Tuesday, June 10, 2014

''नारी का संबल'' साहित्य, कला, संस्कृति की त्रैमासिक पत्रिका

नारी का संबल 

साहित्य, कला, संस्कृति की त्रैमासिक पत्रिका नारी का संबल के शुरू के तीस अंक 



































Sunday, June 8, 2014

छत्तीसगढ़ के साहित्यकार --शकुंतला तरार 

















बुजुर्गों की तरह रक्षा करते ये पेड़

              बुजुर्गों की तरह रक्षा करते ये पेड़ 


           मेरे घर के सामने एक बंगाली परिवार रहता है. उनके घर दादा की  मृत्यु को लगभग दस साल हो गए हैं दादा तो चले गए किन्तु उन्होंने जो बिरवा रोपा था आम के रूप में वह आज बहुत बड़ा पेड़ बन गया है उसे देखकर मुझे ठंडी शीतल छांह का एहसास होने लगता है . आज अल सुबह से ही कोयल बहुत जोर-जोर से कूक रही थी. कोयल की कूक से मन तरंगित होने लगा था यूँ लग रहा था मानो  मैं किसी दंडक बन में विचर रही हूँ और कोयल की  मीठी तान सुन रही हूँ  कई सितार एक साथ बज उठे हों जैसे कहीं पास ही में झरनों का कलकल निनाद --जीवन में कितना सुकून, कितना आनंद है उस एक क्षण ने मुझे एहसास करा दिया था ..तभी स्मरण हुआ कि विकास की रफ़्तार ने हमारे इन बड़े- बड़े छायादार वृक्षों को  अपने अपने ऊपर कुल्हाड़ी चलाने को मजबूर कर दिया है आज हम थक कर किसी पेड़ की छाँव तले  सुस्ताने की कल्पना भर कर सकते हैं. जैसे -जैसे दिन चढ़ता गया कोयल की आवाज़ मद्धम होती गई और वह इस वक्त बिलकुल भी चुप हो गई है . 46 डिग्री तापमान में भला किसकी मधुर स्वर लहरी गूंजेगी . आज सारे पेड़ों को कटवाकर हम वास्तु  के पीछे भाग रहे हैं घर के  गमलों में पीपल, बरगद, नीम, नीबू, संतरा के बोन्साई लगा रहे हैं वहीँ बांस के शो पीस सजा रहे हैं, पुराने ज़माने में घर के चारों और हरियाली ही हरियाली होती थी लोग घर बनाने से पहले पेड़ पौधों के बारे में सोचते थे घर पर ही बाड़ी में नीम, आम, इमली, अमरुद आदि के पेड़ लगाये जाते थे जहाँ फल तो हमें मिलता था साथ ही दिल को सुकून पहुँचाने वाली ठंडी हवाएं, गरमी में ठंडी शीतल छाँव, पूजा की लकड़ी एवं अन्य ज़रूरतों के सामान भी. हर्रा, बहेड़ा, आंवला, महुआ ये भी कहीं न कहीं दिख ही जाते थे ...मेरे पिता स्व. रतनलाल देवांगन जब तक जीवित रहे आम की छाल की शर्तिया दवा बना कर  दस्त पीड़ित को पिलाते थे तो पेचिश का कैसा भी मरीज हो एक खुराक में ही आराम महसूस करने लगता था ---आज हमारे बुज़ुर्ग एक-एक कर जा रहे हैं साथ ही बुजुर्गों की तरह हमारे रक्षक ये पेड़ भी विलुप्ति के कगार पर हैं. आने वाली पीढ़ी के हाथ लगेगा तो सिर्फ बोन्साई, गमले के फूल-पत्ते और रस हीन, गंधहीन केवल खूबसूरत दिखने वाले पेड़ पौधे....शकुंतला तरार -09-06-2014 





Sunday, May 11, 2014

काव्य पाठ

कल 10-05-2014 को वृन्दावन हॉल सिविल लाइंस में छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य मंडल द्वारा आयोजित काव्य संध्या में काव्य पाठ करते हुए मैं -----

Friday, May 9, 2014

लेख--नारी निर्जीव वस्तु नहीं --नारी विमर्श

22 अप्रैल 2014 को रायपुर के दैनिक अखबार चैनल इंडिया के सम्पादकीय पेज  में नारी विमर्श पर मेरा एक लेख छपा है

काव्य संध्या 4-05-2014


''तू जो कहे मैं बनके चांदनी तेरे मुंडेर पे आऊँगी''

4-मई 2014 /छत्तीसगढ़ सिन्धी साहित्य संस्था और छत्तीसगढ़ सिन्धी नाटय  मंच के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित काव्य संध्या में  काव्यपाठ करती हुई मैं शकुंतला तरार --- इस काव्य संध्या की खासियत यह थी की मंच पर केवल महिलाओं को ही स्थान दिया गया था --सर्वप्रथम काव्य संध्या की  शुरुआत का  सञ्चालन किया शकुंतला तरार ने तत्पश्चात  शशि दुबे ने सञ्चालन किया --इस काव्य संध्या के संयोजक थे कवि राजकुमार मसंद जी और भाग लेने वाले  कवि कवयित्रियों में  लतिका भावे , डॉ.संध्या रानी शुक्ला , उर्मिला उर्मी , अमरनाथ त्यागी, गौहर जमाली, सुखनवर , राममूरत शुक्ल,राजेश  जैन राही, सुशिल भोले,तेजपाल सोनी, गोपाल सोलंकी ,गोविन्द देव अग्रवाल ,नदीम नूर के आलावा शहर के बहुत सारे कवि-कवयित्रियाँ , श्रोतागण ,सिन्धी समाज के प्रबुद्ध और गणमान्य नागरिक उपस्थित थे .......