Friday, May 15, 2026

राजमाता सुवर्ण कुमारी (सुबरन कुँवर) स्वतंत्रता सेनानी--------शकुंतला तरार- 15-05-2026

 

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  राजमाता सुवर्ण कुमारी (सुबरन कुँवर) स्वतंत्रता सेनानी

             बस्तर का इतिहास रानी सुवर्ण कुमारी के अदम्य साहस, वीरता, त्याग, अंग्रेजों के साथ जूझने की अदम्य जीजिविषा, भूमकाल की उद्घोषणा के साथ ही आटविक युद्ध के आगाज की घोषणा के लिए सदैव स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।

अंग्रेजों के जुल्म से समूचा भारत त्राहि-त्राहि कर उठा था। इसका असर सुदूर अंचल बस्तर पर भी पड़ा था। 1854 में बस्तर का शासन पूरी तरह से अंग्रेजों के अधीन हो गया। इस तरह से अंग्रेजों के द्वारा सत्ता में दखल से राजा भैरमदेव और दीवान दलगंजन सिंह सहित बस्तर की जनता भी अप्रसन्न थी। अंग्रेजों की नीतियाँ लगातार बस्तर के शोषण की रही थी।

राजा भैरम देव की रानी राजमाता रानी सुवर्ण कुमारी देवी भूमकाल के विप्लव की प्रमुख सूत्रधार थीं। सीलपरा जमींदार के उत्तम कुल के क्षत्रिय (रीवां, बघेल खण्ड) को बस्तर लाकर उनकी दो कन्याओं से श्रीमान पण्डित लोकनाथ ठाकुर राजगुरु ने महाराज का विवाह करवाया था।   सुवर्ण कुमारी ही बड़ी महारानी के रूप में प्रतिष्ठापित हुई।  

यह वह दौर था जब राज घराने की प्रत्येक गतिविधियों पर अंग्रेजों की नजर रहती थी फिर भी रानी ने अंग्रेजों के विरूद्ध संगठित हो रहे विद्रोहियों का न केवल साथ दिया अपितु अपने ओजस्वी भाषणों से विद्रोहियों में जोश और साहस का संचार करती थी।

रानी सुवर्ण कुमारी ने ही सर्वप्रथम अंतागढ़ के तोड़ोकी में सभा को संबोधित करते हुए मुरिया राज की स्थापना का शंखनाद किया जिससे उपस्थित जन समूह में आजादी के लिए ब्रिटिशशासन के खिलाफ विद्रोह का स्वर मुखरित हुआ।

लाल कालेन्द्र के साथ मिलकर रानी ने प्रतीकों का विस्तार किया। रूद्रप्रताप देव 1903 में बालिग हो चुके थे किंतु टालमटोल करते हुए ब्रिटिश प्रशासन ने उन्हें 1908 में विधिवत राजा घोषित किया।     किंतु सुवर्ण कुमारी और लाल कालेन्द्र सिंह उनकी इस चाल को समझ गए थे। उनकी यह लड़ाई बस्तर के हित के लिए थी, बस्तर की जनता के लिए, बस्तर के लोगों के आत्म सम्मान की रक्षा के लिए, बेटियों को शोषण से बचाने के लिए, जनता के नर संहार को बचाने के लिए और अंग्रेज मुक्त बस्तर करने के लिए थी। वे जानती थीं सामने ब्रिटिश सेना गोला, बारूद बंदूक से तैयार है और उनके राज्य के वीरों के पास मात्र तीर, कमान और भाला का ही अस्त्र है फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी एक महिला होकर भी अदम्य साहस का परिचय देते हुए डटी रहीं।

 अक्टूबर 1909 में दशहरे के दिन राजमाता सुबरन कुँवर ने लाल कालेन्द्र सिंह, अंग्रेजों द्वारा निकाले गए भूतपूर्व सभासदों तथा हजारों आदिवासियों को तोड़ोकी में संबोधित किया और उन्होंने याद दिलाया उन्हें कि 1876 में वे किस प्रकार ब्रिटिश कुशासन के विरूद्ध एकजुट होकर उठ खड़े हुए थे और ब्रिटिशशासन को अंत में उनकी बात माननी पड़ी थी।

 रानी सुबरन कुँवर ने पुनः उपस्थित जनता को उत्साहित करते हुए कहा कि ‘‘आप लोग अंग्रेजों द्वारा नियुक्त दीवान के खिलाफ तत्काल संघर्ष छेड़ दें। उन कर्मचारियों को निकाल बाहर फेंकें जो बस्तर के दुश्मन हैं और बस्तर को घुन के समान चाट रहे हैं। इन आततायी कर्मचारियों के संरक्षक अंग्रेजी-राज को नेस्तनाबूत कर दें।

  राजमाता सुबरन कुँवर के उक्त उद्बोधन से जनता में उत्साह और जोश की लहर दौड़ गई। रानी के ही सुझाव से तब लाल कालेन्द्र सिंह ने गुण्डाधुर को उपस्थित समस्त जन समुदाय के आगे उस महान भूमकाल का प्रमुख नेता चुना तथा परगने के अनुसार परगना स्तर पर नेताओं का चयन किया, जिसकी घोषणा उसीमंच से राजमाता सुबरन कुँवर ने की।

            6 फरवरी 1910 को राजमाता सुबरन कुँवर ने अपने अनुयाइयों को आदेश दिया कि पंडा बैजनाथ जहाँ भी हो उसे पकड़कर उसके सम्मुख लाएँ। ताकि वह उसे राजद्रोह के आरोप में सजा दे।

            7 फरवरी को रानी ने एक गुप्त सभा किया जिसमें गुण्डाधुर के साथ ही हिड़मा पेडा, रोंडा पेडा, कोरिया माझी, धनीराम सुकरू, भेड़िया, महादेव हुन्तान उर्फ हुंगा तथा कुराटी सोमा थे, के समक्ष उन्होंने उद्घोषणा की कि अब बस्तर से ब्रिटिश राज समाप्त हो गया है तथा आज हम पुनः मुरियाराज की स्थापना पर संकल्प लेते हैं। इसका असर समस्त राज पर पड़ा और 7 फरवरी को गीदम को इन विद्राहियों ने अपने कब्जे में ले लिया और तय हुआ कि अब धीरे-धीरे सम्पूर्ण बस्तर से सभी कस्बों पर अधिकार करेंगे। अंग्रेजों के खिलाफ एक महिला का निरंतर विद्रोहियों को संघर्ष के लिए प्रेरित करते रहना अद्भुत साहस का कार्य था।

              आदिवासियों द्वारा लगातार संघर्ष के पश्चात जब भूमकाल का पराभव हुआ। 5 मार्च को अंग्रेजों ने छापेमारी करके रानी सुबरन कुँवर को गिरफ्तार कर उन्हें महल में लाकर नजरबंद कर दिया। बाद में राजमाता सुबरन कुंअर को रायपुर भेज दिया गया जहाँ अक्टूबर 1910 में उनकी मृत्यु हो गई।

     इस तरह बस्तर के इतिहास में कई ऐसी महिला नेत्रियाँ हुईं जिन्होंने बस्तर के लिए, आदिवासी हितों के लिए, अपने राज्य की खुशहाली के लिए अपने प्राणों की भी परवाह न करते हुए संघर्ष कर अपना बलिदान किया। धन्य है उनमें से राजमाता सुबरन कुँवर वे इतिहास में सदैव अमर रहेंगी।

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