Monday, January 25, 2016

मुक्तक ---इक दिन


आज का मुक्तक ---इक दिन 



Friday, January 22, 2016

''नारी का अंतर्मन'' ‘2’

''नारी का अंतर्मन'' ‘2’
तुम अपना रंजो ग़म .... अपनी परेशानी मुझे दे दो,.... तुम्हें ग़म की क़सम  ...इस दिल की वीरानी मुझे दे दो...  | एक नारी जो बड़ी ही दरियादिली से यह इज़हार कर रही है एक पुरुष से कि तुम अपनी सारी शिकायतें, अपने सारे ग़म सारी परेशानी ही मुझे दे दो  गोया कि जैसे ग़म कोई खाने की वस्तु है इसने माँगा उसने दे दिया उसने खा लिया और बात ख़त्म |

दरअसल बात यह कि नारी बहुत संवेदनशील होती है  जीवन के हर संघर्ष के क्षणों में नारी ही पुरुष को सम्हालती है यदि पुरुष उसे जरा भी समझने की कोशिश करे तो, नारी उसके आगे नतमस्तक हो जाती है देखा जाय तो नारी ही परिवार की धुरी है और जब तक यह धुरी सही चलेगी उस परिवार का कुछ भी अहित नहीं वाला है | जिस दिन भी इस धुरी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जाती है नारी चुप नहीं बैठ सकती |

नारी बड़े ही प्यार से अपना अधिकार चाहती है और वह अधिकार है प्यार | यदि नारी को प्यार से रखा जाए तो वह भी आपको उससे दुगुना देने की कोशिश करेगी किन्तु यदि आप उसे छलते हैं और अंतर्मन से वह दुखी होती है तो फिर वह ज़िद्दी बनाने लगती है और तब शुरू होता है यहीं से आपस में टकराव |   
यदि नारी अपने अधिकारों की बात करती है तो पुरुष के अहम् को चोट पहुँचता है और  वह उसे नीचा दिखाने का भरसक प्रयत्न करता है| यहाँ अहं के टकराव के चलते आपसी तनाव बढ़ता है और अंत में बात तलाक़ की नौबत तक आ जाती है |

पुराणों में जहाँ नारी का गौरवशाली इतिहास रहा है तो वहीँ इंद्र द्वारा सती अहिल्या से छल, रावण का सीता माता को हरण कर के ले जाना, दुर्योधन द्वारा द्रोपदी का चीरहरण जैसे कुछेक उदाहरण हैं जिससे आज भी मानव मन उद्वेलित होता है |  चाहे वह स्त्री हो या पुरुष | फिर घर की नारी के लिए पुरुष के मन में उपेक्षा का भाव क्यों आ जाता है | शक्ति स्वरुपा  नारी आज भी कुंठित है, पीड़ित है, प्रताड़ित है इसके लिए हमें पुनर्जागरण की आवश्यकता है और इस पुनर्जागरण के लिए धधकता साहस चाहिए | नारी को दृढ़ निश्चयी बनना होगा आने वाले झंझावातों से लड़ने का दमखम बनाए रखना होगा | तभी वह अपने मार्ग में आने वाले काटों को दूर कर एक नई और सुन्दर फुलवारी का निर्माण कर सकेगी और रंजो ग़म मांगने के बदले यह कहेगी कि ये तेरा घर ये मेरा घर किसी को देखना हो ग़र तो पहले आके मांग ले तेरी नज़र मेरी नज़र |
शकुंतला तरार           



एक मुक्तक -- अदा

आज का मुक्तक----



Monday, January 11, 2016

''नारी का अंतर्मन '' - मीरा


''नारी का अंतर्मन'' 1 

कृष्ण की दीवानी मीरा जब कहती –मेरो तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई , जाके सिर  मोर मुकुट मेरो पति सोई || जिसे न देखा, न मुलाक़ात की, न बात की उसके लिए शिद्दत से इतनी चाह | यह सब मीरा के लिए ही संभव था , जिसने प्रेम के मर्म को समझा | अपनी सहज, सरल अभिव्यक्ति के माध्यम से शब्दों की ऐसी भाव रूपी माला पिरोती हैं कि आज भी जन-जन की लोकप्रिय बनी हुई हैं | मीरा का प्रेम , मीरा का विरह, मीरा की टीस ने उन्हें अमर बना दिया | मीरा के प्रेम रूपी पीड़ा का माध्यम , अंतर्मन में उपजी वह स्वाभाविक शब्दों की लड़ी थी जिसे पदों में उद्धृत किया और साहित्य के आकाश में मीरा नाम रूपी एक ध्रुव तारा बनकर चमकने लगी तभी तो गरल भी उनके लिए सुधा बनने को मजबूर हो गया | एक सुकुमारी रूपसी, एक लावण्यमयी नारी जिसके रोम-रोम में प्रेम का सोता बह रहा हो उसे भला ये निष्ठुर राजा –महाराजा  क्या समझेंगे | नारी के अंतर्मन को स्वयं नारी ही आज तक जान न सकी पहचान न सकी तो पुरुषों की क्या बिसात |वैसे भी हमारे कुछ ऐसे रीति रिवाज़ हैं जो धर्म के नाम पर भय पैदा करवाते हैं मगर प्रेम की दीवानी मीरा कृष्ण के प्रति अंतर्मन से समर्पित थी | वह दीन-दुनिया रीति–रिवाज़ से परे थी |
शकुंतला तरार 
shakuntalatarar7@gmail.com

Sunday, January 10, 2016

मुक्तक -" मुझको "


मुक्तक -" मुझको "


Saturday, January 9, 2016

मुक्तक--''डरता हूँ''


एक मुक्तक--''डरता हूँ ''