व्यक्तित्व----
जिज्ञासा से लबालब भरी कवयित्री, वरिष्ठ साहित्यकार, संपादक श्रीमती शकुंतला तरार --
डुमनलाल ध्रुव
💐💐💐💐💐💐💐💐काफी लंबे समय से साहित्य की सेवा
करने वाली श्रीमती शकुंतला तरार के रचना संसार और विशिष्टताओं से नयी पीढ़ियों को
अवगत कराना बहुत जरूरी है। बस्तर के कोंडागाँव
जिला में 13 जुलाई 1957 को श्री रतनलाल जमनाबाई देवांगन के घर
में जन्मी, पली-बढ़ी, एम. ए. राजनीति शास्त्र और संगीत की शिक्षा के साथ श्रीमती शकुंतला तरार के
व्यक्तित्व की प्रतिछवि का होना कोई आश्चर्य नहीं ! "नारी का संबल"जैसी
पत्रिका का संपादन स्मृतियों के विवरण के साथ बहुत ज्यादा ही प्रभावी रहा है |
जिज्ञासा से लबालब, अनुशासन और अनुसरण की महत्ता को
निरुपित करती हैं आप। कवयित्री होने के साथ एक बड़ी जवाबदारी है सामाजिक, सांस्कृतिक और दायित्वबोध के साथ लिखना।
शकुंतला तरार
की कविताओं में बस्तर की सांस्कृतिक झलक प्रेरक शक्ति की तरह दिखाई देती है। बन
कैना, बस्तर का क्रांतिवीर गुंडाधुर, बस्तर की लोक कथाएँ, बेटियाँ छत्तीसगढ़ की, टेपारी, चूरी, घरगुंदिया, मेरा अपना बस्तर, महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी, बस्तर चो फुलबाड़ी, बस्तर चो सुंदर माटी, राँडी माय लेका पोरटा , बेटियाँ
छत्तीसगढ़ की, शकुंतला चो लेजा गीद जैसी
कृति भावी पीढ़ी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है ।
आने के
दुख ला मेटाके देख लव
पीरा मा
घलो मुस्किया के देख लव
जिनगी
कईसे हाँस के पहा जाही
गीत ला
थोकन गुनगुनाके देख लव।
श्रीमती शकुंतला तरार सही अर्थों में भीतर के
दुख को मिटाने का उद्दीम करती हैं, वह अपने साथ एक गुनगुनाहट लाती हैं, मगर वह जीवन संत्रासों से पराजित हो जाए तब यह कहकर
संतोष हो जाती हैं कि-कोई दुख साहस से
बड़ा नहीं होता हारता वही है जो लड़ना नहीं जानता। परंतु यह स्थितियाँ भी जीवन के
कई बिंब अनुभूतियों और अनुभवों को अपने साथ लेकर चलती हैं ।
सरी
मंझनिया
झेंझरा
कस फरिया म
मछरी
छींचत
त कभू
खेत खार
मा
नांगर
बइला कुदावत
बर पीपर
के छईंहा मा
झूलना
झूलत
त कभू
डांडी
पउहा खेलत
कहंचो
इत्ता
-इत्ता पानी घोर -घोर रानी गावत
सुवा,ददरिया थपड़ी पीटत
सुरुज
आय होही
आज मोर
गाँव मा
शकुंतला तरार ने
ग्रामीण जीवन व बचपन को बखूबी निभाया है। जिंदगी के सही मायने में सुआ - ददरिया, इत्ता -इत्ता पानी घोर -घोर रानी किसी न किसी रूप में
गाया है। भले ही आज उसकी पहचान करना कठिन हो गया । दोहरे मानदंड जीवन के वैशिष्ट्य
को बहुत खुलेपन से उजागर करते हैं ।तभी तो वे कहती हैं --
जब मैं
अमरेंव गाँव के मुहाटी
लईका
खेलत रिहिन भँवरा बाँटी
पीपर
कांधा म कूदत रिहिन बेंदरा
संईतत
गोबर मोला दिखिस मंटोरा
जान
गयेंव इहीच्च मोर गाँव ए
किसी गाँव
के गंभीर दृश्य को देखकर लोग यह जान जाते हैं कि गाँव समय के
सच को बहुत ही इमानदारी से बयान करते हैं। जो गाँव समय के सच को बयान नहीं कर सकते उस गाँव का कोई महत्व नहीं है। और न ही इतिहास उसे अपने
में जगह दे सकता है।
अनुभूतियाँ तो होती है भँवरा बाँटी,पीपर खाँधा,बेंदरा और मंटोरा की रचनाएँ जो मानसरोवर के जल में तैरते हुए हंसों की पाती
की तरह गाए जाते हैं मोर गाँव में। गाँव
के युग की ध्वनि को संवाद में परिवर्तित करने का अनूठा प्रयास किया है
कवयित्री शकुंतला तरार ने । इससे अच्छी बात और क्या हो
सकती है ।
मेरे
गीतों को रवानी दे गया
प्यार
की अपनी निशानी दे गया ।
फूल से
चेहरे न मुरझाएँ कभी
दिल को
राहत ए रूहानी दे गया।
इश्क़
हो जाए तो ये दिल क्या करे
सोचकर
अपनी कहानी दे गया ।
खुश हुई
मैं पाके अपनी मंजिलें
दर्द
मेरी वो पुरानी दे गया ।
प्यारी
सी उसकी अदाएँ शोख भी
मुझको
चूड़ा खानदानी दे गया।
बहुत ही सहज और बोधगम्य भाषा में शब्दों को
विस्तार दिया है। शब्दों में बसा लालित्य
और भावपक्ष जिंदगी के विभिन्न आयामों से जोड़े गए हैं। वह कवयित्री की हार्दिक
निश्छलता को व्यक्त करती है ।
यहाँ साल सागौन शीशम के पेड़,
यह झेलते झंझा के झेल
यहाँ आम इमली तेंदू चार
आपस में करते प्रेम प्यार
नहीं होता आपस में कोई दंगल
बस्तर के ये घने जंगल ।
"महानदी की धारा हूँ " ये पंक्तियाँ मुझे इसलिए प्रभावित करती है क्योंकि
इसमें एक शाश्वत सच की अनुगूँज है और कथ्य की विशेषता है ।
महानदी
की धारा हूँ, मैं महानदी की धारा हूँ
मैं
कलकल - छलछल बहती ,
सबका
दुख दारुण हरती
संताप
मिटाने आई हूँ
मैं महानदी की धारा हूँ
शकुंतला तरार ने बस्तर से लेकर महानदी का
स्वतंत्र चित्रण अपनी कृतियों में किया है | प्रकृति को प्रतीक के रूप में भी
अपनाया है। अपनी रचना धर्मिता को अधिक रमणीय बनाने के लिए लोकशैली का आश्रय नए
स्वरूप को सिरजाती है ।
डुमन लाल ध्रुव 11.4.2022
