Friday, February 5, 2016

लेख-"छत्तीसगढ़ी लोक गीत-महिलाओं की भूमिका"





छत्तीसगढ़ी लोक गीत-महिलाओं की भूमिका
     लेख. शकुंतला तरार
              लोक गीत चाहे वह किसी भी देश की हो वहां की अमूल्य निधि होती है। इससे एक जाति, स्थान या समाज ही नहीं अपितु पूरा राष्ट्र गौरवान्वित होता है। लोक गीत शब्द के साथ ही हमारे जेहन में ग्राम्यांचल का दृश्य उभरने लगता है। जीवन के विविध इन्द्रधनुषी छटाओं के साथ ही नृत्य-गीत, आल्हादकारी मनोरंजन, सहकारिता की भावना, प्रेम भाइचारे की भावना का दर्शन हमें गावों में ही होता है। लोक गीत न केवल मनोरंजन का साधन है अपितु इसका सामाजिक महत्व भी है। घर-आंगन, खेत-खलिहान, मंदिर-चैपाल, हाट-बाजार, मेला-मड़ई, बाग-बगीचा ऐसी कौन सी जगह नहीं है जहां मानव गाता न हो। वह गाता है और वह भी समूह के साथ। वैसे भी जहां तक मेरी धारणा है कि लोक गीतों की अभिव्यंजना व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामूहिक होती है। इसके साथ ही उनके आचार-विचार, रहन-सहन एक से होते हैं। यह लोक गीत ही है जो मानव कंठ से निकलकर आत्मिक सुख की अनुभूति कराता है। भूले-भटके राही का मार्ग प्रशस्त कर उन्हें कर्तव्य पथ की ओर अग्रसर करता है। वर्तमान के साथ अतीत की मधुर स्मृतियों में गोते लगवाता है। गीतों की स्वर लहरियों के साथ विगत और आगत के मघ्य नये-नये गीतों का संधान करने के साथ ही हमें कुछ नया और नया करने के लिये प्ररित करता है। आशा-निराशा, हर्ष-विषाद, सुख-दुख, संघर्ष आदि की मार्मिक  अभिव्यंजना का चित्रण हमें लोक गीतों से ही मिलता है।
       
            विद्वान साहित्यकारों, संगीत मनीषियों आदि ने अपने-अपने अनुभवों के माध्यम से लोक गीतों की उत्पत्ति में अनुमान का सहारा लिया है। लोक गीतों का यदि वर्गीकरण किया जाय तो उसमें शब्द, धुन, लय, टेर, स्वर व रंजकता के गुण पाये जाते हैं। इसकी उत्पत्ति चाहे जिस रूप में भी हुई हो इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि लोक गीत सर्वप्रथम महिलाओं द्वारा ही गाये गये होंगे। क्योंकि माता ने जब गर्भ धारण किया होगा उसके अंदर नये-नये अहसासों ने जन्म लिया होगा। पहली बार शिशु जब गोद में आया होगा तो माता ने ही उसे सुलाने के लिये लोरियां गाई होगी, रोने पर चुप कराने स्वरों का सहारा लिया होगा तब उसके मुख से जो बोल निकले होंगे उस बोल ने लोरी को जन्म दिया होगा और यही गीत लोरी गीत बनकर सामने आया होगा।
         धान का कटोरा कहलाने वाली हमारी पुण्य धरा छत्तीसगढ़ में तो महिलाओं ने एक वैभवशाली परम्परा को कायम किया है। क्षेत्र चाहे शहरी हो या आरण्यक, महिलाओं ने सदा ही लोक गीतों को परिमार्जित, परिष्कृत करने में पुरुषों का साथ निभाया है। अन्य प्रान्तों में जैसे पंजाब का गिद्दा, महाराष्ट्र की लावणी, निमाण-मालवा के गणगौर, फूलपाती, असम का बीहू, केरल का ओणम महिलाओं द्वारा सम्पन्न लोक गीत हैं। उसी तरह छत्तीसगढ़ में कुछ गीत केवल महिलाओं द्वारा ही सम्पन्न किये जाते हैं जैसे-सुवा नृत्य-गीत, विवाह गीत, सोहर, भोजली, धनकुल, ककसार, आदि। रावतनाच, डंडा नाच, बांस गीत, जवारा, पंथी, गेड़ी आदि केवल पुरुषों द्वारा ही सम्पन्न किये जाने वाले नृत्य और गीत हैं किन्तु वर्तमान समय में पंथी नृत्य में महिलाओं ने पुरुषों के एकाधिकार को तोड़ा है। अतः लोक गीतों में पुप्पित, पल्लवित, लय, ताल, सुर देने में पुरुषों के साथ महिलाओं के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। करमा, ददरिया, सरहुल ऐसे नृत्य-गीत हैं जो श्रम, भक्ति, कर्म और श्रृंगारपरक हैं। गीतों में माधुर्य, सौंदर्य, सौम्यता का सहजता से प्रयोग महिलाओं द्वारा ही सम्पन्न होता है। उत्सवों में संस्कारित मांगलिक कार्यों में फूल-पत्ते सजाना, कलश सजाना, अल्पना बनाना, साज-श्रृंगार आदि कार्यों को विधि -विधान से सम्पन्न कराने में महिलाओं का योगदान अमूल्य है।
            छत्तीसगढ़ में कुछ गीत जातिगत होते हैं जैसे सुवा गीत। सुवा गोंड़ जनजाति का प्रमुख उत्सव नृत्य-गीत है। सुवा गीत कार्तिक कृष्ण पक्ष से शुरू हो कर दीपावली के दिन तक गाया जाता है जिसमें नारियां बांस की टोकनी में धान रखकर उसके बीच में दो तोता रखती हैं जिसे शिव-पार्वती का प्रतीक मानकर गीत गाती हैं। ये समूह में जिसमें आठ-दस होती हैं, टोकनी को बीच में रखकर उसके इर्द-गिर्द गोल घेरा बनाकर गोल घूमते हुए गीत गाती जाती हैं और साथ में लयबद्ध ताली भी बजाती जाती हैं। इस वक्त उनके पैर जमीन पर ठुमकने की शैली में होते हैं और उनका यह ठुमकना तोते की चाल की तरह होता है। उनका यह मानना है कि तोता उनका यह संदेश जरूर परदेश गये प्रियतम तक पहुंचा देगा। पुराने समय में कबूतर के माध्यम से राजा महाराजाओं के द्वारा खतों का, संदेशों का आदान-प्रदान किया जाता था यह हम जानते हैं शायद उसी कड़ी में ही इस सुवा गीत को भी हम ले सकते हैं। सुवा गीत विशेषतः दूर परदेस गये अपने प्रिय को संदेश के रूप में अपनी करूणा की अभिव्यक्ति का माध्यम होता है।  नारी उसके आने की बाट जोह रही होती है या मायके गई हुई स्त्री को जब उसके ससुर, जेठ, देवर लिवाने जाते हैं तब उसके मन के उद्गार कुछ इस तरह होते हैं कि --

तरी हरी नहा ना मोर नहा नारी नाना रे सुवना कि
लाल भाजी जमे झकझोर
ओही लाल भाजी खावन नहीं पाएवं रे सुवना कि
आई गईस ससुर मोर लेवाय
नारे सुवना कि आई गईस ससुर मोर लेवाय
ससुरे के संग-संग मैं नहीं जावौं रे सुवना
कि घेरी-बेरी पईयां ला पड़ाय
नारे सुवना कि घेरी-बेरी पईयां ला पड़ाय।।

         इसी तरह गीतों की रानी ददरिया भी बिना नारी स्वर के अधूरा है। और जहां नारी स्वर हो वहां प्रेम-अनुराग, सौंदर्य, लालित्य, ठिठोली, के साथ ही होती है पसीनों के बूंदों की महक क्योंकि, ददरिया श्रम प्रधान गीत है। यह खेतों-खलिहानों, बाग-बगीचों, जंगल-झाड़ी, कुआं-तालाबों में कहीं भी जहां श्रम हो गाया जाता है। कभी उलाहना के स्वर में तो कभी प्रेम-अनुराग से कहीं श्रृंगारपरक---
     
    बागे बगीचा दिखे ल हरियर
    मोटर वाला नई दिखे बंधे हों नरियर ।।

आमा ला टोरेवं खाहूंच कहिके
मोला दगा दिये राजा आहूंच कहिके।।

   प्रकृति पूजा का प्रतीक हम भोजली को मानते हैं। गेहूं, जौ, उड़द आदि अनाज को छोटी-छोटी टोकनी में खाद डालकर उगाया जाता है। भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा को उस उगाये हुए अन्न को जिसे हम भोजली के रूप में रूपायित करते हैं, समूह में चलकर तालाबों में उसका विसर्जन किया जाता है। जहां मां गंगा की स्तुति की जाती है ताकि उनकी कृपा से भोजली की तरह यह जीवन भी हरा-भरा बना रहे।उसी भोजली के कुछ गुच्छों को लेकर लड़कियां, स्त्रियां एक दूसरे से आदान-प्रदान कर प्रगाढ़ सम्बन्ध स्थापित करती हैं जिसे भोजली बदना कहते हैं। यह होता है मित्रता का प्रतीक, आजीवन सम्बन्ध कायम रखने का प्रतीक। जब भोजली का विसर्जन किया जाता है तब मां गंगा की स्तुति में यह लोक गीत गाया जाता है--

अहो देबी गंगा
देबी गंगा देबी गंगा लहर तुरंगा
हो लहर तुरंगा
हमर भोजली दाई के भीजे आठो अंगा
अहो देबी गंगा
आई गईस पूरा बोहाई गईस कचरा
बोहाई गईस कचरा
हमर भोजली दाई के सोने सोन के अंचरा
अहो देबी गंगा
फुगड़ी बालिकाओं द्वारा गाया जाने वाला खेल गीत है। धनकुल, ककसार छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में गाया जाता है। इसके अलावा देश के अन्य प्रान्तों की तरह यहां भी बच्चे के जन्म संस्कार से लेकर विवाह के समस्त गीत जिनमें मंडपाच्छादन से लेकर चूलमाटी, मंगरोहन, देवतेल,  तेलचघी, नहडोरी, मौर सौंपनी, बारात प्रस्थान, बारात स्वागत, समधी भेंट, भड़ौनी, भांवर, टिकावन, विदाई, डोला परछन आदि  के गीत महिलाओं द्वारा ही गाये जाते हैं।

   हमारे छत्तीसगढ़ के लिये यह गर्व का विषय है कि यहां की महिलाएं घूंघट प्रथा, पर्दा प्रथा जैसी रूढि़यों से हटकर अपनी अस्मिता को बनाये हुए पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करती हैं। खेत-खलिहानों में कार्य करते वक्त जब श्रम की थकन होती है तो उस थकन को मिटाने के लिये गीतों का सहारा लिया जाता है। स्त्री पुरुष दोनों ही एक दूसरे का साथ निभाते हुए गीतों की लडि़यां बांधते हैं। इस वक्त जो गीत गाया जाता है उसे ददरिया कहते हैं। ददरिया में श्रृंगार की बहुलता के साथ ही साथ सुख-दुख, सौहार्द्र, उमंग, हंसी-ठिठोली, मौज-मस्ती से विभोर हार्दिक आत्मीयता का समावेश रहता है। कहते हैं कि नारी बिना ददरिया श्री विहीन है। युग चाहे जितना परिवर्तन करले रहन-सहन, खान-पान, पहनावे में जिस तरह से बदलाव आये किन्तु हमारी आंचलिक धरोहर लोक गीत की पहचान को संजोए रखने में पहले भी महिलाओं की सहभागिता रही है और हमेशा से ही रहेगी। ग्रामीण श्रमिक, खेतिहर महिलाओं के साथ ही हमारी लोक कलाकार जिनमें पंडवानी गायिका पद्मश्री तीजन बाई, ऋतु वर्मा, उषा बारले, मीना साहू, ममता बारले, सुप्रसिद्ध भरथरी गायिका सुरूज बाई खाण्डे, रेखा जलक्षत्री, ममता चंद्राकर आदि के नाम हम गर्व से ले सकते हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक परम्परा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण पहचान दी है।
   अतः कुछ पुरुष प्रधान गीतों को छोड़कर छत्तीसगढ़ के लोक गीतों में महिलाओं ने आदि काल से ही सहभागी बनकर बराबर पुरुषों का साथ दिया है। बौद्धिक सृजन की उठापटक से दूर निष्छल वातावरण में मन के उद्गारों के माध्यम से लोक गीत रूपी निधि से स्वयं उपकृत होकर पुरुष प्रधान समाज को भी उपकृत किया है और समाज को एक नई दिशा प्रदान की है।

शकुंतला तरार
रायपुर छत्तीसगढ़

लेख-1-“बस्तर का पारम्परिक त्यौहार” "माटी तिहार"

1-“बस्तर का पारम्परिक त्यौहार”
         माटी तिहार
§शकुंतला तरार
क्षेत्रीयता के अनुसार विभिन्न रहन-सहन, भाषा-बोली के आधार पर हमारे यहाँ त्यौहारों की विशेष परम्परा रही है | इसी परिप्रेक्ष्य में छत्तीसगढ़ प्रान्त का बस्तर संभाग अपनी अनूठी और विशिष्ट परम्पराओं को संजो कर रखने का प्रयास करता है | चूँकि यहाँ ग्राम्य संस्कृति के साथ ही साथ वन्य संस्कृति, कृषि  संस्कृति  भी  विद्यमान है अतः यहाँ का जनमानस अपनी पहचान यहाँ की माटी के रूप में देता  है | “जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि” यह उक्ति यहीं चरितार्थ होती जान पड़ती है | यहाँ हर पर्व उत्सव सामूहिक रूप से मनाये जाने का रिवाज है |यहाँ की माटी में सांस्कृतिक निश्छलता विद्यमान है तो स्थानीय सारे पर्व –उत्सव ग्राम्य देवी-देवताओं से सम्बंधित होते हैं |मनाने के दिन ग्राम्यानुसार भले ही अलग-अलग हों किन्तु इन त्यौहारों को मनाये बिना यहाँ का कोई भी नया कार्य संपन्न नहीं किया जा सकता |स्थानीय जनमानस को वे सारे नियम जो ग्राम्य संस्कृति, कृषि संस्कृति के अंतर्गत आते हैं, जिन्हें ऋतुओं के अनुसार मनाया जाता है,मान्य होता है | इसी कृषि संस्कृति को धरती माता का उपहार मानकर उसके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट करते हुए मनाया जाता है ‘माटी तिहार’|
चैत्र माह से शुरू होकर वैशाख, ज्येष्ठ तक सुविधानुसार, परम्परानुसार मनाया जाने वाला यह उत्सव माटी तिहार बस्तर में सिर्फ आदिवासियों का ही त्यौहार नहीं है अपितु वे सारे भूमि पुत्र कृषक जिसमें कोष्टा, कलार, पनारा, धाकड़, राउत, पनका, गांडा, माहरा, हल्बा, मुरिया, माड़िया आदि आते हैं सभी के लिए यह अनिवार्य रूप से मनाये जाने का त्यौहार है | बिना किसी तामझाम के, बिना किसी दिखावा के आस्था और श्रद्धा का, भाईचारे का भाव भरता हुआ मनोहारी यह त्यौहार|
बस्तर के प्रत्येक गाँव में एक देवगुड़ी होता है जहाँ का पुजारी माटी पुजारी कहलाता है | माटी तिहार मनाये जाने से पूर्व गाँव या नगर के प्रतिष्ठत और गणमान्य व्यक्ति, पटेल, कोटवार, गांयता, पुजारी आदि माटी पुजारी के यहाँ देवगुड़ी( देवकोट) में एकत्र होकर यह तय करते हैं कि माटी तिहार किस दिन मनाया जावे | चूँकि मैं बस्तर के कोंडागांव से हूँ, मेरे पिता स्व. रतनलाल देवांगन एक कृषक थे और गाँव के गणमान्य व्यक्तियों में उनका अपना मुकाम था सो मेरे यहाँ हर आंचलिक त्यौहार, दैवीय अनुष्ठान ग्राम्य संस्कृति अनुसार ही मनाये जाते थे और अब भी मनाये जाते हैं| 
निश्चित तिथि के दिन मेरी जानकारी अनुसार मेरे गाँव में चैत्र माह में मंगलवार के दिन माटी पुजारी प्रातः काल उठकर देवगुड़ी की साफ-सफाई कर देवता की पूजा-अर्चना करता है पश्चात्  ग्रामवासी एक-एक करके वहां पहुँचते जाते हैं| प्रत्येक कृषक के हाथ में फरसा पान (पलाश के पत्ते) की चिपटी होता है जिसमें पांच मुट्ठी धान होता है, साथ में यथानुसार चावल-दाल, शराब, कुछ पैसे, मुर्गा बकरा, कबूतर आदि लाने का रिवाज भी है |
पूजा के लिए लाई गई सारी सामग्री एक जगह एकत्रित कर ली जाती  है पश्चात् पुजारी द्वारा पारंपरिक पूजा विधि से पान के पत्ते की चिपड़ी बनाकर उसमें शराब की कुछ बूंदें रखकर भूमि में गिराया जाता है जिसे तर्पण करना भी कहते हैं यानि मिटटी को समर्पित कर दिया जाता है उसके बाद सुख समृद्धि, खुशहाली,और प्राकृतिक आपदा से बचाए रखने के लिए प्रार्थना किया जाता है कि‘‘जिस तरह आज तक तुमने हम सब की रक्षा की है हमारा पालन-पोषण किया है उसी तरहआगे भी हम पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखना, हम सब आपकी शरण में आए हुए हैं|’’ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहाँ के (बस्तर) सारे दैवीय अनुष्ठानों में शराब की बूंदों को भूमि में गिराकर यानि मिटटी को तर्पण करके माटी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करके ही पूजा या त्यौहार शुरू करने की परंपरा है|
इसके पश्चात् सभी आए हुए कृषक भी उसका अनुसरण करते हैं आपस में एक दूसरे के माथे पर टीका लगाते हैं फिर एकत्रित सारी सामग्री अलग-अलग कुटुंब अनुसार बाँट दिया जाता है वहीँ भोजन पकाया जाता है| हँसी-ठिठोली के बीच, प्रेम भाईचारे का सन्देश देते हुए सभी भोजन का आनंद लेते हैं |

2-चीखल लोंढी§  शकुंतला तरार
माटी तिहार तब तक पूरा नहीं माना जाता जब तक कि मिटटी में चीखल लोंढी न खेला जाए अर्थात मिटटी की होली न खेली जाए| “चीखल लोंढी” अर्थात “कीचड़ में लुढ़काना”| देवगुड़ी (देवकोट) में ही एक तरफ एक गड्ढे का निर्माण किया जाता है जिसे खेत का प्रतीक माना जाता है जिस पर पानी डालकर कीचड़ तैयार किया जाता है | घर वापसी से पहले माटी पुजारी गड्ढे के किनारे बैठ जाता है सब लोग बारी-बारी से पलाश के पत्ते में बंधा हुआ धान लेकर उस तक जाते हैं,तब वह उसमें से कुछ धान निकाल कर भूमि में गिराता है जैसे धान बोने की प्रक्रिया हो फिर उसके साथियों के द्वारा कृषक को उसी गड्ढे में गिराया जाता है जिससे वह कीचड़ में सन जाता है| सभी के साथ यही प्रक्रिया की जाती है अंत में पुजारी को भी उसी गड्ढे में डाला जाता है इस तरह सब मिलकर कीचड़ की होली खेलते हैं | यह सामाजिक सदभाव का जीता जागता  दृश्य प्रस्तुत करता है | माटी  के प्रति यही बस्तरिया किसान की श्रद्धा और आस्था का प्रमाण है इसके बाद चिपटी के धान को लेकर सभी अपने-अपने घरों को लौट जाते हैं | जब खेतों में धान की बोआई होती है तो उसी धान को बोआई वाले धान जिसे “बीज धान”कहा जाता है, उसमें मिला दिया जाता है | मेरे पिता देवगुड़ी जाते तो धान की चिपटी बनाकर माँ जमना बाई उन्हें देती और जब वे वहां से लौटकर आते तो उस धान की चिपटी को मेरे ही हाथों में देते और मैं उस धान की चिपटी को सुरक्षित ढूसी में रख देती | (ढूसी= धान के पैरा  को रस्सी की तरह बंट लिया जाता है जिसे बेठ कहते हैं, फिर उसी रस्सी को भूमि में उपज अनुसार छोटा या बड़ा गोल-गोल लपेटा जाता है और भीतर में धान भरा जाता है उसे ढूसी कहते हैं | जैसे-जैसे धान निकालते जायेंगे ऊपर से वह कम होता जाता है)
                                                                                                श्रीमती शकुंतला तरार
प्लाट न.-32, सेक्टर-2, एकता नगर,
गुढ़ियारी रायपुर (छ.ग.)
मो- 9425525681,email-shakuntalatarar7@gmail.com

लेख-“गौरवशाली नारी”



 “गौरवशाली नारी”
हमारे भारतीय संस्कृति में नारी को जो गौरवशाली स्थान मिला है वह स्थान विश्व की किसी भी संस्कृति में नहीं है। विद्या, बुद्धि, मान-सम्मान, यश, संपत्तिदयिनी, सर्वशक्ति, सर्वरूपा नारी पौराणिक काल से ही पूजनीय रही है। नारी का स्थान सदैव पुरुष से ऊँचा और श्रेष्ठ माना गया है तभी तो कहा गया है कि “यत्रनार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता”। भारतीय संस्कृति में नारी त्याग, विश्वास, श्रद्धा का प्रतीक मानी जाती है। विश्व मंच पर भारतीय संस्कृति की महानता इसी बात से मानी जाती है कि यहां नारी का उच्च एवं महान आदर्श स्वरूप रहा है वे राजनीति में, रणनीति में, समाजनीति में अपना कीर्तिमान स्थापित कर चुकी हैं।
      नारी के हम तीन रूपों की कल्पना करते हैं। धन, बुद्धि और शक्ति। धन लक्ष्मी हुई,बुद्धि सरस्वती और शक्ति दुर्गा। इड़ा,पिंगला हमारी नारी शक्ति हैं और पुरुष हमारे रीढ़ की हड्डी हैं। इड़ा मनन शक्ति है, पिंगला क्रिया शक्ति। दोनो के समुचित समन्वय से ही पुरुष सफल होता है। वहीं पुरुष जिसके सफलता के पीछे नारी का हाथ होता है किन्तु नारी को प्रताड़ित करने में वह कभी हाथ आया अवसर जाने नहीं देता।
      हिंदू समाज में हम मां का स्थान सर्वोपरि मानते हैं। पुरातन काल से ही आचार्यों, मनीषियों द्वारा सिखाए गए ज्ञान में सर्वप्रथम मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देव भव की शिक्षा दी जाती है। नारी को देवत्व मानकर शक्ति स्वरूपा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। अर्द्धनारीश्वर की कल्पना भी मानव से देवत्व की ओर उठाया गया सम्मानित पूजित स्वरूप है और हमारी भारतीय संस्कृति की ही देन है। नारी पुरुष की अनुगामिनी है पुरुषों की जन्म दात्री है। धर्यवान है वह। नौ महीने तक अपने अंदर में एक भावी पुरुष को रखती है। वह पुरुष राम हो सकते हैं। कृष्ण भी, नानक, कबीर, सूर, तुलसी या अब्दुल कलाम भी।
      स्त्री वह उर्जा है जो स्वयं जलकर भी समाज को दैदिप्यमान करती है। पुरुषों के लिए उसका त्याग अनुकरणीय उदाहरण है चाहे वह फिर सीता हो कुंती या फिर द्रौपदी या उर्मिला। सीता जिसने चौदह वर्ष का वनवास बिताया, फिर भी उसे अपनी शुद्धता, पवित्रता साबित करने के लिए अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा। त्रासदी का अंत यहीं समाप्त नहीं होता बल्कि गर्भावस्था में जंगल में छोड़ दी गई। कल्पना कीजिए यदि वे हिंसक पशुओं का शिकार हो जाती तो क्या होता। क्या हमें लवकुश जैसे वीर बालक मिल पाते। छत्तीसगढ़ की धरती को पावन किया था माता सीता ने। उनके बिना हमारा रामायण अधूरा ही रह जाता। हिंदू समाज में हम पांच स्त्रियों को प्रातः स्मरणीय मानते हैं जिनमें तारा, कुन्ती, अहिल्या, दौपदी एवं मंदोदरी। क्या ये समान्य स्त्रियां थीं। अहिल्या उस पुरुष रूपी छद्म वेशी इंद्र के द्वारा छली जाने पर भी उसे शिला बनना पड़ा और राम रूपी पुरुष ने ही उसका उद्धार भी किया। निर्दोष होते हुए भी वह दण्ड की भागी बनीं, वहीं कुंती ने अपने बेटों के साथ तेरह वर्ष का वनवास झेला फिर भी वह पतियों के साथ स्वर्ग की अधिकारिणी नहीं बनी। दौपदी ने भी पांच पतियों के साथ निर्वाह किया। मंदोदरी ऋषि पुत्री विदुषी महिला थीं। तारा जैसे गुणी स्त्री देवर सुग्रीव के साथ विवाह  करने पर स्वर्ग की अधिकारिणी नहीं बनीं।
 अब हम बात करते हैं मुगल काल की । इस्लाम प्रवेश के बाद भारत में बहुत सारी कुरीतियों ने जन्म लिया। जो महिलाओं को एक युग पीछे ढकलने में सहायक साबित हुआ। इन कुरीतियों में 1- पर्दा पर्था, 2-बाल विवाह, 3- सती प्रथा, 4- शिक्षा पर प्रतिबंध, घर की चारदीवारी तक सीमित कर दिया गया उन्हें। यह महिलाओं की सबसे बड़ी  अवनति का काल था। उन्हें उत्तराधिकार से भी वंचित कर दिया गया। इन सब कुरीतियों में सती प्रथा सबसे दर्दनाक हृदय विदारक था। पति के मौत के बाद उसकी स्त्री को पति के साथ चिता में जिंदा जला दिया जाता था। सती प्रथा का एक उदाहरण महारानी अहिल्या बाई के यहां की हम बात लें तो उनका पुत्र था नथ्याबा जिसकी 15 नवम्बर 1970 को केवल तेईस वर्ष की अल्पायु में ही मृत्यु हो गई। तब उसकी दो पत्नियां थी। एक सत्रह वर्ष की तथा दूसरी दस वर्ष की। दोनों ही पति के साथ सती हो गई थीं। तथा जामाता यशवंतराव फणसे की मृत्यु के पश्चात् पुत्री मुक्ति बाई और यश्वन्त राव की और दो पत्नियां भी सती हो गईं  थी।
      समाज में व्याप्त क्रूर रूढ़ियों के कारण सती प्रथा का प्रचलन बढ़ा। युद्ध में मारे गये योद्धाओं के घरों में विधर्मी विजेताओं द्वारा की जाने वाली लूटपाट तथा उनकी स्त्रियों पर किये जाने वाले अत्याचारों से बचने के लिए ही यह प्रथा प्रारंभ की गई होगी। सती प्रथा के साथ ही महिलाओं द्वारा केसरिया बाना पहनकर युद्धभूमि में जाने वाले राजपूत वीरों की स्त्रियां पति के युद्ध में जाने से पूर्व ही जौहर कर अपनी इहलीला समाप्त कर देते थे ताकि पति के मन में सांसारिक विरक्ति का भाव उत्पन्न हो, दूसरा यह कि वे आश्वश्त हो जायें कि उनके बाद उनकी स्त्रियों पर अत्याचार की आशंका समाप्त हो। बाद में इसके विकृत रूप  ने  इस तरह विकराल रूप धारण कर लिया कि सामान्य जन की स्त्रियों को भी बलपूर्वक सती करा दिया जाता था। इसके दो कारण रहे होंगे। पहला यह कि रिश्तेदारों द्वारा उसके धन पर अधिकार, दूसरा विधवा के पालन पोषण की जिम्मेदारी से बचना। मैंने ऊपर बताया है कि नारी के हम तीन रूपों की कल्पना करते हैं। उसमें लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा तीनों के गुण विद्यमान होते हैं। कुंठित पुरुष ही स्त्री पर लांछन लगाता है।
      औरंगजेब के काल के साथ ही मुगल साम्राज्य की अवनति का काल शुरू हो गया। 1602 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना के साथ ही सदियों से पिछड़ी दबाई गई भारतीय नारियों में जागृति के चिन्ह नजर आने लगे और धीरे-धीरे वे भी बाहर निकलकर पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने लगी। स्त्रियों की सक्रियता बढ़ने के साथ ही उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में भी आगे आने का अवसर मिलने लगा।
      जो भी हो सत्य यह है कि हर युग में नारी ही प्रताडि़त हुई है चाहे शारीरिक, आर्थिक, मानसिक या भावनात्मक हो या यौन प्रताणना। सदियों से नारी शोषण की शिकार बनी थी, बनी है और बनती रहेगी चाहे कानून बने या ना बने। कितने लोग इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं? निरक्षरों, गरीबों की तो बात छोडि़ये, बड़े घरानों की  पढ़ी लिखी महिलायें भी शोषित,प्रताणित होती रही हैं और होती हैं और वे इस शोषण के खिलाफ आवाज उठाने से डरती हैं। उन्हें लगता है कि इस प्रताणना के खिलाफ यदि वे आवाज बुलंद करेंगी तो उन्हें घर से बाहर कर दिया जावेगा। मायके में भी कब तक रह सकती हैं किंतु आजकल अनेक महिला संगठनों ने महिलाओं के हक में अपनी आवाज उठाई है। जिससे महिलाओं को आत्मबल मिला है और वे अपने अधिकारों के प्रति सजग हुई हैं | शकुंतला तरार ---