Monday, April 1, 2013

'' पोटेटो डॉन ''यानि  आलू गुंडा 
साथियों आप सभी जानते तो हैं न यह क्या है… खाने की कौन सी  चीज़ है ...जी हाँ सही पहचाना आपने हम इसे आलू गुंडा के नाम से जानते हैं  हमारे छत्तीसगढ़ में तो यह इसी नाम से जाना जाता है ..कहीं कहीं  किसी प्रान्त में इसे आलू बोंडा कहते हैं तो मुंबई में वडा पाव यानि एक आलू गुंडा के साथ एक डबलरोटी वाला पाव  ये हुआ वडापाव ...मगर इन दिनों जिस तरह से हम हिंगलिश बोल रहे हैं वह दिन दूर नहीं जब हमारा आलू गुंडा पोटेटो डॉन बन जाये तब पति महोदय कहेंगे वाईफ जी ज़रा नाश्ते में पोटेटो डॉन बनाना आज ..सचमुच अब हमारी हिंदी का यही भविष्य होने वाला है वर्तमान की शिक्षा को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है ....हा हा हा   खाए जा पोटेटो डॉन .......और मुस्कुराये जा .....यूँ ही गुनगुनाये जा .आ आ आ आ आ आ आ 

Friday, March 29, 2013


फागुनी दोहे ............

इन्द्रधनुषी रंग में ,पिया रँगी मैं आज 
कासे कहूँ मन बतियाँ ,आवत मोहे लाज ॥ 

रंग गुलाल अबीर से, चुनरी भीजे अंग 
फागुन आया झूम के, तन मन उठे उमंग ॥ 

छेडो  न ऐसे मोहे, समझो  भोली नार 
फागुनी पुरवाई है ,रंगीली मनुहार ॥ 
शकुंतला तरार  3 0 -0 3 -2 0 1 3 

Thursday, March 28, 2013

वह बहुरंगी होली  वह बहुरंगी रूप 
होली के सतरंगी  पावन अवसर पर  
मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएं . नई  दुनिया के होली विशेष अंक में मेरी रचना ....छपी है जिसका शीर्षक है वह बहुरंगी होली  वह बहुरंगी रूप

Thursday, February 28, 2013


  

आज आप पाठकों  के लिए कुछ दोहे छत्तीसगढ़ी में ........

                          होटल में मस्कत  हवे , आलूगुन्डा चाय 
                          दाँत निपोरे देख के , जेब कटागे हाय ॥ 

 छल- कपट भारी होगे, भारी होगे रार
 चंगु मंगु के दिन बहुरगे, ऊंखर नईया पार ॥ 

बानी गुर मा पागे हे , मन मा कपट अमाय 
लडवावय एला ओला , बइठे बंसी बजाय ॥ 
भौजी घर के सोभा ए ,मान बड़ाई पाय 
आँखी मा अइसे बसे , जेंव सपना अमाय ॥ 


Friday, February 15, 2013


वसंत पंचमी के इस पावन अवसर पर महाप्राण निराला का उन्हीं के इस गीत से भावभीना स्मरण


बांधों न नाव इस ठांव
पूछेगा सारा गाँव
बंधु रे ......

यह घाट वही जिस पर हंसकर
वह सदा नहाती थी धंसकर
आँखें रह जाती फंसकर
कंपते थे दोनों पाँव
बंधु  रे ......
  वह हंसी बहुत कुछ कहती थी
फिर भी अपने में रहती थी
सबकी सुनती सहती थी
देती थी सबके दाँव
बंधु  रे ......

Saturday, February 2, 2013

क्या जयपुर का साहित्य महोत्सव व्यक्ति ( बड़ा साहित्यकार होने के गुमान ) को रेखांकित करने का सशक्त माध्यम है ?

Sunday, December 30, 2012


फेसबुक के सभी मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ .............. आप सबके अभिनन्दन में एक गीत नए वर्ष का स्वागत करते हुए 

आओ करें अभिनन्दन आया है नया साल 
भावों से करें वंदन आया है नया साल 

किरणों की तरह बाहें फैलाए करें स्वागत 
भ्रमरों की तरह गुनगुन गाएं  औ करें स्वागत 
 मन से कलुष मिटायें आया है नया साल 

 प्रेम रूपी मणियों का हार हम पिरोयें 
कमल दल की तरह ख़ुशी से खिल जाएँ
झरनों का यहाँ गुंजन आया है नया साल ....शकुंतला तरार ...31/12/2012