Tuesday, August 26, 2014
Wednesday, July 30, 2014
हल्बी बोली की पाठशाला ----10--काय काजे
हल्बी बोली की पाठशाला ----10--शकुंतला
तरार
काय काजे = किसलिए,क्यों , मके
= मुझे, हुन = वह, ओड़गोड़ना = घसीटना
हुन मके काय काजे ओड़गोड़ेसे =
वह मुझे किसलिए,क्यों घसीट रहा है ?
हुन मके काय काजे ओड़गोड़ेदे =
वह मुझे किसलिए,क्यों घसीटेगा ?
हुन मके काय काजे ओड़गोड़ली, ओड़गोड़लो
= वह मुझे किसलिए,क्यों घसीट चुका ?
हल्बी बोली की पाठशाला ----9--मके
हल्बी बोली की पाठशाला ----9--शकुंतला
तरार
मके = मुझे हुन = वह ओड़गोड़ना
= घसीटना
हुन मके ओड़गोड़ेसे = वह मुझे
घसीट रहा है
हुन मके ओड़गोड़ेदे = वह मुझे
घसीटेगा
हुन मके ओड़गोड़ली, ओड़गोड़लो =
वह मुझे घसीट चुका
हल्बी बोली की पाठशाला ----8-हुन
हल्बी बोली की पाठशाला ----8--शकुंतला तरार -हुन
हुन = वह ओड़गोड़ना = घसीटना
हुन ओड़गोड़ेसे = वह घसीट रहा
है
हुन ओड़गोड़ेदे = वह घसीटेगा
हुन ओड़गोड़ली, ओड़गोड़लो = वह घसीट
चुका
हल्बी बोली की पाठशाला --7--ओड़गोड़ना
हल्बी बोली की पाठशाला
--7--शकुंतला तरार
ओड़गोड़ना = घसीटना
ओड़गोड़ेदें = घसीटूंगा
ओड़गोड़ेसे = घसीट रहा है
ओड़गोड़ेदे = घसीटेगा
ओड़गोड़ली, ओड़गोड़लो = घसीट
चुका
Tuesday, July 22, 2014
''सावन की ये धूप ''
''सावन की ये धूप ''
सावन की ये धूप
मैं
चंद क्षण खिड़की से
ओझल क्या हुई
झट चुरा ले गया कोई
''धूप''
अभी खिड़की में ,
आँगन में
उतरा भी न था
उसकी गर्माहट को मैंने
महसूसा भी न था
कि उसे
झट चुरा ले गया कोई
गीले ओसारे पे खड़ी -खड़ी
उस काले नभ को ताकती
टुकुर-टुकुर
रह-रह जब कौंधती बिजली
तो सारे शरीर में डर ?
सिहरन से भर उठता
लगता
कि ज़रूर उस काले कलूटे बादल के पीछे
कोई छलिया छुपा बैठा है
जो मुझसे आँख मिचौली खेलने के बहाने
मेरे आँगन की धूप
चुरा ले गया वोही
और मेरी झुंझलाहट पे
हँसता होगा छलिया सा
सावन की
इस क्षणिक धूप के लिए
अकुलाहट भरी मेरी हालत पे --शकुंतला तरार-22-07-14
सावन की ये धूप
मैं
चंद क्षण खिड़की से
ओझल क्या हुई
झट चुरा ले गया कोई
''धूप''
अभी खिड़की में ,
आँगन में
उतरा भी न था
उसकी गर्माहट को मैंने
महसूसा भी न था
कि उसे
झट चुरा ले गया कोई
गीले ओसारे पे खड़ी -खड़ी
उस काले नभ को ताकती
टुकुर-टुकुर
रह-रह जब कौंधती बिजली
तो सारे शरीर में डर ?
सिहरन से भर उठता
लगता
कि ज़रूर उस काले कलूटे बादल के पीछे
कोई छलिया छुपा बैठा है
जो मुझसे आँख मिचौली खेलने के बहाने
मेरे आँगन की धूप
चुरा ले गया वोही
और मेरी झुंझलाहट पे
हँसता होगा छलिया सा
सावन की
इस क्षणिक धूप के लिए
अकुलाहट भरी मेरी हालत पे --शकुंतला तरार-22-07-14
Sunday, July 20, 2014
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