Tuesday, May 26, 2026

व्यक्तित्व---- जिज्ञासा से लबालब भरी कवयित्री, वरिष्ठ साहित्यकार, संपादक श्रीमती शकुंतला तरार --डुमनलाल ध्रुव

 व्यक्तित्व----  

जिज्ञासा से लबालब भरी कवयित्री, वरिष्ठ साहित्यकार, संपादक   श्रीमती शकुंतला तरार --

                                                                                                                           डुमनलाल ध्रुव 


💐💐💐💐💐💐💐💐 काफी लंबे समय से साहित्य की सेवा करने वाली श्रीमती शकुंतला तरार के रचना संसार और विशिष्टताओं से नयी पीढ़ियों को अवगत कराना बहुत जरूरी है। बस्तर के कोंडागाँव  जिला में 13 जुलाई 1957 को श्री रतनलाल जमनाबाई देवांगन के घर  में जन्मी, पली-बढ़ी, एम. ए. राजनीति शास्त्र और संगीत की शिक्षा के साथ श्रीमती शकुंतला तरार के व्यक्तित्व की प्रतिछवि का होना कोई आश्चर्य नहीं ! "नारी का संबल" जैसी साहित्यिक  पत्रिका का संपादन 25 वर्षों से करना स्मृतियों के विवरण के साथ बहुत ज्यादा ही प्रभावी रहा है | जिज्ञासा से लबालब, अनुशासन और अनुसरण की महत्ता को निरुपित करती हैं आप | कवयित्री होने के साथ एक बड़ी जवाबदारी है सामाजिक, सांस्कृतिक और दायित्वबोध के साथ लिखना |  

                     शकुंतला तरार की कविताओं में बस्तर की सांस्कृतिक झलक प्रेरक शक्ति की तरह दिखाई देती है। बन कैना, बस्तर का क्रांतिवीर गुंडाधुर, बस्तर की लोक कथाएँ, बेटियाँ छत्तीसगढ़ की, टेपारी, चूरी, घरगुंदिया, मेरा अपना बस्तर, महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी, बस्तर चो फुलबाड़ी, बस्तर चो सुंदर माटी, राँडी माय लेका पोरटा , बेटियाँ छत्तीसगढ़ की, “शकुंतला चो लेजा गीद” हाँ!मैं अबूझमाड़ हूँ -- जैसी कृति भावी पीढ़ी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है । वे कहती हैं ---

 

आने के दुख ला मेटाके देख लव

पीरा मा घलो मुस्किया के देख लव

जिनगी कईसे हाँस के पहा जाही

गीत ला थोकन गुनगुनाके देख लव।

                         शकुंतला तरार सही अर्थों में भीतर के दुख को मिटाने का उदीम करती हैं, वह अपने साथ एक गुनगुनाहट लाती हैं, मगर वह जीवन संत्रासों से पराजित हो जाए तब यह कहकर संतोष हो जाती हैं  कि-कोई दुख साहस से बड़ा नहीं होता हारता वही है जो लड़ना नहीं जानता। परंतु यह स्थितियाँ भी जीवन के कई बिंब अनुभूतियों और अनुभवों को अपने साथ लेकर चलती हैं ।

 

सरी मंझनिया

झेंझरा कस फरिया म

मछरी छींचत

त कभू

खेत खार मा

नांगर बइला कुदावत

बर पीपर के छईंहा मा

झूलना झूलत

त कभू

डांडी पउहा खेलत

कहंचो

इत्ता -इत्ता पानी घोर -घोर रानी गावत

सुवा,ददरिया थपड़ी पीटत

सुरुज

आय होही

आज मोर गाँव  मा

            शकुंतला तरार ने ग्रामीण जीवन व बचपन को बखूबी निभाया है। जिंदगी के सही मायने में अटकन-बटकन, सुआ - ददरिया, इत्ता -इत्ता पानी घोर -घोर रानी किसी न किसी रूप में गाया है। भले ही आज उसकी पहचान करना कठिन हो गया । दोहरे मानदंड जीवन के वैशिष्ट्य को बहुत खुलेपन से उजागर करते हैं ।तभी तो वे कहती हैं –

जब मैं अमरेंव गाँव  के मुहाटी

लईका खेलत रिहिन भँवरा बाँटी

पीपर कांधा म कूदत रिहिन बेंदरा

संईतत गोबर मोला दिखिस मंटोरा

जान गयेंव इहीच्च मोर गाँव  ए

 

                     किसी गाँव  के गंभीर दृश्य को देखकर लोग यह जान जाते हैं कि गाँव   समय के सच को बहुत ही इमानदारी से बयान करते हैं। जो गाँव  समय के सच को बयान नहीं कर सकते उस गाँव  का कोई महत्व नहीं है और न ही इतिहास उसे अपने में जगह दे सकता है।

           अनुभूतियाँ तो होती है भँवरा बाँटी,पीपर खाँधा,बेंदरा और मंटोरा की रचनाएँ  जो मानसरोवर के जल में तैरते हुए हंसों की पाती की तरह गाए जाते हैं मोर गाँव में। गाँव  के युग की ध्वनि को संवाद में परिवर्तित करने का अनूठा प्रयास किया है कवयित्री   शकुंतला तरार ने । इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है -----

मेरे गीतों को रवानी दे गया

प्यार की अपनी निशानी दे गया ।

फूल से चेहरे न मुरझाएँ कभी 

दिल को राहत ए रूहानी दे गया।

इश्क़ हो जाए तो ये दिल क्या करे

सोचकर अपनी कहानी दे गया ।

खुश हुई मैं पाके अपनी मंजिलें

दर्द मेरी वो पुरानी दे गया ।

प्यारी सी उसकी अदाएँ शोख भी

मुझको चूड़ा खानदानी दे गया।

                      बहुत ही सहज और बोधगम्य भाषा में शब्दों को विस्तार दिया  है आपने । शब्दों में बसा लालित्य और भावपक्ष जिंदगी के विभिन्न आयामों से जोड़े गए हैं। वही कवयित्री की हार्दिक निश्छलता को व्यक्त करती है ।

यहाँ साल सागौन शीशम के पेड़,

यह झेलते झंझा के झेल

यहाँ आम इमली तेंदू चार

आपस में करते प्रेम प्यार

नहीं होता आपस में कोई दंगल

बस्तर के ये घने जंगल ।

        "महानदी की धारा हूँ " ये पंक्तियाँ मुझे इसलिए प्रभावित करती है क्योंकि इसमें एक शाश्वत सच की अनुगूँज है और कथ्य की विशेषता है ।

महानदी की धारा हूँ, मैं महानदी की धारा हूँ

मैं कलकल - छलछल बहती ,

सबका दुख दारुण हरती

संताप मिटाने आई हूँ

मैं महानदी की धारा हूँ 

 

                      शकुंतला तरार ने बस्तर से लेकर महानदी का स्वतंत्र चित्रण अपनी कृतियों में किया है | प्रकृति को प्रतीक के रूप में भी अपनाया है। अपनी रचना धर्मिता को अधिक रमणीय बनाने के लिए लोकशैली का आश्रय नए स्वरूप को सिरजाती है ।

             डुमन लाल ध्रुव       11.4.2022

 


Friday, May 22, 2026

एक भेंट --जयप्रकाश मानस ---अद्भुत विद्वान, निराला व्यक्तित्व ---शकुंतला तरार

 

एक भेंट --जयप्रकाश मानस ---अद्भुत विद्वान, निराला व्यक्तित्व ---


         एक लम्बे अंतराल अर्थात लगभग दस साल से ऊपर हो गया होगा हमें एक ही शहर में रहते हुए इस बीच लगभग सैकड़ों आयोजन हुए होंगे किन्तु वे कहीं दिखाई नहीं दिए और हमारी भेंट नहीं हो पाई इसका कारण जो भी रहा हो किन्तु बहुत ज्यादा नहीं बाद में बताती हूँ |

         



         हुआ यूँ कि पिछले जून माह में साहित्य अकादेमी दिल्ली का एक कार्यक्रम साहित्य अकादमी  रायपुर छत्तीसगढ़ के संयुक्त तत्वावधान में स्थानीय सर्किट हाउस के सभागार में संपन्न हुआ | संयोग से उस कार्यक्रम में मानस जी और मैं एक सत्र में एक साथ मंच पर बैठे थे | उसी दौरान हमने खूब बातें की | लगा ही नहीं कि इतने सालों बाद मिले हैं या ऐसे कि बरसों से मन के अन्दर जो दबा हुआ है वह कब बाहर निकले किन्तु मंच की भी एक मर्यादा होती है अतः हमने बातें तो कीं किन्तु मन नहीं भरा | 

      फेसबुक के माध्यम से  वे मुझे कभी कभार देखते रहे किन्तु फिर से हमारे बीच वही चुप्पी या वीरानी छाई हुई थी कि और एक आयोजन  22 मई को छत्तीसगढ़ भाषा साहित्य अकादमी, जय जोहार साहित्य संस्थान और छत्तीसगढ़ मित्र के संयुक्त तत्वावधान में पुस्तक विमोचन और काव्य पाठ का कार्यक्रम स्थानीय विमतारा में संपन्न हुआ जहाँ केलिफोर्निया की प्रवासी भारतीय डॉ अनीता कपूर का आगमन हुआ था |  वहाँ  हम फिर मिले किन्तु वे मंच पर और मैं सामने प्रथम पंक्ति में दर्शक दीर्घा में औपचारिक अभिवादन हुआ किन्तु पारिवारिक कार्यवश उन्हें जाना था  | उन्होंने अपना वक्तव्य दिया और निजी कारणों से प्रस्थान कर गए | हमारी फिर बातचीत नहीं हुई |

      किन्तु इस कार्यक्रम से पूर्व एक कार्यक्रम की पूर्व सूचना उन्होंने मुझे दे दी थी इसलिए मैं निश्चिन्त थी कि अब पुनः भेंट तो होनी ही है किन्तु कार्यक्रमों के अवसर पर हम कम ही बातें कर पाते हैं क्योंकि सभी अपने आप में व्यस्त होते हैं और आयोजक तो बहुत ज्यादा व्यस्त |

मंगलवार कि रात लगभग ग्यारह बजे वाट्स अप पर उन्होंने 29 तारीख़ के कार्यक्रम का निमंत्रण मुझे भेजा जिसमें आयोजन सममिति में मेरी पत्रिका “नारी का संबल” का भी नाम था | उनकी सहृदयता, सदाशयता की के प्रति नत होते हुए , उन्हें जागते हुए जानकर मेरी थोड़ी सी बात हुई और मैं बुधवार के दिन दोपहर एक बजे उनसे मिलने उनके ऑफिस में पहुँची | हम दो घंटे बातचीत करते रहे इस बीच जयभारती चंद्राकर और डॉ सीमा सीमा श्रीवास्तव जो साहित्यकार भी हैं उनको भी चेंबर में बुलवाया | खूब बातें हुई | वैसे भी रायपुर में डॉ सुधीर शर्मा और जयप्रकाश मानस को सदा से ही अपने छोटे भाई की तरह मैंने देखा है और विद्वान आदरणीय आचार्य  नर्मदा प्रसाद मिश्र जी से मुझे परोक्ष रूप से साहित्य विधा पर बहुत कुछ सीखने को मिला है | तीनो बहुत विद्वान् हैं |

मानस जी ने  मुझे सुभाष मिश्र जी द्वारा लिखित सम्पादित छत्तीसगढ़ की विभूतियों के ऊपर दो भागों में लिखित पुस्तकें भी दीं | यह कहते हुए कि मेरे पास इसके दो सेट हैं  एक आप ले जाइए |

अब बताऊँ कि हमारी अब तक भेंट कैसे नहीं हुई तो उन्होंने बताया कि नवा रायपुर में लगातार सात वर्षों से ड्यूटी होने से लौटकर किसी कार्यक्रम में जाने योग्य मन नहीं करता था वहाँ से लौटते थे तो थक जाते थे यही वजह है दीन दुनिया से कटे रहने का कारण | हालाँकि मैं इससे बहुत ज्यादा सहमत नहीं हूँ |

जयप्रकाश मानस जी की खूबी यह है कि वे शब्दों के जादूगर हैं | थोड़ा मूडी भी हैं शब्दों को तौल मोलकर,सोच समझकर बोलते हैं |  और मैं उन्हीं शब्दों के बीच खुद को खोकर कुछ गुनते हुए , कुछ बुनते हुए वापस घर को लौट गई |

शकुंतला तरार           

Sunday, May 17, 2026

स्वतंत्रता सेनानी डॉ. राधाबाई--शकुंतला तरार

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 महिला स्वतंत्रता सेनानी डॉ. राधाबाई

क्रांतिकारी प्रखर देशभक्त डॉ. राधाबाई  प्रसिद्ध महिला स्वतंत्रता सेनानी तथा समाज सुधारकों में से एक थीं। राधा बाई का जन्म सन 1875 में इतवारा नागपुर में हुआ था | 9 वर्ष की आयु में ही वे विधवा हो गईं थी | 1918 में वह रायपुर आईं और वे यहाँ नगर पालिका में  दाई का काम करने लगीं | तब उनकी सेवा और लगन से प्रभावित होकर नगर पालिका की ओर से उन्हें टांगा घोड़े की सुविधा प्रदान की गई थी। प्रेममयी, मिलनसार, सरल स्वभाव के कारण  उनका चाहे गरीब हों, या अमीर सबके मुख से राधाबाई का नाम निकलता था। तब वे जन उपाधि के रूप में डॉ. राधाबाई कहलाने लगीं। 


1920 में जब गांधी जी पहली बार रायपुर आए तो उन्हें उनसे प्रेरणा मिली | धमतरी तहसील के कन्डेल नामक गांव में चल रहे किसान सत्याग्रह के संदर्भ में ही हुआ था। 1930 से लेकर 1942 तक वे साथियों के साथ वे सत्याग्रह में भाग लेती रहीं | कौमी एकता, स्वदेशी, नारी जागरण, अस्पृश्यता निवारण, शराबबंदी, इन सभी आंदोलनों में उनकी भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण रही।  उनका प्रमुख काम था शराबियों की शराब छुड़ाना, शराब बेचने वालों से शराब भट्टी तुड़वाना | वे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के सभी आंदोलनों में आगे रहीं। समाज में प्रचलित कई कुप्रथाओं को समाप्त करने में भी राधाबाई का योगदान अविस्मरणीय है।

पहले छत्तीसगढ़ के गांवों और शहरों में सामंतों के यहां वेश्याओं का नाच हुआ करता था। जिसे छत्तीसगढ़ी भाषा में किसबिन नाच कहा जाता था। छत्तीसगढ़ की बहिनों ने राधाबाई के नेतृत्व में उसके खिलाफ जबर्दस्त आंदोलन किया। उन्हें सफलता मिली। उनका साथ देने वालों में थे - डॉ. खूबचंद बघेल, श्री प्रेमतीर्थ बघेल (श्री हरिप्रेम बघेल) के पिता तथा रामभरोसा पांडे, शिक्षाविद् पं. मोहनलाल पांडेय के पिता। सबसे पहिले इस प्रथा की समाप्ति खरोरा में हो गई फिर तो पूरे छत्तीसगढ़ में इसका प्रचार हुआ और यह प्रथा समाप्त हो गई। डॉ. राधाबाई के मार्गदर्शन में जो सबसे महत्वपूर्ण क्रांतिकारी काम हुआ वह था वेश्यावृत्ति में लगी बहिनों को इस पेशे से छुटकारा दिलाना।

भाई दूज के दिन अपने रक्षाबंद मुस्लिम भाईयों की पूजा कर उन्हें अपने घर में अपने हाथ से भोजन पका कर खिलाती थीं। वे बिना स्नान के कभी अन्न ग्रहण नहीं करती थीं। साधू-संतों के प्रति भी उनकी अटूट श्रद्धा थी। मनु हठयोगी ने जब समाधि ली तो उनकी समाधि बनाने के लिए उनके सभी धनी भक्त पीछे रह गए, तब डॉ. राधाबाई ने अपनी सोने की चूड़ियां उतारकर समाधि में रख दीं। बूढ़ेश्वर मंदिर के पास यह समाधि आज भी स्थित है। उनके त्याग का प्रभाव दूसरों पर भी पड़ा।

डॉ. राधाबाई छत्तीसगढ़ क्षेत्र की उन सेविकाओं में थीं, जिन्होंने राष्ट्रसेवा को ही अपना धर्म माना। अपना तन-मन-धन सब कुछ देश को अर्पित कर चली गईं। सेवा उनकी साधना थी और लक्ष्य था स्वराज्य। सेवक के सामने जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र का भेद नहीं होता। जहां रहे वहीं के हो गए।

महंत लक्ष्मीनारायण दास जी का जैतू साव मठ, पुरानी बस्ती इन आंदोलनों में सबसे बड़ा केन्द्र बना। बहनें वहाँ चरखा काततीं, वहाँ से प्रभातफेरी निकालतीं। प्रौढ़ शिक्षा संचालन करतीं, सत्याग्रह की तैयारी करतीं। सफाई टोली निकालतीं। जुलूस निकालतीं। विदेशी कपड़ों की होली जलातीं। मूंगा माला तोड़ कर फेंकतीं । परदा प्रथा समाप्त करने की ज़बरदस्त कोशिश करतीं। विरोध भी हुआ। मोर्चा लिया मारवाड़ी समाज की बहनों ने। सत्याग्रह स्थल बना सदर बाजार का जगन्नाथ मंदिर। यहाँ एकत्रित होकर सदर बाजार की बहनें परदा प्रथा के विरोध में भाषण देतीं। वहीं से परदा प्रथा की समाप्ति हुई।

 छत्तीसगढ़ में परदा प्रथा नहीं थी। पर ब्लाउज़ पहिनने का रिवाज नहीं था। महिलाएँ साड़ी ही लपेट कर ब्लाउज़ के स्थान पर उपयोग करती थीं। राष्ट्रीय जागरण के प्रणेता सुंदरलाल शर्मा की प्रेरणा से उनकी धर्मपत्नी श्रीमती बोधिनी बाई ने सबसे पहिले ब्लाउज़ पहना। बूढ़ी सयानियों ने उसका विरोध किया। वे उसे पतुरिया नाचने वाली का पोशाक कहतीं। बाद में सभी ने ब्लाउज़ पहनना शुरु कर दिया। कमासीपारा का मोतीलाल कोठारी का बाड़ा महिलाओं के लिए सभा स्थल होता। गाँधी जी की बहनों की सभा वहीं हुई थी।

स्वराज्य प्राप्ति के लक्ष्य को पूरा कर 2 जनवरी 1950 को 9 बजे सुबह माघ पूर्णिमा के दिन वे अपनी 85 वर्ष की आयु में इस संसार को छोड़कर चली गई।

 

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Friday, May 15, 2026

राजमाता सुवर्ण कुमारी (सुबरन कुँवर) स्वतंत्रता सेनानी--------शकुंतला तरार- 15-05-2026

 

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  राजमाता सुवर्ण कुमारी (सुबरन कुँवर) स्वतंत्रता सेनानी

             बस्तर का इतिहास रानी सुवर्ण कुमारी के अदम्य साहस, वीरता, त्याग, अंग्रेजों के साथ जूझने की अदम्य जीजिविषा, भूमकाल की उद्घोषणा के साथ ही आटविक युद्ध के आगाज की घोषणा के लिए सदैव स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।

अंग्रेजों के जुल्म से समूचा भारत त्राहि-त्राहि कर उठा था। इसका असर सुदूर अंचल बस्तर पर भी पड़ा था। 1854 में बस्तर का शासन पूरी तरह से अंग्रेजों के अधीन हो गया। इस तरह से अंग्रेजों के द्वारा सत्ता में दखल से राजा भैरमदेव और दीवान दलगंजन सिंह सहित बस्तर की जनता भी अप्रसन्न थी। अंग्रेजों की नीतियाँ लगातार बस्तर के शोषण की रही थी।

राजा भैरम देव की रानी राजमाता रानी सुवर्ण कुमारी देवी भूमकाल के विप्लव की प्रमुख सूत्रधार थीं। सीलपरा जमींदार के उत्तम कुल के क्षत्रिय (रीवां, बघेल खण्ड) को बस्तर लाकर उनकी दो कन्याओं से श्रीमान पण्डित लोकनाथ ठाकुर राजगुरु ने महाराज का विवाह करवाया था।   सुवर्ण कुमारी ही बड़ी महारानी के रूप में प्रतिष्ठापित हुई।  

यह वह दौर था जब राज घराने की प्रत्येक गतिविधियों पर अंग्रेजों की नजर रहती थी फिर भी रानी ने अंग्रेजों के विरूद्ध संगठित हो रहे विद्रोहियों का न केवल साथ दिया अपितु अपने ओजस्वी भाषणों से विद्रोहियों में जोश और साहस का संचार करती थी।

रानी सुवर्ण कुमारी ने ही सर्वप्रथम अंतागढ़ के तोड़ोकी में सभा को संबोधित करते हुए मुरिया राज की स्थापना का शंखनाद किया जिससे उपस्थित जन समूह में आजादी के लिए ब्रिटिशशासन के खिलाफ विद्रोह का स्वर मुखरित हुआ।

लाल कालेन्द्र के साथ मिलकर रानी ने प्रतीकों का विस्तार किया। रूद्रप्रताप देव 1903 में बालिग हो चुके थे किंतु टालमटोल करते हुए ब्रिटिश प्रशासन ने उन्हें 1908 में विधिवत राजा घोषित किया।     किंतु सुवर्ण कुमारी और लाल कालेन्द्र सिंह उनकी इस चाल को समझ गए थे। उनकी यह लड़ाई बस्तर के हित के लिए थी, बस्तर की जनता के लिए, बस्तर के लोगों के आत्म सम्मान की रक्षा के लिए, बेटियों को शोषण से बचाने के लिए, जनता के नर संहार को बचाने के लिए और अंग्रेज मुक्त बस्तर करने के लिए थी। वे जानती थीं सामने ब्रिटिश सेना गोला, बारूद बंदूक से तैयार है और उनके राज्य के वीरों के पास मात्र तीर, कमान और भाला का ही अस्त्र है फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी एक महिला होकर भी अदम्य साहस का परिचय देते हुए डटी रहीं।

 अक्टूबर 1909 में दशहरे के दिन राजमाता सुबरन कुँवर ने लाल कालेन्द्र सिंह, अंग्रेजों द्वारा निकाले गए भूतपूर्व सभासदों तथा हजारों आदिवासियों को तोड़ोकी में संबोधित किया और उन्होंने याद दिलाया उन्हें कि 1876 में वे किस प्रकार ब्रिटिश कुशासन के विरूद्ध एकजुट होकर उठ खड़े हुए थे और ब्रिटिशशासन को अंत में उनकी बात माननी पड़ी थी।

 रानी सुबरन कुँवर ने पुनः उपस्थित जनता को उत्साहित करते हुए कहा कि ‘‘आप लोग अंग्रेजों द्वारा नियुक्त दीवान के खिलाफ तत्काल संघर्ष छेड़ दें। उन कर्मचारियों को निकाल बाहर फेंकें जो बस्तर के दुश्मन हैं और बस्तर को घुन के समान चाट रहे हैं। इन आततायी कर्मचारियों के संरक्षक अंग्रेजी-राज को नेस्तनाबूत कर दें।

  राजमाता सुबरन कुँवर के उक्त उद्बोधन से जनता में उत्साह और जोश की लहर दौड़ गई। रानी के ही सुझाव से तब लाल कालेन्द्र सिंह ने गुण्डाधुर को उपस्थित समस्त जन समुदाय के आगे उस महान भूमकाल का प्रमुख नेता चुना तथा परगने के अनुसार परगना स्तर पर नेताओं का चयन किया, जिसकी घोषणा उसीमंच से राजमाता सुबरन कुँवर ने की।

            6 फरवरी 1910 को राजमाता सुबरन कुँवर ने अपने अनुयाइयों को आदेश दिया कि पंडा बैजनाथ जहाँ भी हो उसे पकड़कर उसके सम्मुख लाएँ। ताकि वह उसे राजद्रोह के आरोप में सजा दे।

            7 फरवरी को रानी ने एक गुप्त सभा किया जिसमें गुण्डाधुर के साथ ही हिड़मा पेडा, रोंडा पेडा, कोरिया माझी, धनीराम सुकरू, भेड़िया, महादेव हुन्तान उर्फ हुंगा तथा कुराटी सोमा थे, के समक्ष उन्होंने उद्घोषणा की कि अब बस्तर से ब्रिटिश राज समाप्त हो गया है तथा आज हम पुनः मुरियाराज की स्थापना पर संकल्प लेते हैं। इसका असर समस्त राज पर पड़ा और 7 फरवरी को गीदम को इन विद्राहियों ने अपने कब्जे में ले लिया और तय हुआ कि अब धीरे-धीरे सम्पूर्ण बस्तर से सभी कस्बों पर अधिकार करेंगे। अंग्रेजों के खिलाफ एक महिला का निरंतर विद्रोहियों को संघर्ष के लिए प्रेरित करते रहना अद्भुत साहस का कार्य था।

              आदिवासियों द्वारा लगातार संघर्ष के पश्चात जब भूमकाल का पराभव हुआ। 5 मार्च को अंग्रेजों ने छापेमारी करके रानी सुबरन कुँवर को गिरफ्तार कर उन्हें महल में लाकर नजरबंद कर दिया। बाद में राजमाता सुबरन कुंअर को रायपुर भेज दिया गया जहाँ अक्टूबर 1910 में उनकी मृत्यु हो गई।

     इस तरह बस्तर के इतिहास में कई ऐसी महिला नेत्रियाँ हुईं जिन्होंने बस्तर के लिए, आदिवासी हितों के लिए, अपने राज्य की खुशहाली के लिए अपने प्राणों की भी परवाह न करते हुए संघर्ष कर अपना बलिदान किया। धन्य है उनमें से राजमाता सुबरन कुँवर वे इतिहास में सदैव अमर रहेंगी।