Friday, May 22, 2026

एक भेंट --जयप्रकाश मानस ---अद्भुत विद्वान, निराला व्यक्तित्व ---शकुंतला तरार

 

एक भेंट --जयप्रकाश मानस ---अद्भुत विद्वान, निराला व्यक्तित्व ---


         एक लम्बे अंतराल अर्थात लगभग दस साल से ऊपर हो गया होगा हमें एक ही शहर में रहते हुए इस बीच लगभग सैकड़ों आयोजन हुए होंगे किन्तु वे कहीं दिखाई नहीं दिए और हमारी भेंट नहीं हो पाई इसका कारण जो भी रहा हो किन्तु बहुत ज्यादा नहीं बाद में बताती हूँ |

         



         हुआ यूँ कि पिछले जून माह में साहित्य अकादेमी दिल्ली का एक कार्यक्रम साहित्य अकादमी  रायपुर छत्तीसगढ़ के संयुक्त तत्वावधान में स्थानीय सर्किट हाउस के सभागार में संपन्न हुआ | संयोग से उस कार्यक्रम में मानस जी और मैं एक सत्र में एक साथ मंच पर बैठे थे | उसी दौरान हमने खूब बातें की | लगा ही नहीं कि इतने सालों बाद मिले हैं या ऐसे कि बरसों से मन के अन्दर जो दबा हुआ है वह कब बाहर निकले किन्तु मंच की भी एक मर्यादा होती है अतः हमने बातें तो कीं किन्तु मन नहीं भरा | 

      फेसबुक के माध्यम से  वे मुझे कभी कभार देखते रहे किन्तु फिर से हमारे बीच वही चुप्पी या वीरानी छाई हुई थी कि और एक आयोजन  22 मई को छत्तीसगढ़ भाषा साहित्य अकादमी, जय जोहार साहित्य संस्थान और छत्तीसगढ़ मित्र के संयुक्त तत्वावधान में पुस्तक विमोचन और काव्य पाठ का कार्यक्रम स्थानीय विमतारा में संपन्न हुआ जहाँ केलिफोर्निया की प्रवासी भारतीय डॉ अनीता कपूर का आगमन हुआ था |  वहाँ  हम फिर मिले किन्तु वे मंच पर और मैं सामने प्रथम पंक्ति में दर्शक दीर्घा में औपचारिक अभिवादन हुआ किन्तु पारिवारिक कार्यवश उन्हें जाना था  | उन्होंने अपना वक्तव्य दिया और निजी कारणों से प्रस्थान कर गए | हमारी फिर बातचीत नहीं हुई |

      किन्तु इस कार्यक्रम से पूर्व एक कार्यक्रम की पूर्व सूचना उन्होंने मुझे दे दी थी इसलिए मैं निश्चिन्त थी कि अब पुनः भेंट तो होनी ही है किन्तु कार्यक्रमों के अवसर पर हम कम ही बातें कर पाते हैं क्योंकि सभी अपने आप में व्यस्त होते हैं और आयोजक तो बहुत ज्यादा व्यस्त |

मंगलवार कि रात लगभग ग्यारह बजे वाट्स अप पर उन्होंने 29 तारीख़ के कार्यक्रम का निमंत्रण मुझे भेजा जिसमें आयोजन सममिति में मेरी पत्रिका “नारी का संबल” का भी नाम था | उनकी सहृदयता, सदाशयता की के प्रति नत होते हुए , उन्हें जागते हुए जानकर मेरी थोड़ी सी बात हुई और मैं बुधवार के दिन दोपहर एक बजे उनसे मिलने उनके ऑफिस में पहुँची | हम दो घंटे बातचीत करते रहे इस बीच जयभारती चंद्राकर और डॉ सीमा सीमा श्रीवास्तव जो साहित्यकार भी हैं उनको भी चेंबर में बुलवाया | खूब बातें हुई | वैसे भी रायपुर में डॉ सुधीर शर्मा और जयप्रकाश मानस को सदा से ही अपने छोटे भाई की तरह मैंने देखा है और विद्वान आदरणीय आचार्य  नर्मदा प्रसाद मिश्र जी से मुझे परोक्ष रूप से साहित्य विधा पर बहुत कुछ सीखने को मिला है | तीनो बहुत विद्वान् हैं |

मानस जी ने  मुझे सुभाष मिश्र जी द्वारा लिखित सम्पादित छत्तीसगढ़ की विभूतियों के ऊपर दो भागों में लिखित पुस्तकें भी दीं | यह कहते हुए कि मेरे पास इसके दो सेट हैं  एक आप ले जाइए |

अब बताऊँ कि हमारी अब तक भेंट कैसे नहीं हुई तो उन्होंने बताया कि नवा रायपुर में लगातार सात वर्षों से ड्यूटी होने से लौटकर किसी कार्यक्रम में जाने योग्य मन नहीं करता था वहाँ से लौटते थे तो थक जाते थे यही वजह है दीन दुनिया से कटे रहने का कारण | हालाँकि मैं इससे बहुत ज्यादा सहमत नहीं हूँ |

जयप्रकाश मानस जी की खूबी यह है कि वे शब्दों के जादूगर हैं | थोड़ा मूडी भी हैं शब्दों को तौल मोलकर,सोच समझकर बोलते हैं |  और मैं उन्हीं शब्दों के बीच खुद को खोकर कुछ गुनते हुए , कुछ बुनते हुए वापस घर को लौट गई |

शकुंतला तरार           

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