Sunday, March 22, 2026

भरथरी गायिका : सुरूज बाई खाण्डे-शकुंतला तरार

 

भरथरी गायिका : सुरूज बाई खाण्डे


घोड़ा रोवय घोड़सार माघोड़सारे मा वो

हाथी रोवय हाथी सार मामोर रानी ये वो

महल मा रोवयमोर राजा रोवय दरबार मा

दरबारे मा  भाई एदे जी।

सुरहिन गइया के गोबर, ए मँगाइके गा।

खुंटधर अंगना लिपाइके, मोतियन के ए ना।

मेर चउके ना, मोर घीये के दिया जलाइके।

ए जलाइके भाई ए दे जी........

सुन तो नारी मोर बाते ला

मोर बाते ला ओ, कातो जुवानी ए दिये हो।

भगवाने ह ओ, मोर करमे मा ना।

एदे का जोगनी मोला दिये हो,

मोला दिये हो भाई ए दे जी...

बरजे बाते नइ तो मानथे

मोर भरथरी हा, हरके बाते नइ तो मानत हे।

घोड़ा के सवार चले जावत दीदी

ए दे मिरगा के पाछू कुदावत हो, कुदावत हो,

भाई ए दे जी............।


 जब इन पंक्तियों के साथ राजा भरथरी की गाथा का गायन प्रारंभ होता है शरीर में झुरझुरी सी होने लगती है रोंगटे खड़े हो जाते हैं लगता है गाथा का आरंभ अगर इतना ही रोचक, आनंद दायक, अनुभूतिपरक है तो आगे न जाने क्या होगा ? कौन है जो इतने दर्द भरे स्वर में सुरों की पंक्तियों की माला पिरो रहा है ? और इन पंक्तियों को स्वर देने वाली साधिका का नाम है सुरूज बाई खाण्डे। सूरज को दीपक नहीं दिखाया जाता क्योंकि सूर्य तो स्वयं प्रकाश देकर संसार को जीने की राह दिखाता है। मगर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपनी उर्जस्विता से अपनी प्रतिभा की रोशनी से संसार में अपना और अपने परिवार का अपनी आने वाली पीढ़ी के नाम को प्रकाशवान बनाते हैं और ऐसे ही ओजस्वी कला सम्पन्न कलाकार प्रसिद्ध भरथरी गायिका का नाम है सुरूज बाई खाण्डे। आंचलिकधुन को अपने हृदय में समेटे लोक जीवन को समर्पित, मोहक, सुरीली, कर्णप्रिय, धुन से राजा भर्तृहरि के गाथा का गायन करने वाली सुमधुर कंठ की मलिका हैं-सुरूज बाई खाण्डे।

     राजा भृर्तहरि जिसे छत्तीसगढ़ में भरथरी नाम उच्चारित किया जाता है, उनकी जीवनी का वर्णन, कि कैसे वे राजगद्दी पर बैठे फिर उनके संन्यास लेने की करूण कहानी को गाथा के रूप में प्रस्तुत करना यह सुरूज बाई ही कर सकती हैं। उनके गायन की प्रस्तुति का अंदाज ही सबसे अलग है। कोई भी कथा कहानी लोक गीत जब प्राचीन समय से चले आते हैं, तबवे परम्परा का स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं।

     हाथों में इकतारा लेकर कई-कई घण्टे की प्रस्तुति देना सहज बात नहीं है। अपने नाना की परम्परा को उन्होंने जीवंत कर दिया। जब वे भरथरी का गायन करती हैं तो कथा के प्रसंगों के उतार-चढ़ाव के साथ ही श्रोता उनके भावों के प्रवाह में बहता चला जाता है। अवसर-अवसर की बात होती है और किस्मत की बात-पùविभूषण तीजन बाई जी को भिलाई स्टील प्लांट ने सुअवसर प्रदान किया और उन्होंने देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर ख्याति अर्जित की। दोनों में कितनी साम्यता है कि सुरूज बाई खाण्डे जी और तीजन बाई जी दोनों ने ही अपने-अपने नाना से इस परम्परागत गाथाओं की विधा को सीखा।

     उज्जयिनी नगरी जो आज भी प्रसिद्ध है महाराजा विक्रमादित्य की नगरी के नाम से, महाकवि कालिदास के नाम से, महाकुंभ के नाम से, भगवान महाकालेश्वर के नाम से और प्रसिद्ध है उज्जैन, राजा भर्तृहरि के नाम से।

 

उज्जैन के उन्हीं राजा भर्तृहरि की जीवन यात्रा को गाथा के रूप में गाए जाने की परम्परा न जाने कब से चली आ रही है किंतु इस परम्परा को आत्मसात करने वाली सुरूज बाई खाण्डे एक पर्याय के रूप में जानी जाती हैं। भरथरी यानि सुरूज बाई और सुरूज बाई यानि भरथरी।

     सुरूज बाई से जब मैंने इस बाबत कुछ वर्षों पूर्व साक्षात्कार किया था तो उन्होंने बताया था कि उनके गांव में जब रहस (कृष्ण लीला) का मंचन होता था तो उन्हें भी लगता काश मैं भी इसमें अपनी सहभागिता दे पाती किंतु उस वक्त नाटकों में पुरुष पात्र ही स्त्री पात्र की भूमिका निभाया करते थे। अर्थात् बाल्यावस्था में ही मन के अंदर जो हलचल पैदा हुई कुछ करने की चाह थी, इसी ललक ने ही उसे भरथरी गायन सीखने का रूझान पैदा किया।

     सुरूज बाई हमेशा सूरज की तरह दैदिप्यमान रही। जहाँ-जहाँ पùभूषण तीजन बाई जी का नाम लिया जाता है वहाँ सुरूज बाई को लोग अवश्य याद रखते हैं। आज भरथरी के गाथा गायन करने वाले कलाकार यद्यपि अभी भी सिर्फ उंगलियों में गिने जा सकने लायक भर हैं तथापि 80, 90 के दशक में हमारे सम्मुख सिर्फ एक ही नाम उभरकर आता है और वह नाम है सुरूज बाई खाण्डे। विडम्बना देखिए कि हमारे बीच इतने मूर्धन्य महान कलाकर होते हैं और हम उनकी कला का सम्मान करने का दिखावा करते हैं लेकिन जो नींव डालकर ये कलाकार जाते हैं वे हमारी धरोहर के रूप में होते हैं। उनकी महानता को सभी जानते हैं उनके आगे नत मस्तक भी होते हैं किंतु राजाश्रय के बिना उनका सही-सही मूल्यांकन नहीं हो पाता। उनकी कला की सराहना तो होती है किंतु व्यक्ति की, कलाकार की उपेक्षा की जाती है। वैसे ही सुरूज बाई के साथ भी हुआ। इतनी मूर्धन्य कलाकार जिसने अपने बचपन को, बालपन को समर्पित कर दिया लोक के लिए, बच्चों के साथ फुगड़ी खेलने की उम्र में वह हाथ में चिकारा लिए नाना के संग राजा भर्तृहरि की पावन गाथा, जिसे हम छत्तीसगढ़ में भरथरी के रूप में जानते हैं, के जीवन का विशद वर्णन है, 7 वर्ष  की उम्र से बाल्यावस्था में ही अपने नाना स्व. रामसाय घृतलहरे से मौखिक परम्परा के तहत भरथरी गायन सीखना शुरू किया और बहुत जल्द कंठस्थ भी कर लिया।

              ऐसा नहीं है कि उनके साथ कोई मजबूरी थी सीखने की! या उन्हें अर्थार्जन करना था। नहीं बल्कि लोक के प्रति झुकाव, सीखने की जिज्ञासा ने सुरूज बाई को वह दिव्यता प्रदान की जिसके लिए अच्छे से अच्छे गुणी, ज्ञानी, संत-महात्मा सारा जीवन खपा देते हैं। किंतु यह सौभाग्य तो सौभाग्यशालियों को ही प्राप्त होता है।

     आध्यात्मिक लोक नायक के रूप में प्रतिष्ठित राजा भर्तृहरि के जीवनवृत्त उनकी त्यागमूर्ति छवि, उनके उपदेशों, उनके पत्नी को माता रूप प्रदान करने की उदारता का नाम है भरथरी। अपना वैभव, अपना राजपाट, अपना सुख सब कुछ तो त्यागा उन्होंने। राजा-महाराजाओं के बारे में हम हमेशा सुनते आए हैं कि किस राजा ने कितनी शादियाँ की। किसी ने संतान न होने पर, किसी ने पराजित राजा-महाराजाओं की पुत्रियों से, तो कभी शिकार पर गए राजा को वन की किसी कन्या पर आसक्त होना। यह सब राजाओं के लिए आम बात थी किंतु एक पत्नी व्रती आदर्श के प्रतीक राजा भतृहरि के लिए यह सब संभव न था।

     जब-जब भी छत्तीसगढ़ का इतिहास लिखा जाएगा, वह इतिहास प्रख्यात लोक गायिका सुरूजबाई खाण्डे के नामोल्लेख के बिना अधूरा ही रह जाएगा। स्व. झाड़ूराम देवांगन, ùविभूषण तीजन बाई, स्व. देवदास बंजारे, स्व. पùश्री पूनाराम निषाद के समकक्ष सुरूज बाई ने आज जिस मुकाम को छुआ है निसन्देह छत्तीसगढ़ के लिए गौरव की बात है। वे जिस संस्कृति का गौरव गान करती हैं वे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य के बंटवारे में कहीं बंटकर रह गया है। हमने सोचा इस छोटे राज्य में हमारा आगत स्वर्णिम होगा, सृजन का नया प्रतिमान गढ़ेंगे। किंतु ऐसा होते हुए भी कहीं कुछ है क्या रिश्वत खोरी के चलते या राजनीतिक पहुँच का अभाव, चमचागिरी की अधिकता के कारण या कोई ऐसा मार्गदर्शक जो आगे बढ़ाने में मदद करे, का न होना भी राह में बहुत बड़ा बाधक बनता है।

     छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी भाषा को हमारे यहाँ की महिलाओं ने दुनिया के नक्शे में अमर कर दिया। आज पùभूषण तीजन बाई जी को लोक कला संस्कृति के क्षेत्र में पूरी दुनिया के लोग जानते हैं उन जैसी दबंग और साहसी महिला जिसके द्वारा 18 देशों में अपनी कला का हुनर दिखाना किसी आम व्यक्ति की बात नहीं फिर भी कहीं कुछ ऐसा घटित हो रहा है कि हमें मजबूरन स्त्री विमर्श का मुद्दा उठाना पड़ रहा है।

वाचिक परंपरा को संजोकर उसे प्रस्तुत करने का काम बहुत कठिन है जिस तरह से हम अपनी संस्कृति को बचाए रखने के लिए पुरातत्व को बचाए रखने के लिए यत्न करते हैं संग्रहालयों का निर्माण, रख-रखाव पर ध्यान देते हैं उसी तरह लोक कला, लोक संस्कृति की रक्षा के लिए लोक कलाकारों का संरक्षण उनके व्यवस्थापन पर ध्यान देना शासन के लिए आवश्यक है। ये एक ऐसा विषय है जिस पर मेरी आलोचना हो सकती है किंतु कुछ जन्मजात कलाकार हमारी धरोहर हैं। इन्हें यूं ही धूप में जलने से,शीत में ठंड से, वर्षा में भीगने से बचाने का यत्न होना चाहिए। अपनी भाषा अपनी बोली में पूरी दुनिया के आगे अपनी प्राचीन कला से अवगत कराया अभाव और गरीबी से जूझती रही। उम्र के चौथे प्रहर में आकर जब इंसान अभाव झेलता है तो वह समय से पहले ही टूटकर बिखर जाता है।

     यह एक अतृप्त स्त्री की व्यथा है जिसे वे प्रस्तुति में तो व्यक्त नहीं करती किंतु जब भी मैं उनसे मिली हूँ उनके भावों में दीनता परिलक्षित होती, मुझे ऐसे आशा भरी निगाहों से देखती मानो मैं ही पùश्री हूँ। मुझे उनकी आंखों में एक प्यास दिखाई देती। पीड़ा भरी प्यास, जीवन भर की साधना के प्रतिफल की प्यास। यह एक कटु सत्य है कि जब सुरूज बाई ने गायन सीखना प्रारंभ किया वह उनके लिए एक गुरूकुल के समान था, वे नहीं जानती थी कि उन्हें आगे चलकर किसी सम्मान के लिए प्रस्तुति देनी है। किन्तु उनके मन की ललक, कुछ नया कुछ अच्छा करने की ललक, लोक कला के प्रति उनका झुकाव यह मात्र शौक नहीं था ना ही पैसा कमाने का जरिया था। जब उनसे साक्षात्कार के लिए मैं उनके एस.ई.सी.एल. के निवास में पहुँची थी तब उन्हांने मुझे बताया था कि उनके गांव में भी रहस का आयोजन किया जाता था साल में एक बार तब मैं रहस देखने जाया करती थी। रहस के कलाकारों की बेबाक और खूबसूरत प्रस्तुति से मेरा भी लोक के प्रति झुकाव हुआ और मेरे नाना तो लोक गायक थे ही सो मैंने उनसे ही लोक की समस्त विधाएँ ददरिया, करमा, लोक गीत और राजा  भर्तृहरि की गाथा भरथरी, चंदैनी, ढोला मारू इत्यादि जो उन्हें कंठस्थ थी उन्हें आत्मसात किया।

     एक अच्छी शिष्या बनकर उनके नाम से दुनिया को परिचित होने का अवसर मिला। वे एक ऐसी लोक गायिका हैं जो भरथरी का पर्याय बन चुकी हैं। बाद में उनकी कई शिष्याएँ हुईं किंतु देश विदेश में अपने भरथरी गायन कला से प्रसिद्धि प्राप्त करने वाली आप एक मात्र गायिका हैं। आपके अलावा भरथरी गायन करने में रेखा जलछत्री, रेखा देवार, सीमा कौशिक, वंदना वर्मा आदि का नाम लिया जा सकता है।

     सुरूज बाई खाण्डे का जन्म (तारीख ज्ञात नहीं) 1949 को बिलासपुर जिला के ग्राम पौंसरी सरगांव में हुआ। इनका विवाह रतनपुर के लखन खाण्डे से हुआ। वे दो बेटों की मां भी बनीं किंतु गांव में इलाज के अभाव में उनकी मृत्यु हो गई। तब वे बिलासपुर के कुदुदण्ड में आकर रहने लगी और मेहनत मजदूरी कर पेट भरती। आपने बताया कि अपने नाना रामसाय धृतलहरे से भरथरी लोक गाथा, ढोला मारू, चंदैनी आदि सीखा है बाल्यावस्था से ही जब वे 5-7 साल की रही होंगी अपने नाना को भरथरी का गायन करते सुनती तो भाव विभोर हो उठती और मन लगाकर सुनते-सुनते उन्हें पूरा भरथरी कंठस्थ होने लगा। इसी तरह ढोला मारू और चंदैनी को भी उन्होंने अपने नाना से ही सीखा। आपको पहली बार गाने का अवसर रतनपुर के मेले में मिला। शहर के लोक कलाकार श्री जवाहर बघेल ने पहली बार मंच दिलवाया। पश्चात मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद ने आपकी हुनर को पहचानकर 1986-87 में सोवियत रूस में आयोजित भारत महोत्सव में कार्यक्रम प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया। इसके अलावा प्रख्यात रंगकर्मी श्री हबीब तनवीर के साथ बहुत सारा कार्यक्रम देने का अवसर मिला।

     1985 में पूर्व मंत्री बी आर यादव ने विधानसभा चुनाव के प्रचार का जिम्मा दिया। उन्हीं की सिफारिश सेएवं लोक कला के सरंक्षण के लिएएस.ई.सी.एल. ने आपकी प्रतिभा को देखते हुए आपको बतौर संरक्षण अपने यहाँ चतुर्थ श्रेणी की नौकरी पर रख लिया जहाँ वे अधिकारियों को पानी पिलाने का काम करती थीं। उन्होंने बताया था कि लोक के माध्यम से निरक्षर होने के कारण उन्हें एसीसीएल में चाय और पानी पिलाने की नौकरी मिली। आज भी मैं सभी अधिकारियों के कमरों में बॉटल में पानी भरकर रख के आती हूँ डाक पहुँचाती हूँ। छुट्टी न मिलने से मुझे बहुत से अच्छे-अच्छे कार्यक्रमों से इन्कार करना पड़ता है। कई बार तो कार्यक्रमों के आमंत्रण की जानकारी भी नही देते। रोजी-रोटी का जरिया तो मिला िंकंतु मेरी कला का क्षरण होना शुरू हो गया।

     2000-01 में मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने देवी अहिल्या बाई सम्मान से सम्मानित किया था। छत्तीसगढ़ में दाऊ रामचंद्र देशमुख सम्मान और स्व. देवदास बंजारे सम्मान से आप सम्मानित हुई..............में छत्तीसगढ़ शासन का प्रतिश्ठित राज्य सम्मान दाउ मंदराजी सम्मान से आप सम्मानित हुईं। किंतु आपका असल सम्मान तो तब था जब आपको देश का उच्च सम्मान पùश्री सम्मान से सम्मानित किया जाता। जीवन भर लोक कला के माध्यम से अपनी आवाज के हुनर को प्रदर्शित करने वाली इस स्वर साधिका ने पùश्री की आस लिए ही इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

आपका कहना था कि वरिष्ठ लोक कलाकार होने के नाते मुझे भी यह सम्मान मिलना चाहिए था किंतु शासन के मापदंड का मुझे पता नहीं। पद, प्रतिष्ठा, पहुँच, नेतागिरी वालों को ही बड़ा सम्मान दिया जाता है और अब तो छत्तीसगढ़ में यह सामान्य बात हो गई है। उनका दुख जायज है। सुरूज बाई जी ने किसी सम्मान के लालच में इस क्षेत्र को नहीं चुना था अपितु कुछ लोगों के सम्मान होने से सम्मान स्वयं सम्मानित होता है। वे तो एक निर्बाध नदी की तरह थीं जो सदा अविरल बहती थी किसी परिस्थिति देशकाल की परवाह किये बिना अपनी भाव धारा में और इसमें साथ देते थे उनके स्वयं के पति श्री लखन खाण्डे जी। लखन खाण्डे जी भी एस.ई.सी.एल. में ही नौकरी करते थे। अच्छे कलाकारों के साथ कुछ दुर्भाग्य भी होता है। सुरूज बाई जी ने दुर्घटना की वजह से नौ साल पहले ही रिटायमेंट ले लिया था।

     रूस, दुसाम्बे आदि 18 देशों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी देश भर में अपनी प्रस्तुति से सबका मन मोह लेने वाली सुरूज बाई खाण्डे एसईसीएल में बतौर कलाकार चतुर्थ वर्ग कर्मचारी की हैसियत से रिटायरमेंट होने तक अधिकारियों को पानी पिलाने का काम करती रहीं। वर्षों पूर्व मध्यप्रदेश के देवी अहिल्या सम्मान के अलावा अन्य कई सम्मानों से सम्मानित सुरूज बाई को हमेशा से यह मलाल रहा है कि 50 वर्षों से अधिक समय तक अपनी लोक कला के माध्यम से प्रदेश ही नहीं अपितु देश का नाम रौशन करने के बाद भी क्या मुझे पùश्री लिए बिना ही इस दुनिया से विदा लेना होगा। आगे वे कहती हैं अपनी कला और मंच को मैं छोड़ नहीं सकती कला ही मेरी ऊर्जा है और कला ही मेरा जीवन।

     दरअसल छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी साहित्य को सामर्थ्यवान बनाने में लोक कलाकारों का योगदान अतुलनीय है। इन्होंने देश में ही नहीं अपितु विदेशों में भी छत्तीसगढ़ी भाषा में अपनी मौखिक कला का प्रदर्शन कर स्वयं तो ख्याति अर्जित की साथ ही भाषा को भी समृद्ध किया, एवं विश्व में छत्तीसगढ़ प्रदेश को सम्मानजनक नाम दिलाया।

     प्रदेश का गौरव बढ़ाने वाली देश के कई स्थानों में रायपुर, भोपाल, दिल्ली, महाराष्ट्र, ओड़िसा, इंदौर आदि कई शहरों और राज्यों में अपनी प्रस्तुति से प्रभावित करने के बाद लगभग 18 देशों में कला का प्रदर्शन कर ख्याति अर्जित करने वाली सुरूज बाई खाण्डे, ùविभूषण डॉ. तीजन बाई सहित समकालीन स्व. देवदास बंजारे एवं अन्य वरिष्ठ लोक कलाकारों के साथ अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी हैं छत्तीसगढ़ के कला मर्मज्ञ और संस्कृति विभाग सभी को ज्ञात है कि सुरूज बाई खाण्डे को वर्षों पूर्व ही पùश्री मिल जाना चाहिए था। मृत्यु के अंतिम क्षणों तक वे इसी आस में थी कि उनके शव को भी तिरंगा में लपेट कर विदा किया जाय किंतु पùश्री की, तिरंगे की उनकी आस अधूरी ही रह गई और छत्तीसगढ़ महतारी की यह होनहार लोक गायिका के जीवन का सूरज भी अस्त हो गया। आज भी सतनामी समाज और सतनामी धर्म परिषद प्रयासरत है कि मृत्युपरांत भी उनके नाम के आगे सम्मानजनक पùश्री जुड़ जाए।

     किंतु क्या उनका नाम या उनकी कला कभी अस्त हो पाएगी? नहीं! कलाकार भले ही मरते हों किंतु उनकी कला कभी मरती नहीं। उसी तरह जब तक मानव जीवन है सुरूज बाई जी की कला यानि भरथरी और सुरूज बाई एक दूसरे के पूरक बनकर साहित्याकाश में सदा के लिए चमकते रहेंगे धु्रवतारे की तरह।

     संदर्भ-1-साक्षात्कार –बिलासपुर निवास से लिया था

2-नारी का संबल ,

3-गूगल से

 

 

Tuesday, December 9, 2025

 

(10 दिसंबर पुण्यतिथि पर विशेष )

छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानीशहीद वीरनारायण सिंह

v शकुंतला तरार

 

जो भरा नहीं है भावों से,जिसमें बहती रसधार नहीं ।

वह हृदय नहीं है पत्थर है,जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।

                                                                      (राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त)

 

          इतिहास के पन्ने यदि हम पलटें तो देश की आजादी के लिए स्वतंत्रता संग्राम में सभी धर्म, जाति, सम्प्रदाय के लोगों ने बिना किसी भेदभाव के देश भक्ति की भावना से प्रेरित होकर बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था,अपना तन-मन-धन से सर्वस्व न्यौछावर किया था। प्राकृतिक सम्पदा से युक्त गौरवशाली ऐश्वर्य से अभिमण्डित हिमालय से कन्याकुमारी तक के इस भू-भाग पर स्थित माँ भारती अपनी करोड़ों भारतीय संतानों के होते हुए भी निराश्रित हो गई थी | दीन-हीन दुर्बल हो गई थी, गुलामी का अभिशाप ढोते-ढोते थक गई थी। उसकी संतानें भूखी, प्यासी, कुंठित, शोषित और अज्ञानता से ग्रस्त थीं। तब उनमें जज्बा और जोश भरने, जागरूकता पैदा करने, हमारे वीरों ने देशवासियों को उनकी इस दीन-हीन दशा का बोध कराया था, देश के लिए जीने और देश के लिए मरने का भाव उत्पन्न कराया था और अपना प्राणोत्सर्ग किया था।

          भारत की दुर्दशा से व्यथित अन्यायी शासन के विरूद्ध 1857 में झाँसी में महारानी लक्ष्मीबाई ने नारी होकर भी अपनी प्रजा के लिये,अपनी झाँसी के लिये, संघर्ष का बिगुल फूंका और समरभूमि में कूद पड़ी थी। क्या एक झाँसी ही अंगे्रजों के दमन चक्र में था, किन्तु देश के लिए अपने आत्म सम्मान की रक्षा के लिए, आतंक के विरूद्ध उठ खड़े होने का विरोध का साहस हर किसी में हो यह जरूरी तो नहीं । तभी तो कहा गया है कि--

तम को पराजित करने का बिहान वन्दे मातरम्।

चहुं दिसि शोभित झरनों का जय गान वन्दे मातरम्।

(शकुंतला तरार)

          भारत एक कृषि प्रधान देश है और धान का कटोरा कहे जाने वाले छतीसगढ़ में भी तब राजा-महाराजाओं का शासन था, जमींदारी थी, मालगुजारी थी। कुछ अत्याचार सहने के आदी होते हैं, समर्थ के आगे झुक जाते हैं वहीं कुछ लोगों से अत्याचार सहन नहीं होता और वे मातृभूमि की रक्षा के लिये विद्रोही तेवर अपना लेते हैं। तब शुरू होता है उनके दमन का सिलसिला। मगर देशभक्त किसी के आगे झुकते नहीं अत्याचारों को सहते नहीं।

          छत्तीसगढ़ की माटी ने भी सोनाखान नामक जमींदारी में 1795 में एक बिंझवार आदिवासी के घर में एक प्रेरणास्पद देश भक्त को जन्मा था । नाम था जिसका ‘‘नारायण सिंह”। जिसे आज लोग मातृभूमि पर मर मिटने वाले आदिवासी जननायक ‘‘शहीद वीर नारायण सिंह” के नाम से  जानते हैं और संबोधित करते हैं।

1818-19के दौरान आपके पिता जमींदार रामसाय ने भी अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह किया था किंतु कैप्टन मैक्सन द्वारा विद्रोह को दबा दिया गया और क्षेत्र में उनके प्रभाव, आदिवासी संगठन शक्ति को देखते हुए उनसे संधि कर ली। पिता की मृत्यु के पश्चात 1830 में वीर नारायण जमींदार बने। जब सोनाखान का विलय कर अंग्रेजों ने 1854 में उनपर टाकोली (कर) लगा दिया तब नारायण सिंह ने उसका विरोध किया और तभी शुरू हुआ दमन का सिलसिला। रायपुर के डिप्टी कमिश्नर इलियट जमींदार के विरोधी हो गए।  1857 में जब देश जल रहा था उसके ठीक पहले  1856 में छत्तीसगढ़ में भीषण सूखा पड़ा । लोग दाने-दाने को तरसने लगे |         वीरनारायण सिंह ने देखा कि अंग्रेजों  ने ‘‘धान के कटोरा” में छेद कर दिया है |

भूखी प्यासी जनता के सम्मुख रोजी-रोटी की विकराल समस्या आ गई है,मगर वहीं कसडोल के साहूकार (व्यापारी) का गोदाम,अनाज से भरा हुआ है माँगने पर देने को तैयार नहीं है।  ऐसे समय में वे अपनी जनता के लिए गोदाम से अनाज न निकालते तो क्या करते, जमींदार थे वे, उनके आदेश का पालन किया जाना था, डर जाने वालों में से नहीं थे वे । वीर नारायण ने जनता के दिलों में राष्ट्रीय चेतना जगाने के लिए उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई। अदम्य साहस, जोश, वीरता, शौर्यता और राष्ट्र भक्ति से ओत-प्रोत स्वाभिमान की रक्षा करते हुए उन्होंने साहूकार  के गोदाम के ताले तुड़वा दिये।गोदाम से अनाज लूटा, भूखी जनता को तृप्त किया ।

व्यापारी की शिकायत पर अंग्रेज  उनके पीछे लग गए उनके नाम वारंट जारी कर दिया, वे उन्हें छकाते रहे किन्तु अत्याचारियों ने जनता को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। 24 अक्टूबर 1856 को संबलपुर से गिरफ्तार किये गये। 28 अगस्त 1857 को अपने तीन साथियों सहित जेल से भागने में कामयाब होकर सोनाखान में 500 साथियों की एक सेना बनाई किंतु भीषण संघर्ष के बाद भी वे पकड़े गये जेल गये।

          यह छत्तीसगढ़ की माटी का कर्ज था एक ईमानदार प्रजावत्सल, कर्तव्यनिष्ठ जमींदार पर जहाँ  कि उन्होंने जन्म लिया था। देश के लिए जीये वे और देश के लिए ही उन्होंने प्राणोत्सर्ग किया उनके लिए यह पंक्ति कि -

वन्दना के इस स्वरों में,एक स्वर मेरा मिला लो

जब हृदय के तार बोले,श्रृंखला के बंद खोले

एक सिर मेरा मिला लो

                                                                                (कवि सोहनलाल द्विवेदी)

सोनाखान में आज भी राजा सागर, रानी सागर, नंद सागर इस बात के साक्षी हैं कि वे सुंदर, हरा-भरा वातावरण के मध्य अपनी जनता को भयमुक्त, खुशहाल और सम्पन्न देखना चाहते थे। सोनाखान ही नहीं अपितु छत्तीसगढ़ की समस्त जनता को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराना चाहते थे वे। भोली-भाली आदिवासी जनता के दिलों में राष्ट्रभक्ति की चेतना जगाने में वे अग्रणी रहे । तभी तो अपने ही भाईयों के रक्त से विजय तिलक लगाने के बजाय स्वयं को सौंप दिया।        

साक्षी है छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के मध्य स्थित रायपुर का हृदय स्थल जयस्तम्भ जहाँ अंग्रेजी हुकूमत ने 10 दिसंबर 1857 को सरेआम उन्हें फाँसी पर लटकाकर अट्टहास किया था। पर क्या वीर सचमुच कभी मरते हैं ,मरती तो देह है वे तो अमर रह जाते हैं एक गौरवपूर्ण इतिहास के रूप में।

 

वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें उबाल का नाम नहीं

वह खून कहो किस मतलब का, आ सके देश के काम नहीं

वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें जीवन न रवानी है

जो परवश होकर बहता है, वह खून नहीं है पानी है  ||

( कवि गोपाल व्यास दास)

                                             

          एक छोटी सी जमींदारी सोनाखान,किन्तु हर वर्ष राज्य शासन द्वारा 10 दिसम्बर को उनकी शहादत दिवस को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए बिंझवार आदिवासी वीर शहीद की स्मृति में,उस पुण्य भूमि में हर बरस मेले का आयोजन किया जाता है,साथ ही लोक कला एवं लोक संस्कृति को संरक्षित करने के लिए आदिवासी लोक कला महोत्सव करवाकर प्रतियोगिता कराई जाती है और उन्हें प्रोत्साहन स्वरूप पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं।

          अभिमान है छत्तीसगढ़ की इस धरा को जिसने वीर नारायण सिंह जैसे सच्चे देशभक्त को जन्म दिया। इस महान चरित्र पर छत्तीसगढ़ को पूरा अधिकार है अभिमान करने का। इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में शहीद वीरनारायण सिंह का नाम हमेशा अंकित हो गया उनके लिए श्रद्धा सुमन इस तरह कि -

शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले

वतन पे मरने वालों का यही बाक़ी निशाँ होगा ||

-(जगदम्बा प्रसाद मिश्र “हितैषी”)

शकुंतला तरार

          प्लांट नं. 32,सेक्टर-2,एकता नगर

          गुढि़यारी रायपुर  (छ.ग)

 

 


Tuesday, June 17, 2025

 

शकुंतला चो लेजा गीद

101  हल्बी गीत और  101 हिंदी अनुवाद सहित 

                साहित्य अकादमी नई दिल्ली भारत सरकार और साहित्य अकादमी , छत्तीसगढ़ संस्कृति परिषद् रायपुर के संयुक्त तत्वावधान में नवीन विश्राम भवन (सिविल लाईन ) के कन्वेंशन हॉल  में  आयोजित अखिल भारतीय आदिवासी लेखक सम्मिलन में लेखिका शकुंतला तरार की लोक भाषा हल्बी में लिखित 101लेजा गीत जिसका 101 हिंदी अनुवाद  जो  शब्दार्थ सहित  है, पुस्तक का विमोचन अध्यक्ष साहित्य अकादेमी दिल्ली श्री माधव कौशिक जी, सचिव साहित्य अकादेमी डॉ श्रीनिवासराव जी, कुलपति महाराजा छत्रपति शिवाजी विश्वविद्यालय श्री डॉ केशरीलाल वर्मा जी, लोक साहित्य विद डॉ महेंद्र कुमार मिश्र जी, अध्यक्ष साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़, श्री शशांक शर्मा जी, साहित्यकार रुद्रनारायण पाणिग्रही जी के करकमलों से संपन्न हुआ

                    इस अवसर पर अध्यक्ष साहित्य अकादेमी  दिल्ली श्री माधव कौशिक जी और सचिव श्रीनिवास राव जी ने कहा कि लेखिका शकुंतला तरार की 101 हल्बी लेजा गीत जो गीत की एक विधा होती है जिसका शब्दशः हिंदी अनुवाद और साथ में शब्दार्थ सहित यह पुस्तक शोधार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी | इस अवसर पर देश भर से आए भाषाविद, साहित्यविद, कविगण , पत्रकार , जनप्रतिनिधि सहित शहर के गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही |  

Saturday, August 31, 2024

विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा -शकुंतला तरार ,संदीप तरार

जय माँ दंतेश्वरी 

बस्तर महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव जी 

विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा 

v शकुंतला तरार, संदीप तरार

    जगदलपुर बस्तर के ऐतिहासिक 75 दिन के दशहरा का प्रारंभ हरियाली अमावस्या के दिन पाठ जात्रा पूजा की रस्म के साथ ही प्रारंभ हो जाता है| दशहरा शुरू होने के पहले दिन राजा के द्वारा बस्तर क्षेत्र के विभिन्न देव गुड़ियों में नवरात्रि पर्व पर दीप प्रज्ज्वलित करने हेतु मंदिर पुजारियों, गांयता एवं प्रमुखों को 101 दीप-कलश, श्रीफल, अगरबत्ती, पीला-चावल सहित विविध पूजन सामग्री भेंट किया जाता है |दशहरा पर्व का प्रारम्भपरंपरानुसारकाछनगादी पूजा विधान  से  संपन्न होता है। काछनगादी पूजा बस्तर दशहरा का प्रथम चरण है. काछनगादी बेल काँटो से तैयार झूला होता है. पितृमोक्ष अमावस्या के दिन काछनगादी पूजा विधान संपन्न होता है. काछनगादी यानि देवी की गद्दी में मिरगान जाति की बालिका को काछनदेवी की सवारी आती है, जो बेल के कांटो के झूले पर बैठी  दशहरा पर्व मनाने एवं फूल रथ संचालन करने की अनुमति देती है। काछनगादी पूजा में मिरगान जाति की कन्या के द्वारा दशहरा पर्व मनाने की अनुमति दी जाती है, काछनगादी पूजा विधान के बाद गोल बाजार में जाकर रैला देवी (रैनी देवी) की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। काछनगादी पूजा एवं रैला देवी पूजा के दौरान दशहरा कमेटी के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, राजपरिवार के सदस्य, राजगुरु, मांझी,चालकी एवं अन्य गणमान्य नागरिकों की विशेष उपस्थिति रहती है |दशहरा में प्रमुख रूप से काछनगादी, पाट जात्रा, जोगी बिठाई, मावली जात्रा, भीतर रैनी, बाहर रैनी तथा मुरिया दरबार मुख्य रस्में होती हैं। “1725 ईसवी में काछनगुड़ी क्षेत्र में माहरा समाज के लोग रहते थे | तब तात्कालीन महाराजा दलपत देव जी से कबीले के मुखिया ने जंगली पशुओं से अभयदान माँगा | महाराजा इलाके में पहुँचे और उन्हें राहत प्रदान किया, वे वहाँ की आबोहवा से इतने प्रभावित हुए कि रियासत की राजधानी को बस्तर के बजाए जगतुगुड़ा में बनाया जो कालांतर में जगदलपुर के नाम से जाना गया | महाराजा साहब ने कबीले की इष्टदेवी काछनदेवी से आश्विन अमावस्या को आशीर्वाद व अनुमति लेकर दशहरा उत्सव प्रारंभ किया, बस तब से ही ये परंपरा इसी तरह चली आ रही है”|

          पहले दिन स्थानीय सिरहासार भवन में ग्राम बिरिंगपाल से लाई गई साल की टहनियों को गड्ढे में पूजा विधान के साथ गाड़ते हैं | इस गाड़ने की प्रक्रिया को डेरी गड़ाई कहा जाता है। तत्पश्चात जोगी बिठाईकी रस्म होती है जो कि दशहरा का पर्व निर्विघ्न संपन्न हो इस उद्देश्य से नौ दिनों तक उसी स्थान पर निराहार बैठे रहते हैं |कहते हैं कि जोगी को नौ दिनों तक स्वयं देवी द्वारा दिव्य भोजन कराया जाता है | इसकेदूसरे दिन से सप्तमी तक रथ परिचालन कर नगर भ्रमण कराया जाता है | महाष्टमी को निशाजात्रा की पूजा संपन्न होती है | नवमी के दिन जोगी उठाई की रस्म होती है फिर कुंवारी पूजा की जाती है | उसी दिन शाम के वक़्त कुवांरी पूजा की सामग्री को गंगामुंडा के जल में प्रवाहित कर दिया जाता है | यह कार्य केवल महिलाओं के द्वारा किया जाता है | उसके पश्चात् मावली परघाव की रस्म पूरी की जाती है जिसमें राजा के द्वारा दंतेवाड़ा से पधारी माई की डोली के स्वागत की परंपरा होती है जिसमें बस्तर के आमंत्रित देवी-देवताओं सहित राजा द्वारा स्वागत कर राजभवन प्रांगण जहाँ माई दंतेश्वरी विराजमान हैं वहाँ  तक लाई जाती हैं | अगले दिन दशहरा को,रथ परिचालन होता है जिसे भीतर रैनी कहा जाता है इसी दिन आदिवासियों द्वारा रथ की चोरी की जाती है और उसे कुमडाकोट ले जाया जाता है | जहाँ राजा दूसरे दिन नया खानी का त्यौहार मनाते हैं | दूसरे दिन बाहर रैनी पर कुमडाकोट में विशेष पूजा और शाम को रथ वापसी होती है | 


          अगले दिन काछन जात्रा देवी की बिदाई और मुरिया दरबार उसके अगले दिन ,कुटुंब जात्रा के साथ देवी-देवताओं को विदाई अर्थात बस्तर दशहरा में शामिल हुए बस्तर के सभी परगनाओं के देवी-देवताओं को अश्विन शुक्ल13को गंगा मुंडा कुटुंब जात्रामें पूजा-अनुष्ठान के बाद विदाई दी जाती है. माई दंतेश्वरी के अलावा विभिन्न देवी-देवताओं के छत्र-डोली आदि जात्रा स्थल पर पहुंचते हैं. इस कार्यक्रम को "ओहाड़ी" कहते हैं. पहले बस्तर दशहरा के विभिन्न जात्रा कार्यक्रमों में पशु बलि दी जाती थी  सैकड़ों पशुमुंड कटते थे, पर अब यह प्रथा बंद-सी हो गई है|

             इसके दूसरे दिन या वार देखकर दंतेवाड़ा की माईजी की डोली की विदाई के साथ पर्व का समापन होता है ।

                                                             7,8,2024      क्रमशः 

वनवासी संस्कृति से ओतप्रोतदुनिया में सबसे लंबी अवधि लगभग 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर का दशहरा पर्व समूचे विश्व में प्रसिद्ध बस्तर दशहरा में देश ही नहीं अपितु विदेशों से भी लोग इसके आकर्षण से खींचे चले आते हैं | इतने भव्य रथ को केवल इंसानों के द्वारा खींचा जाना भी मुख्य आकर्षण है दशहरा का | रथ को लकड़ी से दुमंजिला बनाया जाता है, इस भव्य रथ की खासियत यह है कि इसे एक विशेष वर्ग द्वारा ही निर्मित किया जाता है जो पर्यटकों के लिए खास आकर्षण का केन्द्र होता है। हर साल नये सिरे से बनाए जाने वाले इस काष्ठ निर्मित भव्य रथ का इतिहास पिछले 600 वर्षों से पीढ़ी दर पीढ़ी निर्बाध रूप से जारी है | रथ को बनाने के लिए पारंपरिक औजारों का प्रयोग किया जाता है इन्हीं पारंपरिक औजारों से माचकोट एवं तिरिया के जंगल से लाए गए साल वृक्ष के तने को चीर कर उसी की लकड़ी से रथ का निर्माण किया जाता है |



वर्षों से मेरी दिली इच्छा थी कि मैं बस्तर का दशहरा पर्व पहले दिन से लेकर उसके समापन मुरिया दरबार तक एवं माता की डोली की ससम्मान विदाई दंतेवाड़ा के लिए, वहां रहकर देखूंऔर अपने अनुभव आप सब के साथ साझा करूँ किन्तु पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण संभव ही नहीं हो सका | वर्ष 2018 दहशरा का वक़्त एक दिन बैठे-बैठे मैं और बेटा संदीप ने तय किया कि क्यों न इस वर्ष  जगदलपुर में मनाये जाने वाले विश्व प्रसिद्ध दशहरा उत्सव में शामिल हुआ जाय | दशहरा उत्सव शुरू हुए लगभग 6 दिन हो चुका था फिर भी रथयात्रा देखने का मोह मुझे खीँच ले गया जगदलपुर की ओर | प्रोग्राम बनते ही मैंने जगदलपुर निवासी साहित्यकार एवं बस्तर दशहरा को शिद्दत से महसूसने और जीने वाले भाई रुद्रनारायण पाणिग्राही को फोन किया, उनसे संपर्क नहीं हो पाया फिर मैंने भाई सनत जैन जी को फोन किया| फोन करने का कारण यह था कि इस वक्त जगदलपुर के सारे होटल बुक रहते हैं रहने की जगह नहीं मिलती | वैसे तो जगदलपुर में मेरे बहुत सारे रिश्तेदार रहते हैं किन्तु त्यौहार के वक्त किसी के घर पर रूकना यानि उनके लिए बंधन का कारण बनता है | बेटे का दोस्त ओमप्रकाश सिंह और उनका परिवार भी बहुत शील स्वभाव के, मेहमाननवाजी के लिए तत्पर, चाहते तो हम वहां भी रूक सकते थे उन्होंने हमारे रूकने का इंतजाम भी कर दिया था किन्तु मैं जिस उद्देश्य को लेकर उत्सव देखने गई थी वह समय खातिरदारी में निकल जातायह सोचकर मैंने होटल में ही ठहरना उचित समझा | खैर सनत भाई से पता चला की सारे होटल बुक हैं मगर राजमहल के काफी निकट आनंद लाज है जिसमें आपको कमरा मिल जाएगा | अंधे को क्या चाहिए  दो आँखें , मेरा तो दशहरा उत्सव देखने के आनंद को, आनंद लाज ने आनंद में बदलकर दुगुना उत्साह से भर दिया | वहां से मैं पैदल कई बार आना जाना कर सकती थी और मैंने किया भी | सप्तमी के दिन मैं और बेटा संदीप हमारी आल्टो 800 में रायपुर से जगदलपुर के लिए निकले | कांकेर में हमने शीतल दीदी के यहाँ से भोजन किया कुछ देर रुके और कोंडागांव के लिए निकले | केशकाल पहुँचने से कुछ पहले रास्ते  में घाटी से पहले आतुरगाँव के पास आनंदित करने वाला अद्भुत दृश्य सड़क के किनारे-किनारेअलग अलग स्थानों पर टोकरियों में सीताफल लेकर गाँव के लोग बैठे हैं, दीदी ने पहले ही बता दिया था कि खूब सीताफल मिलेगा जाते हुए, हमें इससे अच्छा और क्या चाहिए था भला ! हमने तुरंत गाड़ी रोकी खूब मोलभाव करके टोकरी भर सीताफल लिया कोंडागांव में भैया-भाभियों और बच्चों के लिए | यहाँ मोलभाव करके फल या सब्जी लेना अच्छा लगता है |बसें तो रूकती नहीं किन्तु जो स्वयं के साधन से आना जाना करते हैं वे जरुर रुक कर उनसे नाना प्रकार के मौसमी जंगली फल साग-सब्जी खरीदते हैं |वे यह भी जानते हैं कि जो यहाँ पहुँचते हैं वे हमसे मोलभाव जरुर करेंगे इसलिए थोडा बढ़ाकर बताते हैं किन्तु इतना ज्यादा भी नहीं कि लोग भाव सुनकर आगे बढ़ जाएं | वैसे भी जो दाम बताया जाता है वह आने जाने वालों के लिए बहुत सस्ता है क्योंकि शहर पहुंचकर उसकी कीमत दुगुनी से ज्यादा हो जाती है | ------|

सप्तमी के दिन हम कोंडागांव में विद्या भाभी और  मनीशंकर भैया भाभी के यहाँ रूके यानि मेरा मायका है वह | दुर्गा अष्टमी के दिन प्रातः जगदलपुर के लिए निकले, वहां पहुंचकर हमने आनंद लाज को अपना ठिकाना बनाया | नवमी के दिन प्रातः हम ओमप्रकाश सिंह के सरकारी आवास पर पहुंचे जहां निकट ही जिया डेरा है | आपको पता है !!! गाँव और गाँव के लोग, ठेठ ग्रामीण मेरी कमजोरी है पहुंचकर लगा----ओह क्या बात है क्या ही अद्भुत दृश्य वहां का, चारों तरफ लोग ही लोग ग्राम्यजन | माता मावली की डोली दंतेवाड़ा  से आकर जिया डेरा में विश्राम जो कर रही थीं | जिया डेरा यानि दंतेवाड़ा  के मंदिर के पुजारी का डेरा यहाँ आकर माताजी अभी भी मेहमान हैं जब तक कि उन्हें ससम्मान स्वागत सत्कार के द्वारा लिवाने राज परिवार, दशहरा समिति,अन्य सम्बंधित और गाँव-गाँव से दशहरा उत्सव मनाने पहुंचे विभिन्न देवी देवता |  पहुंचकर देखा हमने, चारों ओर गाँव के लोग इधर-उधर बिखरे हुए रंग-बिरंगे वस्त्रों से सुसज्जित माई की अगवानी में पहुंचे लोग और माई के दर्शन करने पहुंचे लोग, माई को दंतेवाड़ा  से लेकर आए श्रद्धालु, पुजारी सिरहा,गुनिया जिया उनके सहयोगियों की आवाजाही | उनके घर से हम लोग दंतेश्वरी माई की डोली जो दंतेवाड़ा  से लाई गई थी दशहरा उत्सव में शामिल होने के लिए के दर्शन करने गए | उस वक्त ऐसा लग रहा था यह वक्त यहीं ठहर जाए और मैं जी भरकर माई दंतेश्वरी केप्रतीक रूप (मावली माता) को निहार सकूँ |
                                                                                   8-8-2024- क्रमशः 
माई जी की खासियत ही यही है कि उनके दर्शन यदि दंतेवाड़ा में करना हो तो पारंपरिक तरीके से यानि धोती पहनकर हीमंदिर प्रवेश कर सकते हैं जींस या फुलपेंट में नहीं | और यहाँ जिया डेरा में भी माता के कक्ष में भी जींस या फुलपेंट वालों को यानि आपको भारतीयता या आदिवासी संस्कृति की रक्षा को तत्पर होना चाहिए | इसमें कोई कोताही बरतना नहीं चाहिए | नियम तो आखिर नियम होता है उसका पालन करना ही चाहिए वह भी अपने संस्कृति की रक्षा के लिए | सो प्रवेश करने नहीं दिया जा रहा था | यह बात मेरे मन को बहुत भाई, सुकून मिला, क्योंकि एक ही तो नियम सबके लिए लागू है अन्यथा आजकल पैसे वाले, पहुँच वाले, राजनेता ये सब पावर दिखाकर अपनी बातें मनवा लेते हैं किन्तु हमारे यहाँ के राजनेता भी जानते हैं माई तो आखिर माई हैं उनके आगे भला इंसानों की क्या बिसात |

मैंने अन्दर 
कर साष्टांग दंडवत कर देवी को नमन किया | जी कर रहा था अब वहाँ से हटना ही नहीं है जी भर कर माता के उस प्रतीक रूप में आई माई की डोली को निहार लूँ | माई के उस अद्भुत रूप के दर्शन कर मन धन्य-धन्य हो गया | माता के दर्शन कर हमने ओमप्रकाश सिंह के यहाँ भोजन किया और वापस पहुंचे सीरासार जहां 9 दिनों से जोगी बिठाई की रस्म अदायगी हुई थी | भीतर प्रवेश करने से पूर्व दशहरा देखने पहुंचे दर्शनार्थियों के हुजूम से हमारा सामना हुआ जिधर नज़र जाती लोग प्रसन्न मन से इधर से उधर, उधर से इधर तितलियों की तरह मंडरा रहे थे लगता जैसे राजमहल से लेकर सीरासर तक और उससे भी परे चारों ओर की जो परिधि है वह एक बहुत बड़ा बाग़ है जिसमें विभिन्न तरह के फूल चारों तरफ, खूबसूरत इतने कि जिधर भी जाओ जिधर भी देखो मन आनंदित हो उठे, चारों ओर तितलियाँ मंडरा रही हैं पराग लेने, हाँ सचमुच तो सभी मंडरा ही तो रहे थे माई के प्रेम रूपी रस का पान करने के लिए | उद्देश्य वही माँ के दर्शन, त्यौहार रूपी उत्सव का आनंद कहीं से थोड़ी सी भी माँ की कृपा उस पर हो जाए और हमारे आराध्य राजा के दर्शन हो जाएं | यहाँ ग्रामीणों में यह भावना आज भी विद्यमान है कि राजा ही आज भी उनके लिए सर्वोपरि हैं |शासन–प्रशासन अलग है उनका मान–सम्मान तो उनके राजा से है |



क्रमशः 31-08-2024 
आज भी दशहरा के पश्चात मुरिया दरबार का आयोजन किया जाता है | आज भी अपनी बात मुरिया दरबार में लोग अपनी, अपने गाँव की समस्याएँ रखते हैं और अक्षरश: उनका पालन भी किया जाता है | गाँव के सारे नियम कायदे कानून बनाए जाते हैं और उनका राजाज्ञा मानकर पालन भी किया जाता है | राजा की आज्ञा मतलब साक्षात माई दंतेश्वरी ने उन्हें आज्ञा दी है, उन्हें यह महती कार्य करने को अनुबंधित किया है | हालांकि अब इसमें शासन का सहयोग भी रहता है |मुरिया दरबार के दिन मुख्यमंत्री जी का आगमन होता है और राजा के साथ ही वे भी गाँवकारियों की समस्याओं से अवगत होते हैं, कई समस्याओं का 

निराकरण तुरंत भी किया जाता है |

हम माँ बेटा सीरासार भवन पहुंचे |सीरासार भवन के द्वार पर ही हमें पहले तो दो दर्शनार्थी महिलाएँ  मिली जिन्हें देखकर ग्रामीण सौन्दर्य, गहनों के साथ उनके अद्भुत रूप के दर्शन हुए |नवमी का दिन था और जोगी उठाईकी रस्म संपन्न हो चुकी थी किन्तुजोगी वहीँ बैठे थे और सबसे प्रेम से वार्तालाप कर रहे थे आने जाने वालों को उनके साथी, सहचर, अनुयायी नारियल का प्रसाद वितरण कर रहे थे |







परम्परा है कि नौ दिनों तक जोगी सीरासर भवन में दशहरा के निर्विघ्न संपन्न होने तक के लिए उपासना में बैठते हैं |


 वहां से निकले तो सामने पुराने ज़माने की चीजों का बाजार जिसे आज भी ग्राम्यजन उपयोग करते हैं | तभी तो बाज़ार की रौनक देखते बनती है | कहीं महिलाओं के श्रृंगार प्रसाधनके दुकानों की लम्बी कतारें वही सब चूड़ी,बिंदी और विभिन्न श्रृंगारिक वस्तुएँ जो हर जगह उपलब्ध होती है, कहीं लोहार द्वारा निर्मित चाक़ू-छुरी, कहीं खाने-पीने के सामान, होटल शहरी खानपान में मिठाइयाँ, छोले-भटूरे, पापकार्न, इडली दोसा, बड़ा-भजिया आदि इत्यादि | मैं दो सीका खरीदी जो सन डोरी से बना हुआ था | मुझे पता था यह मेरे किसी काम का नहीं है किन्तु कुछ न कुछ उपयोग होगा ही | संदीप ने पहली बार देखा था सो उसका मन कर ही रहा था क्यूँ न इसे ले ही लूँ और कुछ नहीं तो फूलों के गमले टांग लेंगे इसमें मगर लेना तो है ही | पहले के समय में इसी सन डोरी (रस्सी) से कांवड़ में बांधकरबड़े-बड़े मटका या पीतल का हंडा रखकर कुआं से पानी भरा जाता था|सन डोरी जल्दी ना घिसती है ना टूटती है इसलिए ये बहुत उपयोगी है |




इसी कांवड़ से दोनों तरफ बड़े-बड़े टोकने में धान रखकर राईस मिल में जाकर धान कुटवाकर लाते थे मेरे बाबा आदरणीय रतनलाल जी बाद में जब कुछ कमजोर हुए तो बनिहार लगाकर साथ में जाकर कुटवाते थे | ज्यादा पुरानी बात तो नहीं किन्तु बात उस समय की है जब शादियों में बफे सिस्टम नहीं था और लोग एक दूसरे के घरों में भोजन नहीं करते थे | मेरे भैया उमाशंकर की शादी के बाद में माँ ने एक बनिहार को लेकर सारे परिचितों के यहाँ दाल चावल रसोई जिसे यहाँ रोसई (रसोई जोड़ना ) जोड़ना कहते है, पहुंचा कर आई थी | खैर ----


वहां से चलकर हमने बाजे-गाजे वालों की टोलियों को पार करते हुए राजमहल के प्रवेश द्वार पर स्थित मंदिर में बस्तर की आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी के दर्शन किए|उसके बाद वहीँ मंदिर और राजभवन के मध्य के प्रांगण में हम घूमने लगे वहां का दृश्य तोअद्भुत था | वहां बस्तर के सभी जिलों और गाँव-गाँव से आमंत्रित माई के उत्सव में शामिल होने आए देवी-देवता, आंगा देवों का समूह  तटीय अन्य राज्य ओड़िसा, महाराष्ट्र आदि से पधारे देवी-देवताओं से चारों ओर निराली छवि शोभायमान हो रही थी |



कुछ लोग भोजन पकाने में व्यस्त थे तो कुछ लोग खुद भी इधर –उधर चहलकदमी कर रहे थे |

वहां राजमहल परिसर से निकल हम सड़क के पार माता मावली के मंदिर पहुंचे |

मंदिर का परिसर,अत्यंत शोभायमान, कुछ लोग विश्राम कर रहे थे तो कुछ इधर से उधर अकेले या समूह में घूम रहे थे | हम उस जगह पहुंचे जहाँ धनकुल का गायन विगत नौ दिनों से चल रहा था | धनकुल का गायन महिलाओं के द्वारा ही किया जाता है किन्तु कहीं-कहीं पुरुष भी धनकुल का गायन करते हैं | यहाँ -----गाँव के पुरुष गायन कर रहे थे जो की समाप्ति की ओर था |  



शाम का समय हुआ और सभी देवी-देवताओं के साथ मोहरी वादन और बाजे-गाजे के साथ स्वागत सत्कार की विधि का पालन करते हुए राजा की अगवाई में दंतेवाड़ा से दशहरा उत्सव के लिए पधारीं माई जी की डोली जिया डेरा से राजमहल के सामने पहुंची वहाँ पहुंचकर सभी विशिष्ट देवी देवता, आंगा देव, लाठ आदि झूम-झूम कर अपने बस्तर की कुलदेवी के स्वागत सत्कार में ख़ुशी से चौक पर बच्चों की तरह किलकारी भर रहे थे | अद्भुत दृश्य था , जिधर देखो मानव
समूहों की जिज्ञासा सभी के मन में एक ही चाह, हर कोई आती हुई माई के दर्शन कर खुद को कृत-कृतार्थ होने की कामना कर रहा था |

दशहरा के दिन सुबह 11 बजे जब हम दोनों राजमहल पहुंचे | जनता के अवलोकनार्थ राजा जी का  मुख्य दरबार हाल खुला हुआ था |उस वक़्त राजा कोमलचंद भंजदेव का आगमन नहीं हुआ था सो हमने कुछ तस्वीरें ले ली एक दूसरे की महाराजा प्रवीरचंद भंजदेव की तस्वीर के साथ किन्तु बिजली के प्रकाश व्यवस्था में तस्वीर तो अच्छे से दीख रहे थे हमारे द्वारा खींचे जा रहे फोटो अच्छे नहीं आए |

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(जनता दरबार-दशहरा के दिन जनता से मिलते हुए राजा अपनी कुर्सी पर विराजमान और जनता द्वारा उनके चरण स्पर्श कर खुद को कृतकृत्य मानते हुए)

 अद्भुत दृश्य राजा अपनी कुर्सी पर विराजमानहैं | वह कुर्सी जिस पर कभी महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव बैठा करते थे | जब तक कमलचंद्र भंजदेव का आगमन नहीं हुआ था दर्शनार्थी अपने साथ लाए हुए फूलों की माला बीच की कुर्सी पर श्रद्धापूर्वक अर्पण कर रहे थे | वर्तमान राजा कमलचंद्र भंजदेव के आते ही लोग उनके चरण स्पर्श के लिए आने लगे | यह समय राजा द्वारा जनता से मिलने का समय होता है | गाँवों से पधारे दर्शनार्थी कोई झुक कर तो कोई साष्टांग दंडवत कर रहा था क्या महिला क्या पुरुष सभी लोग | शहरी लोग जो अन्य राज्यों के हैं उन्हें छोड़कर बाकी लगभग सभी | आज भी लोग राजा को माई दंतेश्वरी के बाद अपना आराध्य मानते हैं | उन्हें लगता है कि हमारी आस्था की कड़ी महाराजा के साथ ही जुड़ी हुई है |आज भी उनकी याचना, फरियाद, दुःख-पीड़ा, सामाजिक समस्याओं का निराकरण राजा ही करेंगे बस्तर के लिए जो भी नियम कानून बनेंगे वे उनका शत प्रतिशत पालन करेंगे इस बात में पूरी इमानदारी बरती जाती है || तभी तो उनके लिए मुरिया दरबार का आयोजन किया जाता है जहां पर वे अपने मन की बात रखते हैं | आज भी आदिवासी समाज द्वारा वहां के नियमों का पालन समूचे बस्तर में किया जाता है |

मुरिया दरबार– प्राचीन समय से लेकर आज तक भी मुरिया दरबार का आयोजन निर्विघ्न संपन्न किया जा रहा है | यह मुरिया दरबार बस्तर दशहरा के दौरान संपन्न हुए सभी धार्मिक, सामाजिक,  रीति- रिवाजों , प्रथाओं  आदि प्रक्रियाओं पर विचार मंथन किया जाता है | जो खामियां होती हैं उनके सुधार पर चर्चा की जाती है | मुरिया दरबार----बस्तर दशहरा अंतर्गत  मुरिया_दरबार का आयोजन होता है . जिसके अंतर्गत पूरे आयोजन के दौरान हुई विभिन्न रीति रिवाज आदि  प्रक्रियाओं पर मंथन किया जाता है, भविष्य में इसे और बेहतर बनाने हेतु सार्थक चर्चा की जाती है और  उल्लेखनीय योगदान देने वालों को सम्मानित भी किया जाता है | इस आयोजन में मुख्यअतिथि के रूप में उस समय रहे मुख्य मंत्री  (मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ शासन) उपस्थित रहते हैं |  (सांसद व अध्यक्ष - दशहरा समिति), छत्तीसगढ़ शासन के मंत्रीगण, विधायकगण व अन्य जनप्रतिनिधि एवं प्रशासनिक अधिकारीगण मौजूद रहते हैं | मुरिया दरबार में बस्तर के राजा एवं प्रजा के बीच विचारों का आदान-प्रदान होता था. बस्तर के प्रत्येक माँझी-चालकी अपने क्षेत्र की समस्याओं को राजा के सम्मुख रखते थे. समस्याओं एवं शिकायतों के निवारण हेतु खुली चर्चाएं होती थी. यह मुरिया दरबार बस्तर का प्रमुख आकर्षण है

क्रमशः --28-10-2025