Friday, June 28, 2013

छत्तीसगढ़ में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं कोरिया से लेकर कोंटा तक यहाँ छोटे बड़े  इतने सारे जलप्रपात एवं जलधाराएँ हैं जो सावन भादों में अपने  पूरे शवाब पर होती  हैं इन्हीं  दर्शनीय स्थलों में से एक अमृत धारा जल  प्रपात जो कि  मनेन्द्रगढ़ के निकट से बहने वाली हसदेव नदी पर  स्थित है ... सावन के आने की बाट  जोहती इतराने लगी है उसे पता है अब मुझे इतना मान  सम्मान मिलने वाला है प्रतिदिन जाने कितने पर्यटक आयेंगे मेरी खूबसूरती को निहारने मेरी तस्वीर उतारने मुझ पर प्यार लुटाने और इस कड़ी की  शुरुआत तो हो चुकी है ...देखिये किस अदा से संदीप तरार एवं अविनाश देवांगन अपने साथ प्रकृति की इस अनुपम भेंट को कैमरे में कैद किया है ....

















Monday, April 29, 2013

गीत सम्राट नीरज जी के साथ .....

Wednesday, April 24, 2013


एक छत्तीसगढ़ी गीत आप सबके लिए  बहुत प्यार से
 मन मोर गावे दीदी तपत कुरु तपत कुरु  

जब मयं अमरेवं गाँव के मुहाटी
लईका खेलत रिहिन भँवरा बांटी
पीपर खांदा मा कूदत रिहिन बेंदरा
सईंतत गोबर मोल दिखिस मंटोरा
जान गयेंव इहीच मोर गाँव ए
मन मोर गावे दीदी तपत कुरु तपत कुरु
मन मोर गावे दीदी तपत कुरु तपत कुरु ||

गाड़ी बईला कुदावत भईया घर आवे
लोटा पानी धरे भौजी मुसकावे
बईहाँ लमाये दाई-ददा  आँसू ढारें
आँसू खुसी के मोर आँखी ले बरसे
पाँव परेंव इहीच मोर धाम ए
 मन मोर गावे दीदी तपत कुरु तपत कुरु
मन मोर गावे दीदी तपत कुरु तपत कुरु ||

पंड़रू बछरू गईया रम्भावे
चौंरा के तुलसी माथ नवावे
गोंदा चंदैनी घप-घप घमके
फूफू दीदी फूफू दीदी नन्हे कुलकावे
कोरा धरेंव इहीच मोर मान ए
मन मोर गावे दीदी तपत कुरु तपत कुरु
 मन मोर गावे दीदी तपत कुरु तपत कुरु||
 
सुन्ना परे हे नरवा -नदिया
सुन्ना परे बूढ़ी दाई के कुरिया
मन के पीरा मयं काला सुनावँव
कईसे भुलावँव संगी जहुँरिया
भेंट करेंव इहीच सन्मान ए
मन मोर गावे दीदी तपत कुरु तपत कुरु
 मन मोर गावे दीदी तपत कुरु तपत कुरु||

Sunday, April 14, 2013

'' अनबूझ  बस्तर ''
अबूझमाड के
 न बूझ  सकने वाले घने जंगल की तरह
 घने उसके बाल
 केशकाल की बलखाती घाटी की तरह
 उसकी कमर
अप्रतिम सौन्दर्य की मलिका
गोंचा पर्व के तुपकी की तरह
 सजे संवरे अधखुले देह
 फिर
परिजनों के लिए वह आराध्य
देवी दंतेश्वरी की तरह,
 न कोई छल
 न पिपासा
आखिर वह है कौन
वह!
वह है
 बस्तरियों की बहु, बेटी , और माँ .......
शकुंतला तरार ..1 4 -0 4 -2 0 1 3 ''मेरा अपना बस्तर '' काव्य संग्रह से 
 राष्ट्रपति भवन मौरिशस की कुछ यादें

Thursday, April 11, 2013

आज 1 1  अप्रैल ..चैती चाँद ,,यानि चेट्री चंड्र ..गुडी पडवा  और हिन्दू नव वर्ष की सभी भारतवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें ,,,,,

Tuesday, April 9, 2013

मित्रो आप सभी को यह रचना कैसी लगी बेसब्री से मुझे प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा .....
''थानागुड़ी में ''
चहल- पहल है 
आज 
थानागुड़ी में 
साहेब जी आ रहे हैं 
रात यहीं विश्राम करेंगे 
नये- नये हैं 
तबादले पर आये हैं
'' वे ''
सुनते थे 
यहाँ आने से पहले 
कि 
बस्तर के लोग, 
गाँव, 
जंगल, 
आदिवासी
ऐसे? 
वैसे?
और अब आना हुआ है
तो ऐसा सुनहरा मौका
क्यों चूका जाय 
साहब भीतर ही भीतर
बहुत खुश हैं 
मातहतों के चहरे 
घबराहट में 
आखिर साहब तो साहब हैं 
जल्दी से पीने का 
और साथ में
मुर्गे का भी 
करना है इंतजाम 
क्या करें 
अचानक साहब का दौरा जो तय हो गया 
अब तो रात में घोटुल से
चेलिक -मोटियारिन आयेंगे
रीलो गाकर , नाचकर 
साहब को 
प्रसन्न करेंगे 
और साहब
अपने ग्रामीण क्षेत्रों का समय 
सानंद बिताकर 
वापस लौट जायेंगे
शहर मुख्यालय की ओर 
आने के लिए
पुनः पुनः ....
.''मेरा अपना बस्तर'' काव्य संग्रह से 
शकुंतला तरार 0 9 -0 4 -2 0 1 3