Sunday, March 22, 2026

भरथरी गायिका : सुरूज बाई खाण्डे-शकुंतला तरार

 

भरथरी गायिका : सुरूज बाई खाण्डे


घोड़ा रोवय घोड़सार माघोड़सारे मा वो

हाथी रोवय हाथी सार मामोर रानी ये वो

महल मा रोवयमोर राजा रोवय दरबार मा

दरबारे मा  भाई एदे जी।

सुरहिन गइया के गोबर, ए मँगाइके गा।

खुंटधर अंगना लिपाइके, मोतियन के ए ना।

मेर चउके ना, मोर घीये के दिया जलाइके।

ए जलाइके भाई ए दे जी........

सुन तो नारी मोर बाते ला

मोर बाते ला ओ, कातो जुवानी ए दिये हो।

भगवाने ह ओ, मोर करमे मा ना।

एदे का जोगनी मोला दिये हो,

मोला दिये हो भाई ए दे जी...

बरजे बाते नइ तो मानथे

मोर भरथरी हा, हरके बाते नइ तो मानत हे।

घोड़ा के सवार चले जावत दीदी

ए दे मिरगा के पाछू कुदावत हो, कुदावत हो,

भाई ए दे जी............।


 जब इन पंक्तियों के साथ राजा भरथरी की गाथा का गायन प्रारंभ होता है शरीर में झुरझुरी सी होने लगती है रोंगटे खड़े हो जाते हैं लगता है गाथा का आरंभ अगर इतना ही रोचक, आनंद दायक, अनुभूतिपरक है तो आगे न जाने क्या होगा ? कौन है जो इतने दर्द भरे स्वर में सुरों की पंक्तियों की माला पिरो रहा है ? और इन पंक्तियों को स्वर देने वाली साधिका का नाम है सुरूज बाई खाण्डे। सूरज को दीपक नहीं दिखाया जाता क्योंकि सूर्य तो स्वयं प्रकाश देकर संसार को जीने की राह दिखाता है। मगर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपनी उर्जस्विता से अपनी प्रतिभा की रोशनी से संसार में अपना और अपने परिवार का अपनी आने वाली पीढ़ी के नाम को प्रकाशवान बनाते हैं और ऐसे ही ओजस्वी कला सम्पन्न कलाकार प्रसिद्ध भरथरी गायिका का नाम है सुरूज बाई खाण्डे। आंचलिकधुन को अपने हृदय में समेटे लोक जीवन को समर्पित, मोहक, सुरीली, कर्णप्रिय, धुन से राजा भर्तृहरि के गाथा का गायन करने वाली सुमधुर कंठ की मलिका हैं-सुरूज बाई खाण्डे।

     राजा भृर्तहरि जिसे छत्तीसगढ़ में भरथरी नाम उच्चारित किया जाता है, उनकी जीवनी का वर्णन, कि कैसे वे राजगद्दी पर बैठे फिर उनके संन्यास लेने की करूण कहानी को गाथा के रूप में प्रस्तुत करना यह सुरूज बाई ही कर सकती हैं। उनके गायन की प्रस्तुति का अंदाज ही सबसे अलग है। कोई भी कथा कहानी लोक गीत जब प्राचीन समय से चले आते हैं, तबवे परम्परा का स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं।

     हाथों में इकतारा लेकर कई-कई घण्टे की प्रस्तुति देना सहज बात नहीं है। अपने नाना की परम्परा को उन्होंने जीवंत कर दिया। जब वे भरथरी का गायन करती हैं तो कथा के प्रसंगों के उतार-चढ़ाव के साथ ही श्रोता उनके भावों के प्रवाह में बहता चला जाता है। अवसर-अवसर की बात होती है और किस्मत की बात-पùविभूषण तीजन बाई जी को भिलाई स्टील प्लांट ने सुअवसर प्रदान किया और उन्होंने देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर ख्याति अर्जित की। दोनों में कितनी साम्यता है कि सुरूज बाई खाण्डे जी और तीजन बाई जी दोनों ने ही अपने-अपने नाना से इस परम्परागत गाथाओं की विधा को सीखा।

     उज्जयिनी नगरी जो आज भी प्रसिद्ध है महाराजा विक्रमादित्य की नगरी के नाम से, महाकवि कालिदास के नाम से, महाकुंभ के नाम से, भगवान महाकालेश्वर के नाम से और प्रसिद्ध है उज्जैन, राजा भर्तृहरि के नाम से।

 

उज्जैन के उन्हीं राजा भर्तृहरि की जीवन यात्रा को गाथा के रूप में गाए जाने की परम्परा न जाने कब से चली आ रही है किंतु इस परम्परा को आत्मसात करने वाली सुरूज बाई खाण्डे एक पर्याय के रूप में जानी जाती हैं। भरथरी यानि सुरूज बाई और सुरूज बाई यानि भरथरी।

     सुरूज बाई से जब मैंने इस बाबत कुछ वर्षों पूर्व साक्षात्कार किया था तो उन्होंने बताया था कि उनके गांव में जब रहस (कृष्ण लीला) का मंचन होता था तो उन्हें भी लगता काश मैं भी इसमें अपनी सहभागिता दे पाती किंतु उस वक्त नाटकों में पुरुष पात्र ही स्त्री पात्र की भूमिका निभाया करते थे। अर्थात् बाल्यावस्था में ही मन के अंदर जो हलचल पैदा हुई कुछ करने की चाह थी, इसी ललक ने ही उसे भरथरी गायन सीखने का रूझान पैदा किया।

     सुरूज बाई हमेशा सूरज की तरह दैदिप्यमान रही। जहाँ-जहाँ पùभूषण तीजन बाई जी का नाम लिया जाता है वहाँ सुरूज बाई को लोग अवश्य याद रखते हैं। आज भरथरी के गाथा गायन करने वाले कलाकार यद्यपि अभी भी सिर्फ उंगलियों में गिने जा सकने लायक भर हैं तथापि 80, 90 के दशक में हमारे सम्मुख सिर्फ एक ही नाम उभरकर आता है और वह नाम है सुरूज बाई खाण्डे। विडम्बना देखिए कि हमारे बीच इतने मूर्धन्य महान कलाकर होते हैं और हम उनकी कला का सम्मान करने का दिखावा करते हैं लेकिन जो नींव डालकर ये कलाकार जाते हैं वे हमारी धरोहर के रूप में होते हैं। उनकी महानता को सभी जानते हैं उनके आगे नत मस्तक भी होते हैं किंतु राजाश्रय के बिना उनका सही-सही मूल्यांकन नहीं हो पाता। उनकी कला की सराहना तो होती है किंतु व्यक्ति की, कलाकार की उपेक्षा की जाती है। वैसे ही सुरूज बाई के साथ भी हुआ। इतनी मूर्धन्य कलाकार जिसने अपने बचपन को, बालपन को समर्पित कर दिया लोक के लिए, बच्चों के साथ फुगड़ी खेलने की उम्र में वह हाथ में चिकारा लिए नाना के संग राजा भर्तृहरि की पावन गाथा, जिसे हम छत्तीसगढ़ में भरथरी के रूप में जानते हैं, के जीवन का विशद वर्णन है, 7 वर्ष  की उम्र से बाल्यावस्था में ही अपने नाना स्व. रामसाय घृतलहरे से मौखिक परम्परा के तहत भरथरी गायन सीखना शुरू किया और बहुत जल्द कंठस्थ भी कर लिया।

              ऐसा नहीं है कि उनके साथ कोई मजबूरी थी सीखने की! या उन्हें अर्थार्जन करना था। नहीं बल्कि लोक के प्रति झुकाव, सीखने की जिज्ञासा ने सुरूज बाई को वह दिव्यता प्रदान की जिसके लिए अच्छे से अच्छे गुणी, ज्ञानी, संत-महात्मा सारा जीवन खपा देते हैं। किंतु यह सौभाग्य तो सौभाग्यशालियों को ही प्राप्त होता है।

     आध्यात्मिक लोक नायक के रूप में प्रतिष्ठित राजा भर्तृहरि के जीवनवृत्त उनकी त्यागमूर्ति छवि, उनके उपदेशों, उनके पत्नी को माता रूप प्रदान करने की उदारता का नाम है भरथरी। अपना वैभव, अपना राजपाट, अपना सुख सब कुछ तो त्यागा उन्होंने। राजा-महाराजाओं के बारे में हम हमेशा सुनते आए हैं कि किस राजा ने कितनी शादियाँ की। किसी ने संतान न होने पर, किसी ने पराजित राजा-महाराजाओं की पुत्रियों से, तो कभी शिकार पर गए राजा को वन की किसी कन्या पर आसक्त होना। यह सब राजाओं के लिए आम बात थी किंतु एक पत्नी व्रती आदर्श के प्रतीक राजा भतृहरि के लिए यह सब संभव न था।

     जब-जब भी छत्तीसगढ़ का इतिहास लिखा जाएगा, वह इतिहास प्रख्यात लोक गायिका सुरूजबाई खाण्डे के नामोल्लेख के बिना अधूरा ही रह जाएगा। स्व. झाड़ूराम देवांगन, ùविभूषण तीजन बाई, स्व. देवदास बंजारे, स्व. पùश्री पूनाराम निषाद के समकक्ष सुरूज बाई ने आज जिस मुकाम को छुआ है निसन्देह छत्तीसगढ़ के लिए गौरव की बात है। वे जिस संस्कृति का गौरव गान करती हैं वे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य के बंटवारे में कहीं बंटकर रह गया है। हमने सोचा इस छोटे राज्य में हमारा आगत स्वर्णिम होगा, सृजन का नया प्रतिमान गढ़ेंगे। किंतु ऐसा होते हुए भी कहीं कुछ है क्या रिश्वत खोरी के चलते या राजनीतिक पहुँच का अभाव, चमचागिरी की अधिकता के कारण या कोई ऐसा मार्गदर्शक जो आगे बढ़ाने में मदद करे, का न होना भी राह में बहुत बड़ा बाधक बनता है।

     छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी भाषा को हमारे यहाँ की महिलाओं ने दुनिया के नक्शे में अमर कर दिया। आज पùभूषण तीजन बाई जी को लोक कला संस्कृति के क्षेत्र में पूरी दुनिया के लोग जानते हैं उन जैसी दबंग और साहसी महिला जिसके द्वारा 18 देशों में अपनी कला का हुनर दिखाना किसी आम व्यक्ति की बात नहीं फिर भी कहीं कुछ ऐसा घटित हो रहा है कि हमें मजबूरन स्त्री विमर्श का मुद्दा उठाना पड़ रहा है।

वाचिक परंपरा को संजोकर उसे प्रस्तुत करने का काम बहुत कठिन है जिस तरह से हम अपनी संस्कृति को बचाए रखने के लिए पुरातत्व को बचाए रखने के लिए यत्न करते हैं संग्रहालयों का निर्माण, रख-रखाव पर ध्यान देते हैं उसी तरह लोक कला, लोक संस्कृति की रक्षा के लिए लोक कलाकारों का संरक्षण उनके व्यवस्थापन पर ध्यान देना शासन के लिए आवश्यक है। ये एक ऐसा विषय है जिस पर मेरी आलोचना हो सकती है किंतु कुछ जन्मजात कलाकार हमारी धरोहर हैं। इन्हें यूं ही धूप में जलने से,शीत में ठंड से, वर्षा में भीगने से बचाने का यत्न होना चाहिए। अपनी भाषा अपनी बोली में पूरी दुनिया के आगे अपनी प्राचीन कला से अवगत कराया अभाव और गरीबी से जूझती रही। उम्र के चौथे प्रहर में आकर जब इंसान अभाव झेलता है तो वह समय से पहले ही टूटकर बिखर जाता है।

     यह एक अतृप्त स्त्री की व्यथा है जिसे वे प्रस्तुति में तो व्यक्त नहीं करती किंतु जब भी मैं उनसे मिली हूँ उनके भावों में दीनता परिलक्षित होती, मुझे ऐसे आशा भरी निगाहों से देखती मानो मैं ही पùश्री हूँ। मुझे उनकी आंखों में एक प्यास दिखाई देती। पीड़ा भरी प्यास, जीवन भर की साधना के प्रतिफल की प्यास। यह एक कटु सत्य है कि जब सुरूज बाई ने गायन सीखना प्रारंभ किया वह उनके लिए एक गुरूकुल के समान था, वे नहीं जानती थी कि उन्हें आगे चलकर किसी सम्मान के लिए प्रस्तुति देनी है। किन्तु उनके मन की ललक, कुछ नया कुछ अच्छा करने की ललक, लोक कला के प्रति उनका झुकाव यह मात्र शौक नहीं था ना ही पैसा कमाने का जरिया था। जब उनसे साक्षात्कार के लिए मैं उनके एस.ई.सी.एल. के निवास में पहुँची थी तब उन्हांने मुझे बताया था कि उनके गांव में भी रहस का आयोजन किया जाता था साल में एक बार तब मैं रहस देखने जाया करती थी। रहस के कलाकारों की बेबाक और खूबसूरत प्रस्तुति से मेरा भी लोक के प्रति झुकाव हुआ और मेरे नाना तो लोक गायक थे ही सो मैंने उनसे ही लोक की समस्त विधाएँ ददरिया, करमा, लोक गीत और राजा  भर्तृहरि की गाथा भरथरी, चंदैनी, ढोला मारू इत्यादि जो उन्हें कंठस्थ थी उन्हें आत्मसात किया।

     एक अच्छी शिष्या बनकर उनके नाम से दुनिया को परिचित होने का अवसर मिला। वे एक ऐसी लोक गायिका हैं जो भरथरी का पर्याय बन चुकी हैं। बाद में उनकी कई शिष्याएँ हुईं किंतु देश विदेश में अपने भरथरी गायन कला से प्रसिद्धि प्राप्त करने वाली आप एक मात्र गायिका हैं। आपके अलावा भरथरी गायन करने में रेखा जलछत्री, रेखा देवार, सीमा कौशिक, वंदना वर्मा आदि का नाम लिया जा सकता है।

     सुरूज बाई खाण्डे का जन्म (तारीख ज्ञात नहीं) 1949 को बिलासपुर जिला के ग्राम पौंसरी सरगांव में हुआ। इनका विवाह रतनपुर के लखन खाण्डे से हुआ। वे दो बेटों की मां भी बनीं किंतु गांव में इलाज के अभाव में उनकी मृत्यु हो गई। तब वे बिलासपुर के कुदुदण्ड में आकर रहने लगी और मेहनत मजदूरी कर पेट भरती। आपने बताया कि अपने नाना रामसाय धृतलहरे से भरथरी लोक गाथा, ढोला मारू, चंदैनी आदि सीखा है बाल्यावस्था से ही जब वे 5-7 साल की रही होंगी अपने नाना को भरथरी का गायन करते सुनती तो भाव विभोर हो उठती और मन लगाकर सुनते-सुनते उन्हें पूरा भरथरी कंठस्थ होने लगा। इसी तरह ढोला मारू और चंदैनी को भी उन्होंने अपने नाना से ही सीखा। आपको पहली बार गाने का अवसर रतनपुर के मेले में मिला। शहर के लोक कलाकार श्री जवाहर बघेल ने पहली बार मंच दिलवाया। पश्चात मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद ने आपकी हुनर को पहचानकर 1986-87 में सोवियत रूस में आयोजित भारत महोत्सव में कार्यक्रम प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया। इसके अलावा प्रख्यात रंगकर्मी श्री हबीब तनवीर के साथ बहुत सारा कार्यक्रम देने का अवसर मिला।

     1985 में पूर्व मंत्री बी आर यादव ने विधानसभा चुनाव के प्रचार का जिम्मा दिया। उन्हीं की सिफारिश सेएवं लोक कला के सरंक्षण के लिएएस.ई.सी.एल. ने आपकी प्रतिभा को देखते हुए आपको बतौर संरक्षण अपने यहाँ चतुर्थ श्रेणी की नौकरी पर रख लिया जहाँ वे अधिकारियों को पानी पिलाने का काम करती थीं। उन्होंने बताया था कि लोक के माध्यम से निरक्षर होने के कारण उन्हें एसीसीएल में चाय और पानी पिलाने की नौकरी मिली। आज भी मैं सभी अधिकारियों के कमरों में बॉटल में पानी भरकर रख के आती हूँ डाक पहुँचाती हूँ। छुट्टी न मिलने से मुझे बहुत से अच्छे-अच्छे कार्यक्रमों से इन्कार करना पड़ता है। कई बार तो कार्यक्रमों के आमंत्रण की जानकारी भी नही देते। रोजी-रोटी का जरिया तो मिला िंकंतु मेरी कला का क्षरण होना शुरू हो गया।

     2000-01 में मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने देवी अहिल्या बाई सम्मान से सम्मानित किया था। छत्तीसगढ़ में दाऊ रामचंद्र देशमुख सम्मान और स्व. देवदास बंजारे सम्मान से आप सम्मानित हुई..............में छत्तीसगढ़ शासन का प्रतिश्ठित राज्य सम्मान दाउ मंदराजी सम्मान से आप सम्मानित हुईं। किंतु आपका असल सम्मान तो तब था जब आपको देश का उच्च सम्मान पùश्री सम्मान से सम्मानित किया जाता। जीवन भर लोक कला के माध्यम से अपनी आवाज के हुनर को प्रदर्शित करने वाली इस स्वर साधिका ने पùश्री की आस लिए ही इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

आपका कहना था कि वरिष्ठ लोक कलाकार होने के नाते मुझे भी यह सम्मान मिलना चाहिए था किंतु शासन के मापदंड का मुझे पता नहीं। पद, प्रतिष्ठा, पहुँच, नेतागिरी वालों को ही बड़ा सम्मान दिया जाता है और अब तो छत्तीसगढ़ में यह सामान्य बात हो गई है। उनका दुख जायज है। सुरूज बाई जी ने किसी सम्मान के लालच में इस क्षेत्र को नहीं चुना था अपितु कुछ लोगों के सम्मान होने से सम्मान स्वयं सम्मानित होता है। वे तो एक निर्बाध नदी की तरह थीं जो सदा अविरल बहती थी किसी परिस्थिति देशकाल की परवाह किये बिना अपनी भाव धारा में और इसमें साथ देते थे उनके स्वयं के पति श्री लखन खाण्डे जी। लखन खाण्डे जी भी एस.ई.सी.एल. में ही नौकरी करते थे। अच्छे कलाकारों के साथ कुछ दुर्भाग्य भी होता है। सुरूज बाई जी ने दुर्घटना की वजह से नौ साल पहले ही रिटायमेंट ले लिया था।

     रूस, दुसाम्बे आदि 18 देशों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी देश भर में अपनी प्रस्तुति से सबका मन मोह लेने वाली सुरूज बाई खाण्डे एसईसीएल में बतौर कलाकार चतुर्थ वर्ग कर्मचारी की हैसियत से रिटायरमेंट होने तक अधिकारियों को पानी पिलाने का काम करती रहीं। वर्षों पूर्व मध्यप्रदेश के देवी अहिल्या सम्मान के अलावा अन्य कई सम्मानों से सम्मानित सुरूज बाई को हमेशा से यह मलाल रहा है कि 50 वर्षों से अधिक समय तक अपनी लोक कला के माध्यम से प्रदेश ही नहीं अपितु देश का नाम रौशन करने के बाद भी क्या मुझे पùश्री लिए बिना ही इस दुनिया से विदा लेना होगा। आगे वे कहती हैं अपनी कला और मंच को मैं छोड़ नहीं सकती कला ही मेरी ऊर्जा है और कला ही मेरा जीवन।

     दरअसल छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी साहित्य को सामर्थ्यवान बनाने में लोक कलाकारों का योगदान अतुलनीय है। इन्होंने देश में ही नहीं अपितु विदेशों में भी छत्तीसगढ़ी भाषा में अपनी मौखिक कला का प्रदर्शन कर स्वयं तो ख्याति अर्जित की साथ ही भाषा को भी समृद्ध किया, एवं विश्व में छत्तीसगढ़ प्रदेश को सम्मानजनक नाम दिलाया।

     प्रदेश का गौरव बढ़ाने वाली देश के कई स्थानों में रायपुर, भोपाल, दिल्ली, महाराष्ट्र, ओड़िसा, इंदौर आदि कई शहरों और राज्यों में अपनी प्रस्तुति से प्रभावित करने के बाद लगभग 18 देशों में कला का प्रदर्शन कर ख्याति अर्जित करने वाली सुरूज बाई खाण्डे, ùविभूषण डॉ. तीजन बाई सहित समकालीन स्व. देवदास बंजारे एवं अन्य वरिष्ठ लोक कलाकारों के साथ अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी हैं छत्तीसगढ़ के कला मर्मज्ञ और संस्कृति विभाग सभी को ज्ञात है कि सुरूज बाई खाण्डे को वर्षों पूर्व ही पùश्री मिल जाना चाहिए था। मृत्यु के अंतिम क्षणों तक वे इसी आस में थी कि उनके शव को भी तिरंगा में लपेट कर विदा किया जाय किंतु पùश्री की, तिरंगे की उनकी आस अधूरी ही रह गई और छत्तीसगढ़ महतारी की यह होनहार लोक गायिका के जीवन का सूरज भी अस्त हो गया। आज भी सतनामी समाज और सतनामी धर्म परिषद प्रयासरत है कि मृत्युपरांत भी उनके नाम के आगे सम्मानजनक पùश्री जुड़ जाए।

     किंतु क्या उनका नाम या उनकी कला कभी अस्त हो पाएगी? नहीं! कलाकार भले ही मरते हों किंतु उनकी कला कभी मरती नहीं। उसी तरह जब तक मानव जीवन है सुरूज बाई जी की कला यानि भरथरी और सुरूज बाई एक दूसरे के पूरक बनकर साहित्याकाश में सदा के लिए चमकते रहेंगे धु्रवतारे की तरह।

     संदर्भ-1-साक्षात्कार –बिलासपुर निवास से लिया था

2-नारी का संबल ,

3-गूगल से

 

 

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