक्टूबर 1856 को संबलपुर से गिरफ्तार किये गये। 28 अगस्त 1857 को अपने तीन साथियों सहित जेल से भागने में कामयाब होकर सोनाखान में 500 साथियों की एक सेना बनाई किंतु भीषण संघर्ष के बाद भी वे पकड़े गये जेल गये।

          यह छत्तीसगढ़ की माटी का कर्ज था एक ईमानदार प्रजावत्सल, कर्तव्यनिष्ठ जमींदार पर जहाँ  कि उन्होंने जन्म लिया था। देश के लिए जीये वे और देश के लिए ही उन्होंने प्राणोत्सर्ग किया उनके लिए यह पंक्ति कि -

वन्दना के इस स्वरों में,एक स्वर मेरा मिला लो

जब हृदय के तार बोले,श्रृंखला के बंद खोले

एक सिर मेरा मिला लो

                                                                                (कवि सोहनलाल द्विवेदी)

सोनाखान में आज भी राजा सागर, रानी सागर, नंद सागर इस बात के साक्षी हैं कि वे सुंदर, हरा-भरा वातावरण के मध्य अपनी जनता को भयमुक्त, खुशहाल और सम्पन्न देखना चाहते थे। सोनाखान ही नहीं अपितु छत्तीसगढ़ की समस्त जनता को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराना चाहते थे वे। भोली-भाली आदिवासी जनता के दिलों में राष्ट्रभक्ति की चेतना जगाने में वे अग्रणी रहे । तभी तो अपने ही भाईयों के रक्त से विजय तिलक लगाने के बजाय स्वयं को सौंप दिया।        

साक्षी है छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के मध्य स्थित रायपुर का हृदय स्थल जयस्तम्भ जहाँ अंग्रेजी हुकूमत ने 10 दिसंबर 1857 को सरेआम उन्हें फाँसी पर लटकाकर अट्टहास किया था। पर क्या वीर सचमुच कभी मरते हैं ,मरती तो देह है वे तो अमर रह जाते हैं एक गौरवपूर्ण इतिहास के रूप में।

 

वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें उबाल का नाम नहीं

वह खून कहो किस मतलब का, आ सके देश के काम नहीं

वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें जीवन न रवानी है

जो परवश होकर बहता है, वह खून नहीं है पानी है  ||

( कवि गोपाल व्यास दास)

                                             

          एक छोटी सी जमींदारी सोनाखान,किन्तु हर वर्ष राज्य शासन द्वारा 10 दिसम्बर को उनकी शहादत दिवस को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए बिंझवार आदिवासी वीर शहीद की स्मृति में,उस पुण्य भूमि में हर बरस मेले का आयोजन किया जाता है,साथ ही लोक कला एवं लोक संस्कृति को संरक्षित करने के लिए आदिवासी लोक कला महोत्सव करवाकर प्रतियोगिता कराई जाती है और उन्हें प्रोत्साहन स्वरूप पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं।

          अभिमान है छत्तीसगढ़ की इस धरा को जिसने वीर नारायण सिंह जैसे सच्चे देशभक्त को जन्म दिया। इस महान चरित्र पर छत्तीसगढ़ को पूरा अधिकार है अभिमान करने का। इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में शहीद वीरनारायण सिंह का नाम हमेशा अंकित हो गया उनके लिए श्रद्धा सुमन इस तरह कि -

शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले

वतन पे मरने वालों का यही बाक़ी निशाँ होगा ||

-(जगदम्बा प्रसाद मिश्र “हितैषी”)

शकुंतला तरार

          प्लांट नं. 32,सेक्टर-2,एकता नगर

          गुढि़यारी रायपुर  (छ.ग)