Friday, February 5, 2016

लेख-“महिलाओं को स्वयं अपनी पहचान बनानी होगी”



“महिला दिवस पर विशेष”
“महिलाओं को स्वयं अपनी पहचान बनानी होगी”
स्त्री समाज का एक संवेदनशील अंग होती है | आज जब समूचा विश्व नारी समानता, नारी मुक्ति, नारी आरक्षण के लिए जी जान से जुटा हुआ है, सरकार भी बालिकाओं को निःशुल्क शिक्षा देने के अपने प्रयास में लगी हुई है। समाज सेवी संस्थाएं नारी उद्धार के लिए सरकारी सहयोग से प्रयासरत हैं । हमारे संविधान में भी अनुच्छेद 16 के अनुसार राज्यों में लिंग भेद के आधार पर नियुक्ति से वंचित नहीं किया जावेगा।
      अब सवाल यह उठता है कि हमारे यहां महिलाओं को कितना अवसर दिया जाता है। पुरुष प्रधान इस समाज में ऐसा भी नहीं कि यहां की महिलाएं एकदम ही स्वतंत्र हो गयी हैं। वे पुरुषों द्वारा सताई नहीं जाती बल्कि शिक्षा ने जहाँ परिवार को सुसंस्कृत किया है, समझदारी बढ़ी है वहीं पारिवारिक विघटन भी बढ़ा है। आज की स्त्री आत्मनिर्भर होकर अपने परिवार को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाना चाहती है। ऐसे समय में आवश्यकता इस बात की है कि हमारी सामाजिक संस्कृति को विखंडन से बचाने के लिए महिलाओं को आगे बढ़ने का सुअवसर प्रदान करना होगा। जिससे वे स्वयं की पहचान स्थापित कर सकें। अपने परिवार में, अपने समाज में, अपने ही देश में ।
      महिलाओं की सृजनशीलता, कोमलता और उसकी विकासशीलता संस्कृति का पर्याय होती है और भारतीय समाज में तो प्राचीनकाल से ही नारी को यथेष्ट सम्मान प्राप्त हुआ है जिनमें  घोषा, अपाला, लोपमुद्रा, विश्वधारा, मैत्रेयी, श्रद्धा कामयानी के अलावा विद्वानों की सभा में याज्ञवल्क्य को आश्चर्यचकित कर देने वाली गार्गी के नाम से हम परिचित ही हैं। उसके पश्चात् मध्यमयुग के आते-आते सहजो बाई से परंपरा की शुरुवात हुई फिर मीराबाई, दयाबाई के रूप में सामने आईं और आज सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा, महाश्वेता देवी, जोशी आशापूर्णा देवी, शिवानी, अमृता प्रीतम, मन्नू भंडारी, हिमानी शिवपुरी, उषा प्रियंवदा, मृणाल पाण्डे, मेहरुन्निसास परवेज, शैलजा माहेश्वरी, सरोजनी प्रीतम, अल्का पाठक, सुधा श्रीवास्तव, सूर्यबाला, उषाबाला, शुभदा शाने, माया गोविंद, स्नेह मोहनीश, जया जादवानी आदि के नाम हम श्रद्धा और आदर के साथ लेते हैं। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ की महिला लोक कलाकारों में सुरूज बाई खांडे,  पद्मश्री तीजन बाई, रीतू वर्मा, रेखा जलक्षत्री,उषा बारले आदि जिन्होंने छत्तीसगढ़ की लोककला को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई । इतिहास उन्हें याद रखेगा।
हिंदी उपन्यास साहित्य में प्रेमचंद ने नारी को अति विशिष्ट बनाया। वे नारी के प्रति अधिक संवेदनशील एवं सजग रहे। नारी, चाहे सर्वहारा वर्ग की हो या मध्यम वर्ग या जमींदार वर्ग की, किंतु नारी के समस्त दुख-सुख, अमीरी-गरीबी, आशा-निराशा को उनके कोमल मनोभावों को उन्होंने जीवन्त किया है।
बिना पुरुष के नारी का विकास संभव है ऐसा मैं नहीं मानती। किंतु कब तक वह पुरुष की अंगुली थामकर चलती रहेगी। उसके स्वयं का भी कोई अलग व्यक्तित्व होना चाहिए। उसका अपना परिचय भी नितांत आवश्यक है। किसी भी समाज, संस्कृति के विकास का मानदंड, नारी की स्थिति उस समाज में किस तरह है इस बात पर निर्भर करता है। यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता, अर्थात् नारी की पूजा की जाती है वहां देवताओं का निवास होता है। नारी की पूजा से आशय यह है कि जिस घर में नारी का मान-सम्मान किया जाता है उस घर में कलह, क्लेश का प्रवेश असंभव है। स्वाभाविक है फिर वह घर सुख-समृद्धि से परिपूर्ण होगा ।
इतिहास साक्षी है जब तक भारतीय समाज में नारी का स्थान ऊंचा और बराबर का रहा, भारतीय संस्कृति अपने चरम को छूती रही। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम आदर और श्रद्धा से न लें यह असंभव है क्योंकि उन्होंने जिस साहस और शौर्यता से अंग्रेजों से युद्ध किया वह पुरुषों से भी आगे बढ़कर है। आज की नारी अपनी उपादेयता समझ चुकी है और घर की चारदीवारी से निकलकर पुरुष के कदम से कदम मिलाकर उसका सहयोग कर रही है।
जहां तक मेरा मानना है कि स्त्री विकास की दिशा ही राष्ट्र विकास की मूल अवधारणा है। आज की नारी जी तोड़ संघर्ष कर रही है स्वयं को पुरुषों के समकक्ष बनाये रखने की। वह कहीं स्वतंत्र है तो कहीं परतंत्र भी।
महाभारत के रचियता महर्षि वेदव्यास जी ने लिखा है-
पिता रक्षित कौमार्ये, भरता रक्षित यौवने,
रक्षित स्थविरे पुत्रः, न स्त्री स्वातंत्र्यति।।
अथार्थ कौमार्य में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र स्त्री की रक्षा करते हैं। अर्थात् नारी उस जमाने से ही परतंत्र है तभी तो गंधारी ने सोचा होगा की मुझ राज्यकन्या के साथ इतना बड़ा अत्याचार हुआ। एक अंधे की पत्नी बनाई गयी यह देखने से तो अच्छा है की आंखों पर पट्टी बांधकर स्वयं अंधी बन जाऊं। नारी तक भी परतंत्र थी, नारी आज भी परतंत्र है। आज भी जरूरत है उसे संरक्षण की क्योंकि अभी भी वह शोषित, पीडि़त और जबर्दस्ती की शिकार हो रही है। आज समय है स्वालंबन की, सशक्तिकरण की। हां यह आवश्यक है कि स्वालंबन की दिशा में हमारे कदम बढ़े हैं और स्वालंबन के लिये जरुरी है शिक्षित होना।
हमारे देश में चौंकाने वाली बात यह है कि आज बालिकाओं की संख्या में निरंतर गिरावट दर्ज की जा रही है। बालिका भ्रूण हत्या एक विकराल समस्या बनकर सामने आ रही है। तकनीकी के क्षेत्र में प्रगति का परिणाम बालिकाओं की गर्भ मृत्यु? क्या इसी दिन के लिए विज्ञान ने प्रगति की है। आज भी गांव में बच्चियों को मारने के लिए वही पुरानी पद्धतियां अपनायी जाती हैं । पैदा होते ही यह घोषणा करना कि बच्ची मरी हुई पैदा हुई है। तो कहीं घड़े में रखकर उसका मुंह बंद कर दिया जाता है। जिससे बच्ची घुटघुट कर दम तोड़ दे, कहीं गला घोंटकर कहीं बाल्टी में डुबोकर तो कहीं विष चढ़ाकर बच्ची की हत्या कर दी जाती है। कहीं हत्या कहीं आत्महत्या, कहीं बलात्कार तो कहीं प्रसव के दौरान मृत्यु। क्या नारी “दुःख” का दूसरा नाम है। अब वह समय आ गया है जब समाज की विचारधारा में परिवर्तन लाएं। इसके लिए जरूरत है तो हमें क्रांतिकारी कदम रखने की, महिला संगठनों को भी युद्ध स्तर पर नारी स्वावलंबन, नारी शिक्षा की दिशा में उत्तरोत्तर प्रगति में सहायक बनने की। उन्हें उनके अधिकारों के प्रति सजग करने की। फिर देखिए मंजिल पर लक्ष्य रखते ही सफलता आपके कदम चूमेंगी। घर-परिवार में, समाज में आपका मान-सम्मान बढ़ेगा। दरअसल मुद्दा नारी अस्मिता का है। रचनाधर्मी महिलाओं को अपनी रचनात्मक क्षमता बनाए रखते हुए शालीनता से, मर्यादित ढंग से हमेशा सृजनरूपी सरिता प्रवाहित करते रहना चाहिए। अभी तो शुरूआत है अंधेर नहीं हुआ है हमें अपनी मंजिल स्वयं तय करनी है। अपनी पहचान स्वयं बनानी है कुछ इस तरह की-----
सूरज के ढलने से पहले
सन्नाटा जब गहराने लगा
मन का पंछी व्याकुल हो उठा
असीम वेदना,
एक हूक सी उठी मन में
कहां जाऊं
सन्नाटा मुझे घेर लेगा
शकुंतला तरार-----

लेख-“नारी निर्जीव वस्तु नहीं”



“नारी निर्जीव वस्तु नहीं”
    सुबह के वक्त जैसे ही अखबार हाथ में लेती हूँ मुखपृष्ठ पर ही देश के प्रमुख समाचारों के साथ सामना होता है। ऐसी खबरों से जिसे पढ़कर मन विचलित होने लगता है। युवती से सामूहिक दुष्कर्म, बालिका से अनाचार, यौन उत्पीड़न, गला घोंटकर हत्या। कभी-कभी तो इसी तरह के समाचारों की भरमार होती है अखबारों में। बड़े-बड़े शीर्षक देखने के बाद फिर समाचार पढ़ने को दिल ही नहीं करता चाहे वह समाचार आंचलिक हो, चाहे प्रदेश की हो, राष्ट्रीय हो या अंतर्राष्ट्रीय।
    क्या नारी कोई निर्जीव वस्तु है कि जिसका जब जी चाहा अपनी मर्जी से उपयोग किया और बाद में कूड़ा-करकट की तरह फेंक दिया। क्या है यह सब ! एक समय था जब अधिकतर महिलाएं स्टोव फटने से या स्टोव से साड़ी में आग लगने पर जल जाती थीं यही वह समय था जब दहेज रुपी आग महिलाओं के, बेटियों के कपड़ों में साड़ियों में आग लगा करती थी किन्तु, समय बदला स्टोव की जगह रसोई में गैस चूल्हे ने अपना स्थान बना लिया और भोजन बैठकर पकाने की जगह खड़े होकर ही पकाया जाने लगा किन्तु 80-90 के दशक में जब तब भी बेटियों के कपड़ों में आग लग ही जाया करती थी । आज लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं आग से सुरक्षित हैं न स्टोव फट रहा है न केरोसिन सुलभ है फिर भी महिलाएं कहीं न कहीं से प्रताडि़त हुई जा रही हैं और नहीं तो अब निर्भया जैसे काण्ड में बढ़ोत्तरी हुई है। जैसे-जैसे हम शैक्षिक उन्मुखीकरण की ओर तीव्रता से अग्रसर हो रहे हैं। बेटियों को शिक्षित करने उनकी प्राथमिक से लेकर महाविद्यालय स्तर तक की शिक्षा के लिये शासन योजनाएं तैयार कर रही है। हमारी कुंठायें हम पर हावी होती जा रही है कारण स्पष्ट है दरअसल हम दौड़ का हिस्सा बनना चाहती हैं उस दौड़ का जिसमें अव्वल तो एक को ही आना है फिर भी उस लक्ष्य को पाने की चाह में हम दौड़े चले जा रहे हैं। कईयों का तो कोई लक्ष्य ही निर्धारित नहीं है किन्तु वही बात की उसकी साड़ी मेरी साड़ी से सफेद क्यों ! और इसी निरर्थक दौड़ के चलते भी कई महिलाएं विभिन्न हादसों का शिकार बनती हैं।
महिलाओं  के अब जागने की बारी है वह दिन लद गए घर की चार दीवारी में पति के दफ्तर से आने की बाट जोहती नारी कभी रूठ जाए उसे कभी मान मनुहार की दरकार हो। क्योंकि महिलाएं पति के साथ ही दफ्तर से लौटने लगी हैं। आज जमाना तेजी से आगे बढ़ रहा है शहर क्या गांव की लड़कियां भी अब पढ़ लिख रही हैं। अभिभावक चाहते हैं कि उनकी बेटी पढ़-लिखकर किसी भी अच्छी जगह नौकरी करे। वैसे आज के परिप्रेक्ष्य में अभिभावक अपनी कन्याओं के लिये शिक्षा के क्षेत्र को सबसे ज्यादा सुरक्षित मानते हैं।
    आज के अभिभावक देश के किसी भी प्रांत में सुदूर इलाकों में भी अपनी पुत्रियों को बेझिझक नौकरी करने की अनुमति प्रदान कर देते हैं। वहीं बेटियां भी माता-पिता का मान बढ़ा रही हैं। ऐसे समय में हम यह कहें कि हम पिछड़े हुए हैं। हम पर अत्याचार किया जा रहा है, हमें दबाया जाता है क्यों ? आखिर क्यों है ऐसा? हम में क्यों नहीं सड़े गले आडम्बरों का विरोध करने की ताकत ? क्यों हम आज भी चार दीवारी में कुंठित जीवन जीयें। क्या सिर्फ इसलिये कि हम नारी हैं? नहीं ऐसा नहीं है यदि किसी के साथ ऐसा होता भी है तो वह कायर या दब्बू है उसमें हिम्मत नहीं आगे बढ़कर कुछ कर पाने की। वह नारी हूँ मैं क्या कर सकूंगी यह सोच-सोच कर ही घबरा जाती है और फिर आये दिन अखबारों में या टीवी चैनलों द्वारा महिला प्रताड़ना का खींचा गया, प्रस्तुत किया गया चित्र यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्या यही नारी की नियति है यदि यही नारी की नियति है तो हम अपनी चारदीवारी में ही अच्छी हैं। नहीं चाहिए हमें उड़ने को आसमान हमारे पंख सिमटे रहें तो बेहतर है।
    साथियो आइये सशक्तिकरण के इस युग में हम संकल्प लें कि नारियों पर अत्याचार होने नहीं देंगे और यदि किसी ने किया भी तो उसे हम बख्शेंगे नहीं । शकुंतला तरार

Friday, January 29, 2016

खारुन नदी --स्वच्छता अभियान का सच

खारुन नदी --स्वच्छता अभियान का सच 

           हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी जब हाथ में झाड़ू लेकर ‘स्वच्छ भारत’ मिशन की शुरूआत करने सड़कों पर उतरते हैं तो लोग इसे राजनीति से प्रेरित कहते हैं | दरअसल किसी भी बड़े काम की शुरुआत के लिए एक ऐसा चेहरा होना चाहिए जो प्रसिद्ध है और जिसकी बातों को लोग मानते हों चाहे दिल से, दिमाग से या फिर मजबूरीवश | सोते हुओं को जगाने के लिए यह आवश्यक भी है |

         2अक्टूबर, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को उनकी जयंती के अवसर पर श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद मोदी जी ने अपने मिशन की औपचारिक शुरूआत से पहले मंदिर मार्ग स्थित वाल्मीकि बस्ती में खुद झाड़ू लगाकर एक फुटपाथ को साफ किया. ज्ञात हो कि वाल्मीकि बस्ती सफाई कर्मियों की बस्ती है .उनके इस अभियान का उद्देश्य अगले पांच साल में पूरे देश में स्वच्छता कायम करना है. "स्वच्छ भारत" मिशन के तहत देशभर में केंद्र सरकार के करीब 31 लाख कर्मचारियों ने विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों में स्वच्छता की शपथ ली. इसके अतिरिक्त, राज्य सरकार के लाखों कर्मचारियों से भी इस व्यापक अभियान का हिस्सा बनने को कहा गया | यह अब तक का सबसे बड़ा स्वच्छता अभियान है जिस पर कुल 62 हजार करोड़ रूपये से अधिक का खर्च आने का अनुमान है. प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरान कहा कि ‘स्वच्छ भारत’ अभियान ‘राजनीति से परे’ है और देशभक्ति से प्रेरित है.

         आलोचनाओं को खारिज करते हुए  मोदी जी  ने भारत को स्वच्छ बनाने में पूर्व की सभी सरकारों के प्रयासों को स्वीकार किया. उन्होंने कहा, “मैं राजनीति की बात नहीं कर रहा..यह राजनीति से परे है. यह मेरी देशभक्ति से प्रेरित है, न कि राजनीति से. हम यह राजनीति के उद्देश्य से नहीं कर रहे..मैं सच्चे दिल से कहता हूं..यदि हम इसे राजनीतिक रंग देंगे तो हम भारत मां के साथ न्याय नही कर पायेंगे|  


          
          एक तरफ जहाँ हमारे प्रधान मंत्री जी स्वच्छता अभियान पर जोर दे रहे हैं वहीँ रायपुर छत्तीसगढ़ और दुर्ग जिलों को जोड़ने वाली जीवन दायिनी खारुन नदी का सच यह है | गन्दगी, कचरा, लोगों के द्वारा विसर्जन का सामान और सबसे बड़ी बात यह कि गणेश  विसर्जन और दुर्गा विसर्जन के बाद का कचरा आज  तक यानि १७-जनवरी जब मैं इसके तट पर घूमने के उद्देश्य से गई थी | पानी ऐसा कि हाथ लगाने को भी डर गई कि कहीं इन्फेक्शन न हो जाये | वहीँ उसी मलबे के ढेर में कुछ लोग जो गोताखोर थे और स्वयं को रायपुर टिकरापारा का  बता रहे थे भोजन  बना रहे थे  यह उनका रोज का काम है कि दिन में उसी पानी में  जाकर धार्मिक आस्था से प्रेरित लोगों द्वारा फेंके गए सिक्के और कुछ मीटर की दूरी स्थित श्मशान से बहाए गए राख में से निकले सोने या चांदी  के कुछ कणों की तलाश में ये गोताखोर पूरा दिन लगा देते हैं कभी अच्छा मिल जाता है और कभी खुद के भोजन तक ही फिर भी ये अपना पूरा दिन इसी काम में लगा देते हैं और शाम ढलने से पहले भोजन पका खा कर  घरों को लौट जाते हैं |
शकुंतला तरार 













मुक्तक- मुस्कुराए


“शहीद वीरनारायण सिंह” -10-दिसंबर

छत्तीसगढ़ का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी
“शहीद वीरनारायण सिंह”  
10-दिसंबर 

      जो भरा नहीं है भावों से, जिसमें बहती रसधार नहीं ।
      वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।
                                         (राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त)
     इतिहास के पन्ने यदि हम पलटें तो देश की आजादी के लिए स्वतंत्रता संग्राम में सभी धर्म, जाति, सम्प्रदाय के लोगों ने बिना किसी भेदभाव के देश भक्ति की भावना से प्रेरित होकर बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था, तन-मन-धन से सर्वत्व न्यौछावर किया था। प्राकृतिक सम्पदा से युक्त गौरवशाली ऐश्वर्य से अभिमण्डित हिमालय से कन्याकुमारी तक के इस भू-भाग पर स्थित माँ भारती अपनी करोड़ों भारतीय संतानों के होते हुए भी निराश्रित हो गई थी, दीन-हीन दुर्बल हो गई थी, गुलामी का अभिशाप ढोते-ढोते थक गई थी। उसकी संतानें भूखी, प्यासी, कुंठित, शोषित और अज्ञानता से ग्रस्त थीं। तब उनमें जज्बा और जोश भरने, जागरूकता पैदा करने, हमारे वीरों ने देशवासियों को उनकी इस दीन-हीन दशा का बोध कराया था, देश के लिए जीने और देश के लिए मरने का भाव उत्पन्न कराया था और अपना प्राणोत्सर्ग किया था।
     भारत की दुर्दशा से व्यथित अन्यायी शासन के विरूद्ध 1857 में झांसी में महारानी लक्ष्मीबाई ने नारी होकर भी अपनी प्रजा के लिये, अपनी झांसी के लिये, संघर्ष का बिगुल फूंका और समरभूमि में कूद पड़ी थी। क्या एक झांसी ही अंगे्रजों के दमन चक्र में था, किन्तु देश के लिए अपने आत्म सम्मान की रक्षा के लिए, आतंक के विरूद्ध उठ खड़े होने का विरोध का साहस हर किसी में हो यह जरूरी तो नहीं ।
तम को पराजित करने का बिहान वन्दे मातरम्।
चहुं दिसि शोभित झरनों का जय गान वन्दे मातरम्।
(शकुंतला तरार)
     भारत एक कृषि प्रधान देश है और धान का कटोरा कहे जाने वाले छतीसगढ़ में भी तब राजा-महाराजाओं का शासन था, जमींदारी थी, मालगुजारी थी। कुछ अत्याचार सहने के आदी होते है, समर्थ के आगे झुक जाते हैं वहीं कुछ लोगों से अत्याचार सहन नहीं होता और वे मातृभूमि की रक्षा के लिये विद्रोही तेवर अपना लेते हैं। तब शुरू होता है उनके दमन का सिलसिला। मगर देशभक्त किसी के आगे झुकते नहीं अत्याचारों को सहते नहीं।
     छत्तीसगढ़ की माटी ने भी सोनाखान नामक जमींदारी में 1795 में एक बिंझवार आदिवासी के घर में एक प्रेरणास्पद देश भक्त को जन्मा था । नाम था जिसका ‘‘नारायण सिंह”। जिसे आज लोग मातृभूमि पर मर मिटने वाले आदिवासी जननायक ‘‘शहीद वीर नारायण सिंह” के नाम से  जानते हैं और संबोधित करते हैं। 1818-19 के दौरान आपके पिता जमींदार रामसाय ने भी अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह किया था किंतु कैप्टन मैक्सन द्वारा विद्रोह को दबा दिया गया और क्षेत्र में उनके प्रभाव, आदिवासी संगठन शक्ति को देखते हुए उनसे संधि कर ली। पिता की मृत्यु के पश्चात 1830 में वीर नारायण जमींदार बने। जब सोनाखान का विलय कर अंग्रेजों ने 1854 में उनपर टाकोली (कर) लगा दिया तब नारायण सिंह ने उसका विरोध किया और तभी शुरू हुआ दमन का सिलसिला। रायपुर के डिप्टी कमिश्नर इलियट जमींदार के विरोधी हो गए।  1857 में जब देश जल रहा था उसके ठीक पहले  1856 में छत्तीसगढ़ में भीषण सूखा पड़ा । लोग दाने-दाने को तरसने लगे |    वीरनारायण सिंह ने देखा कि अंगे्रजों ने ‘‘धान का कटोरा” में छेद कर दिया है, भूखी प्यासी जनता के सम्मुख रोजी-रोटी की विकराल समस्या आ गई है, मगर वहीं कसडोल के साहूकार (व्यापारी) का गोदाम, अनाज से भरा हुआ है मांगने पर देने को तैयार नहीं है।   ऐसे समय में वे अपनी जनता के लिए गोदाम से अनाज न निकालते तो क्या करते, जमींदार थे वे, उनके आदेश का पालन किया जाना था, डर जाने वालों में से नहीं थे वे । वीर नारायण ने जनता के दिलों में राष्ट्रीय चेतना जगाने के लिए उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई। अदम्य साहस, जोश, वीरता, शौर्यता और राष्ट्र भक्ति से ओतप्रोत स्वाभिमान की रक्षा करते हुए उन्होंने साहूकार  के गोदाम के ताले तुड़वा दिये।  गोदाम से अनाज लूटा, भूखी जनता को तृप्त किया । व्यापारी की शिकायत पर अंगे्रज उनके पीछे लग गए उनके नाम वारंट जारी कर दिया, वे उन्हें छकाते रहे किन्तु अन्याईयों ने जनता को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। 24 अक्टूबर 1956 को संबलपुर से गिरफ्तार किये गये। 28 अगस्त 1857 को अपने तीन साथियों सहित जेल से भागने में कामयाब होकर सोनाखान में 500 साथियों की एक सेना बनाई किंतु भीषण संघर्ष के बाद भी वे पकड़े गये जेल गये।
     यह छत्तीसगढ़ की माटी का कर्ज था एक ईमानदार प्रजावत्सल, कर्तव्यनिष्ठ जमींदार पर जहां कि उन्होंने जन्म लिया था। देश के लिए जीये वे और देश के लिए ही उन्होंने प्राणोत्सर्ग किया उनके लिए यह पंक्ति कि -
वन्दना के इस स्वरों में, एक स्वर मेरा मिला लो
जब हृदय के तार बोले, श्रृंखला के बंद खोले
एक सिर मेरा मिला लो
(                                   (कवि सोहनलाल द्विवेदी)
सोनाखान में आज भी राजा सागर, रानी सागर, नंद सागर इस बात के साक्षी हैं कि वे सुंदर, हरा-भरा वातावरण के मध्य अपनी जनता को भयमुक्त, खुशहाल और सम्पन्न देखना चाहते थे। सोनाखान ही नहीं अपितु छत्तीसगढ़ की समस्त जनता को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराना चाहते थे वे। भोली-भाली आदिवासी जनता के दिलों में राष्ट्रभक्ति की चेतना जगाने में वे अग्रणी रहे । तभी तो अपने ही भाईयों के रक्त से विजय तिलक लगाने के बजाय स्वयं को सौंप दिया।   साक्षी है छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के मध्य स्थित रायपुर का हृदय स्थल जयस्तम्भ जहां अंगे्रजी हुकूमत ने 10 दिसंबर 1857 को सरेआम उन्हें फांसी पर लटकाकर अट्टहास किया था। पर क्या वीर सचमुच कभी मरते हैं , मरती तो देह है वे तो अमर रह जाते हैं एक गौरवपूर्ण इतिहास के रूप में।
वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें उबाल का नाम नहीं
वह खून कहो किस मतलब का,  आ सके देश के काम नहीं||
वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें जीवन न रवानी है
जो परवश होकर बहता है, वह खून नहीं पानी है -
  कवि गोपाल व्यास दास)

     एक छोटी सी जमींदारी सोनाखान, किन्तु हर वर्ष राज्य शासन द्वारा 10 दिसम्बर को उनकी शहादत दिवस को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए बिंझवार आदिवासी वीर शहीद की स्मृति में, उस पुण्य भूमि में हर बरस मेले का आयोजन किया जाता है, साथ ही लोक कला एवं लोक संस्कृति को संरक्षित करने के लिए आदिवासी लोक कला महोत्सव करवाकर प्रतियोगिता कराई जाती है और उन्हें प्रोत्साहन स्वरूप पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं।
     अभिमान है छत्तीसगढ़ की इस धरा को जिसने वीर नारायण सिंह जैसे सच्चे देशभक्त को जन्म दिया। इस महान चरित्र पर छत्तीसगढ़ को पूरा अधिकार है अभिमान करने का। इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में शहीद वीरनारायण सिंह का नाम हमेशा अंकित हो गया उनके लिए श्रद्धा सुमन इस तरह कि -
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले
वतन पे मरने वालों का यही बाक़ी निशान होगा ||
-जगदम्बा प्रसाद मिश्र “हितैषी”

   

     शकुंतला तरार
     प्लांट नं. 32, सेक्टर-2, एकता नगर

     गुढि़यारी रायपुर  (छ.ग)

Monday, January 25, 2016

वन्दे मातरम्


वन्दे मातरम्