Thursday, June 12, 2014

''चित्रकोट'' का जल प्रपात

 बस्तर में स्थित पर्यटन स्थल चित्रकोट का जलप्रपात   





chitrakot   भारत का सबसे बड़ा जलप्रपात ''चित्रकोट'' छत्तीसगढ़ के बस्तर में स्थित है उसी जल धारा  के सामने तस्वीर खिंचवाती मैं।...जलप्रपात की सुन्दरता को और प्रकृति के इस विहंगम दृश्य को देखकर मन करता था वहीँ घंटों बैठी रहूँ और प्रकृति पर गीत लिखती रहूँ ...  पर्यटन की दृष्टि से छत्तीसगढ़ अत्यंत समृद्ध है... इससे पहले मैंने विश्व प्रसिद्द कुटुमसर की गुफा से अपने फेसबुक के मित्रो को परिचित कराया था अब चित्रकोट का यह जलप्रपात ..बारिश के दिनों में इसकी जलधाराएँ  पूरे शवाब पर होती हैं  ..शकुंतला तरार 

''बन कैना'' शकुंतला तरार

माँ शारदे की वंदना के साथ ही प्रस्तुत है बन कैना के छत्तीसगढ़ी गीतों का सफ़र--

( कृपया कास को कस पढ़ें )





Wednesday, June 11, 2014

बन कैना काव्य संग्रह शकुंतला तरार

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद एक महिला साहित्यकार द्वारा प्रकाशित   प्रथम काव्य संग्रह बन कैना ---
इस कवर पेज के बाद कल से कोशिश रहेगी कि प्रतिदिन एक कविता इसी पुस्तक की आप सब के लिए प्रकाशित कर सकूँ  

Tuesday, June 10, 2014

''नारी का संबल'' साहित्य, कला, संस्कृति की त्रैमासिक पत्रिका

नारी का संबल 

साहित्य, कला, संस्कृति की त्रैमासिक पत्रिका नारी का संबल के शुरू के तीस अंक 



































Sunday, June 8, 2014

छत्तीसगढ़ के साहित्यकार --शकुंतला तरार 

















बुजुर्गों की तरह रक्षा करते ये पेड़

              बुजुर्गों की तरह रक्षा करते ये पेड़ 


           मेरे घर के सामने एक बंगाली परिवार रहता है. उनके घर दादा की  मृत्यु को लगभग दस साल हो गए हैं दादा तो चले गए किन्तु उन्होंने जो बिरवा रोपा था आम के रूप में वह आज बहुत बड़ा पेड़ बन गया है उसे देखकर मुझे ठंडी शीतल छांह का एहसास होने लगता है . आज अल सुबह से ही कोयल बहुत जोर-जोर से कूक रही थी. कोयल की कूक से मन तरंगित होने लगा था यूँ लग रहा था मानो  मैं किसी दंडक बन में विचर रही हूँ और कोयल की  मीठी तान सुन रही हूँ  कई सितार एक साथ बज उठे हों जैसे कहीं पास ही में झरनों का कलकल निनाद --जीवन में कितना सुकून, कितना आनंद है उस एक क्षण ने मुझे एहसास करा दिया था ..तभी स्मरण हुआ कि विकास की रफ़्तार ने हमारे इन बड़े- बड़े छायादार वृक्षों को  अपने अपने ऊपर कुल्हाड़ी चलाने को मजबूर कर दिया है आज हम थक कर किसी पेड़ की छाँव तले  सुस्ताने की कल्पना भर कर सकते हैं. जैसे -जैसे दिन चढ़ता गया कोयल की आवाज़ मद्धम होती गई और वह इस वक्त बिलकुल भी चुप हो गई है . 46 डिग्री तापमान में भला किसकी मधुर स्वर लहरी गूंजेगी . आज सारे पेड़ों को कटवाकर हम वास्तु  के पीछे भाग रहे हैं घर के  गमलों में पीपल, बरगद, नीम, नीबू, संतरा के बोन्साई लगा रहे हैं वहीँ बांस के शो पीस सजा रहे हैं, पुराने ज़माने में घर के चारों और हरियाली ही हरियाली होती थी लोग घर बनाने से पहले पेड़ पौधों के बारे में सोचते थे घर पर ही बाड़ी में नीम, आम, इमली, अमरुद आदि के पेड़ लगाये जाते थे जहाँ फल तो हमें मिलता था साथ ही दिल को सुकून पहुँचाने वाली ठंडी हवाएं, गरमी में ठंडी शीतल छाँव, पूजा की लकड़ी एवं अन्य ज़रूरतों के सामान भी. हर्रा, बहेड़ा, आंवला, महुआ ये भी कहीं न कहीं दिख ही जाते थे ...मेरे पिता स्व. रतनलाल देवांगन जब तक जीवित रहे आम की छाल की शर्तिया दवा बना कर  दस्त पीड़ित को पिलाते थे तो पेचिश का कैसा भी मरीज हो एक खुराक में ही आराम महसूस करने लगता था ---आज हमारे बुज़ुर्ग एक-एक कर जा रहे हैं साथ ही बुजुर्गों की तरह हमारे रक्षक ये पेड़ भी विलुप्ति के कगार पर हैं. आने वाली पीढ़ी के हाथ लगेगा तो सिर्फ बोन्साई, गमले के फूल-पत्ते और रस हीन, गंधहीन केवल खूबसूरत दिखने वाले पेड़ पौधे....शकुंतला तरार -09-06-2014