Tuesday, August 26, 2014

माँ --गीत

गीत 


बहुत दिनों के बाद एक रचना माँ पर ----
^^माँ**
दुनिया में जितनी उपमाएँ
माँ के आगे सब फीकी हैं
क्या होती कैसे होती है
माँ तो बस माँ ही होती है ॥माँ है तो प्रकृति पलती है
माँ जीवन है माँ आँगन है
माँ बादल है माँ सावन है
दर्पण बन गढ़ती प्रतिमाएँ
माँ जननी बस माँ होती है॥
चरण धूलि जहाँ माँ के पड़ते
फिर शुभमय शब्दों में ढलकर
वेद पुराण अध्याय हैं गढ़ते
ग्रंथों में उसकी रचनाएँ
मातृभूमि वही माँ होती है॥
माँ प्रेरणा जीवन का हर्ष है
हर मुश्किल में साथ निभाती
हर विपदा को धूल चटाती
प्रगति पथ की वह कविताएँ
स्नेह का सोता माँ होती है॥
माँ है तो धरती चलती है
सुप्त निर्झर बहने लगता
माँ संघर्ष है माँ उत्कर्ष है ----शकुंतला तरार 

Wednesday, July 30, 2014

हल्बी बोली की पाठशाला ----10--काय काजे

हल्बी बोली की पाठशाला ----10--शकुंतला तरार
काय काजे = किसलिए,क्यों , मके = मुझे, हुन = वह, ओड़गोड़ना = घसीटना
हुन मके काय काजे ओड़गोड़ेसे = वह मुझे किसलिए,क्यों  घसीट रहा है ?
हुन मके काय काजे ओड़गोड़ेदे = वह मुझे किसलिए,क्यों घसीटेगा ?

हुन मके काय काजे ओड़गोड़ली, ओड़गोड़लो = वह मुझे किसलिए,क्यों घसीट चुका ? 

हल्बी बोली की पाठशाला ----9--मके

हल्बी बोली की पाठशाला ----9--शकुंतला तरार
मके = मुझे हुन = वह ओड़गोड़ना = घसीटना
हुन मके ओड़गोड़ेसे = वह मुझे घसीट रहा है  
हुन मके ओड़गोड़ेदे = वह मुझे घसीटेगा

हुन मके ओड़गोड़ली, ओड़गोड़लो = वह मुझे घसीट चुका 

हल्बी बोली की पाठशाला ----8-हुन

हल्बी बोली  की पाठशाला ----8--शकुंतला तरार -हुन
हुन = वह ओड़गोड़ना = घसीटना
हुन ओड़गोड़ेसे = वह घसीट रहा है  
हुन ओड़गोड़ेदे = वह घसीटेगा

हुन ओड़गोड़ली, ओड़गोड़लो = वह घसीट चुका  

हल्बी बोली की पाठशाला --7--ओड़गोड़ना

हल्बी बोली की पाठशाला --7--शकुंतला तरार
ओड़गोड़ना = घसीटना
ओड़गोड़ेदें = घसीटूंगा
ओड़गोड़ेसे = घसीट रहा है  
ओड़गोड़ेदे = घसीटेगा
ओड़गोड़ली, ओड़गोड़लो = घसीट चुका  


Tuesday, July 22, 2014

''सावन की ये धूप ''

''सावन की ये धूप ''
सावन की ये धूप 
मैं 
चंद क्षण खिड़की से 
ओझल क्या हुई 
झट चुरा ले गया कोई
''धूप'' 
अभी खिड़की में , 
आँगन में 
उतरा भी न था 
उसकी गर्माहट को मैंने
महसूसा भी न था
कि उसे
झट चुरा ले गया कोई
गीले ओसारे पे खड़ी -खड़ी
उस काले नभ को ताकती
टुकुर-टुकुर
रह-रह जब कौंधती बिजली
तो सारे शरीर में डर ?
सिहरन से भर उठता
लगता
कि ज़रूर उस काले कलूटे बादल के पीछे
कोई छलिया छुपा बैठा है
जो मुझसे आँख मिचौली खेलने के बहाने
मेरे आँगन की धूप
चुरा ले गया वोही
और मेरी झुंझलाहट पे
हँसता होगा छलिया सा
सावन की
इस क्षणिक धूप के लिए
अकुलाहट भरी मेरी हालत पे --शकुंतला तरार-22-07-14

Sunday, July 20, 2014

कवि सम्मलेन में भागीदारी

छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्नदृष्टा  डॉ. खूबचंद बघेल जी की जयंती अवसर पर कुर्मी छात्रावास में आयोजित कवि सम्मलेन में आमंत्रित  कविगण और श्रोता