Sunday, June 29, 2014
कवि गोष्ठी की अध्यक्षता की
मेघ फिर मुकर गए , पवन ठहर ठहर गए
शाखों के पात सभी, फिर हहर हहर गए
इन पंक्तियों के साथ ही आसाढ़ में सूखे की स्थिति पर काव्य पाठ कर के कार्यक्रम की अध्यक्षता की शकुंतला तरार ने उक्त अवसर था छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य मंडल रायपुर द्वारा आयोजित पावस की काव्य संध्या का ---कार्यक्रम की मुख्य अतिथि डॉ. शीला गोयल , विशिष्ट अतिथि शंकरलाल श्रीवास्तव ,इंजी. अमरनाथ त्यागी हिंदी साहित्य मंडल के अध्यक्ष, के आलावा लतिका भावे सैयद नासिर अली, सुशील भोले, राजेन्द्र पांडे, राज कुमार मसंद के आलावा शहर के बहुत से कवि श्रोता उपस्थित थे-- सञ्चालन किया उर्मिला उर्मि ने.
Thursday, June 26, 2014
Wednesday, June 25, 2014
हल्बी बोली का एक पाठ --3-- हाग
आज हल्बी बोली का एक पाठ --3-- हाग
हुन हाग दयेसे - हुन हाग दयेदे--हुन मन हाग देसोतवह बुला रहा है- वह बुलाएगा --वे बुला रहे हैं
हाग देना = बुलाना
हल्बी बोली का पाठ--2--"गोंदा"
आज हल्बी बोली का एक पाठ --2--"गोंदा" हल्बी का एक शब्द -"गोंदा"
''गोंदा ,(गोंदी) '' इस शब्द को छत्तीसगढ़ी में गेंदे के फूल से लिया जाता है जैसे हम कहेंगे गोंदा फूल , चंदैनी गोंदा ----मगर हल्बी बोली में गोंदा का अर्थ तुकडे से लिया जाता है जैसे --- दरपन मेरे हाथ से गिरकर गोंदा-गोंदा (गोंदी-गोंदी) हो गया ----साथ ही गेंदे के फूलके परिप्रेक्ष्य में भी इस शब्द को लिया जाता है किन्तु गेंदे के फूल के साथ गोंदा फूल यानि फूल शब्द का इस्तेमाल अक्सर करते हैं|
हल्बी बोली का पाठ--1--''बायले''
हल्बी बोली का पाठ--1-- ''बायले''
क्या आपको पता है बस्तर में स्त्री को क्या कहा जाता है जैसे 'नारी' 'स्त्री' 'महिला' वैसे ही वहां स्त्री को ''बायले'' कहा जाता है |-
Sunday, June 22, 2014
''सूरज'' कविता
''सूरज''
सूरज
प्रकृति को अपने अंक में समेट कर
भोर मुहाने आ खड़ा होता है
हर दिन
उसकी किरनें उतरने लगती हैं जब
आँखों में
हौले-हौले पंछी अपने पर फड़फड़ाते हैं
हल-बैल ले किसान खेतों की और जाता है
दूर कहीं से मंदिर से घंटियों की
आती आवाजें
तब कोई शीतल हवा का झोंका
चुपके चुपके आकर मेरे कानों में कहता है
एरी सखी!
तू क्यूँ अब तक गुमसुम सी पड़ी है
उठ!
आजा
आज का नया दिन
तेरे स्वागत में पलक पावड़े बिछाये
तेरा इंतज़ार कर रहा है ----शकुंतला तरार
सूरज
प्रकृति को अपने अंक में समेट कर
भोर मुहाने आ खड़ा होता है
हर दिन
उसकी किरनें उतरने लगती हैं जब
आँखों में
हौले-हौले पंछी अपने पर फड़फड़ाते हैं
हल-बैल ले किसान खेतों की और जाता है
दूर कहीं से मंदिर से घंटियों की
आती आवाजें
तब कोई शीतल हवा का झोंका
चुपके चुपके आकर मेरे कानों में कहता है
एरी सखी!
तू क्यूँ अब तक गुमसुम सी पड़ी है
उठ!
आजा
आज का नया दिन
तेरे स्वागत में पलक पावड़े बिछाये
तेरा इंतज़ार कर रहा है ----शकुंतला तरार
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