दसमत कैना-
शकुंतला तरार
लोक
कथाएँ, लोक गाथाएँ किसी भी
क्षेत्र की हों वे वहाँ की संस्कृति का संवाहक होती हैं। समय के साथ-साथ उनकी
भावनाओं में आधुनिकता के पुट का भी समावेश होता है। अतः लोक कथाएँ, लोक गाथाएँ वाचिक धरोहर
के रूप में संरक्षित हों इसके लिए हमें इसके मूल स्वरूप को लिपिबद्ध करके देश की, प्रांत की धरोहर बनाने
की आवश्यकता है।
छत्तीसगढ़
में कन्या को लोक भाषा में कैना कहा जाता है। ऐसी ही एक कन्या थी दसमत जो निडर और
साहसी थी। यह कहानी ओडिशा से प्रारंभ होती है और छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में रच
बस जाती है। यहाँ के लोक व्यवहार में दसमत एक ऐसा संसार रचती है कि विश्व फलक पर
ख्यातिनाम हो जाती है। दसमत की विशेषता यह है कि अपनी उपेक्षा के दंश से पीडि़त
होकर वह जीवन को निरर्थक नहीं मानती अपितु अपने ऊपर किए जा रहे आचरण को वह खुले
दिल से स्वीकार भी करती है।
दसमत
का जन्म एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में होता हैं जो ओडि़शा के राजा हंै। उस
ब्राह्मण राजा के कुल 7 लड़कियाँ थीं। पता
नहीं एक दिन राजा को क्या सूझा उसने सभी लड़कियों को बुलाकर पूछा कि ये जो तुम खा
पी रहे हो ये किसके कारण है। छह बहनों ने महाराजा को खुश करने की नियत से हो या डर
से खैर, जो भी हो वे कहती हैं
महाराज आपके कारण। लेकिन छोटी बहन दसमत कहती है पिताजी मैं अपने कर्म के दम पर खा
रही हूँ। राजा को दसमत की ये बात बुरी लगती है। सभासदों के आगे उसके अहम् को चोट
लगती है राजा का तिलमिलाना स्वाभाविक है और फिरसत्ता का अहंकार सत्ता कामद शासक
में न हो यह भला कैसे संभव हो सकता था। चापलूसी भरी बातें सुनने का आदी राजा यह
सहन नहीं कर पाया और क्रोध में आकर उसने दसमत का विवाह एक मजदूर सुदन जो ओडि़या था, के साथ कर दिया जो कि
गरीब होने के साथ ही दिखने में भी कुरूप था। दसमत ने इसे ही नियति मानकर स्वीकार
कर लिया और वह अपने सास,
पति और
देवर के साथ रहने लगी।
उसका
पति अपने भाई के साथ दिन भर पत्थर तोड़ने जाता उससे जो मिलता उसे उसकी मां साहूकार
को देकर खाने पीने का सामान लेकर आती। एक दिन की बात है दसमत अपने पति द्वारा लाए
गए पत्थर के टुकड़े को देखकर अवाक रह जाती है क्योंकि वह पत्थर का टुकड़ा नहीं
हीरा रहता है। चूँकि वह राजा की बेटी थी इसलिए उसे रत्नों का ज्ञान था। तब वह अपने
पति और देवर से पूछती है कि मुझे तुम बताओ काम क्या करते हो तब वे कहते हैं कि हम
दिन भर पत्थर तोड़ते हैं उसमें से जो चमकीला पत्थर छोटा-छोटा निकलता है उसे लाकर
साहूकार को देते हैं। तब दसमत कहती है कि आज मुझे लाकर दिखाना तो कैसा पत्थर है।
दोनों भाई काम पर जाते हैं वह देखते ही जान जाती है कि यह पत्थर हीरा है। तब वह उन
दोनों से साहूकार के घर चलने को कहती है। वहाँ जाकर वह अपने हाथ से पत्थर को
दिखाकर सेठ से पूछती है यह क्या है मुझे बताओ ? उसकी बुद्धिमता देखकर वह सेठ डर से
थरथर कांपने लगता है। पूछती है ये लोग तुम्हें कब से दे रहे हैं बताओ तुम कब से
इनसे ले रहे हो। तब सेठ रखने का स्थान बताकर कहता है ज्यादा नहीं है लगभग दस से
बीस ही होगा। दसमत सब दरवाजा बंद कर देती है और उसके बाद सभी ओडि़या लोगों को
बुलाती है।
नव
लाख ओडि़या नव लाख बेडि़या कुहुक दले बेलदार आहा कुहुक दले बेलदार
नव
लाख ओडि़या के लगे कछेरी,
घमन लगे
दरबार आहा घमन लगे दरबार
आहा
घमन लगे दरबार आहा घमन लगे दरबार
इस
तरह वह उन सारे हीरों को साहूकार से अपने कब्जे में लेती है कुछ सेठ को देकर बाकी
को महंगे दामों में बेचकर एक बड़ा मकान बनाकर रहने लगती है और उडि़या समाज के
मुखिया के रूप में प्रतिष्ठित होती है। अपने सारे रिश्तेदारों को अपने साथ अपने
पास बुलाती है गाँव बसाती है अर्थात तब का वह उड़ीसा क्षेत्र निश्चित ही आज का
देवभोग रहा होगा जहाँ हीरे के खदान हैं।
एक
बार की बात है देवभोग क्षेत्र में अकाल पड़ा। लोगों को भोजन के लाले पड़ गए तब
उडि़या समाज जो अपनी मुखिया दसमत पर निर्भर थे कि दसमत जैसा कहे वैसा ही करेंगे।
इधर दुर्ग के राजा महम देव को तालाब खुदवाना था। कथा अनुसार दसमत अपने पति से धौरा
नगर जिसे वर्तमान में दुर्ग कहा जाता है ले चलने को कहती है -
घाम
घाम कई डेरा देखेंव जोड़ी मन नई लागे हमार
एक
नजर मोला लेग के देखादे धवरा नगर के राज।
फिरदसमत
और उसका पति सुदन समस्त ओडि़या लोगों के साथ धौरा नगर की ओर प्रस्थान करते हैं।
लावलश्कर के साथ चलने पर जो दृश्य उत्पन्न हुआ गायक ने उसका वर्णन इस प्रकार से
किया है -
हंसा
के दल मोर पंड़की परेवना कुर्री के दल भेंगराज
ओडि़या
के दब म चलय रे भाई कंकर पत्थर फूट जाय
धार
नंगर ले उसले डेरा धौरा नंगर बर जाय
आगू
के लाज ला पानी रे पावय पाछू के चिखला खाय
जेखर
पाछू खेखारी गाये धुर्रा म धुर्रा उड़ाय
इस
तरह कथा अनुसार दसमत कैना उसका पति सुदन और नौ लाख ओडि़या नौ लाख ओड़नीन दुर्ग
क्षेत्र में आकर बांध बनाना शुरु करते हैं। कथा के काल क्रम ज्ञात नहीं किंतु राजा
महमदेव 42 गांव का राजा था। दसमत
अपने समाज की छह कोरी यानि 120 महिलाओं को लेकर राजा
के पास औपचारिकतावश भेंट करने जाती है। राजा जब उसे देखता है तब उसकी सुंदरता पर
मोहित हो जाता है और विवाह का प्रस्ताव रखता है। दसमत इन्कार कर देती है।
दसमत
खुद को राजा भोज की बेटी बताती है जो कि भोज नगर का राजा है और महमदेव को रिश्ते
का चाचा बताती है किंतु दसमत पर आसक्त राजा इस बात को नहीं मानता है।
इधर
जब नौ लाख ओडि़या बांध पर काम करते हुए मिट्टी खोदते हैं तब नौ लाख ओड़नीन झउंहा
से मिट्टी ढोने का काम करते हैं। तब उस वक्त राजा कदंब की छांह में बैठकर दसमत को
निहारता रहता है और उसे अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए कंकड़ बीनकर उसकी ओर फेंकता है।
तब दसमत कहती है - एक ढेला मारने पर मुलाहिजा किया भाई दूसरे को हंसी ठट्टा माना
अगर अबके ढेला मारोगे तो दूंगी तुम्हें कुदाली का घाव। राजा महमदेव कहता है दसमत
धूप में तुम्हारा शरीर काला पड़ जाएगा इधर आओ और कदम्ब की छांह में बैठ जाओ। तब
दसमत कहती है कि राजा मैं तो माटी की बेटी हूँ धूप में जन्म लिया है जीवन जिया है
छांह में बैठने पर मेरा शरीर और मन दोनों काला पड़ जाएगा। राजा तरह-तरह के प्रलोभन
देता है अपनी रानियों को छोड़ने की बात कहता है वह 42 गांव उसके लिए छोड़ने को तैयार
है।
दसमत
के बहुत समझाने पर भी जब राजा का हठ जारी रहता है तब वह अपने समाज की महिलाओं को
बुलाकर राजा के हठ की बात बताती है तब वे ओड़नीन कहती हैं कि यदि उनकी जाति की
बेटी से ब्याह करना है तो उनके जैसा रहना होगा उनके साथ मिट्टी ढोना होगा। तब राजा
मिट्टी ढोता है मगर सात बार में ही थक जाता है फिर कहता है ओड़नीन मुझे कोई दूसरा
काम देदे अरे मुझसे गधे चरवा लेना, सुअर
चरवा लेना,
पानी भरवा
लेना, भोजन बनवा लेना। तब
ओडि़या मजा लेते हुए उसे कहते हैं कि अगर हमारी जाति की बेटी पाना है तो हमारी तरह
से मद्यपान करो और मांस भी खाना होगा।
राजा
दसमत को पाने के लिए कहता है कि आज ही खाऊँगा मांस और आज पीयूंगा मदिरा फिर तीर्थ
स्नान करके तुलसी की पूजा करकेफिर से ब्राह्मण बन जाऊँगा।
राजा
खूब शराब पीता है और नशे में चूर हो जाता है उसके बाद खूब नृत्य करता है फिर उसके
आगे सुअर का पकाया हुआ मांस रखा जाता है जिसे वह तारीफ करते हुए खाता है फिर नशे
में धुत्त वहीं खाट पर सो जाता है। तब ओडि़या उसे उसी खाट से बांध देती हैं और
उसकी चोटी को गधी के पूंछ से बांधकर गधी को कोड़ा मार कर भगा देते हैं और सारे
ओडि़या ओड़नीन वहाँ से सुरगीडीह की ओर भाग जाते है और एक रात में ही ओंड़ार बांध
बनाकर सभी नौ लाख ओडि़या ओड़नीन डूब जाते हैं उसी में।
इधर
जब राजा अपने बचाव के लिए रानियों को पुकारता है अपने बेटों को आवाज देता है तब
रानियाँ अपने पुत्रों को रोक देती हैं। यहाँ यह बात जायज लगती है कि सात-सात
रानियों के रहते राजा एक ओड़नीन के पीछे आसक्त हो जाय। उनका क्रोध करना उचित था
किंतु कुछ भी हो राजा उनका पति था सो थोड़ी सहानुभूति ऐसी स्थिति में आवश्यक है।
इधर
राजा का नाई गधी की पूंछ काटकर राजा को बचाता है। तब राजा क्रोधित हो जाता है और
ओडि़या लोगों के प्रति आक्रामक हो जाता है। वह दसमतके पति सुदन बिहइया को मार देता
है। ओडि़या लोगों का डेरा उजड़ जाता है किंतु दसमत को वह बचा लेता है। मगर दसमत
अपने पति के साथ सती होना चाहती है वह अपने पति को पाँच लकड़ी देने के बहाने चिता
के समीप जाती है और वह चिता में जलकर भस्म हो जाती है। यह देखकर राजा उसे बचाने को
दौड़ पड़ता है और पत्थर की ठोकर खाकर उसी
चिता के ऊपर गिर जाता है और उसकी भी मृत्यु हो जाती है। इस तरह एक ही चिता में तीन
लाशें जलती हैं। वर्तमान समय में दसमत कैना की कथा प्रस्तुति रेखा देवार करती है।
यहाँ उल्लेखनीय बात यह है कि वर्तमान समय में हमारे गाथा गायन हों या अन्य प्रचलित
लोक आख्यान इसके गायक गिने चुने रह गए हैं।
दसमत
कैना की समाधि आज भी ओडार बांध के पास है इससे यह अनुमान लगाना उचित प्रतीत होता
है कि दसमत का कार्य क्षेत्र दुर्ग और उसके आसपास ओड़ार बांध जो राजनांदगांव जिला
में स्थित है। इसके अलावा इसकी गाथा देवार जाति बड़े प्रेम से मनोयोग से गाती है
सो इसे जाति आधारित आख्यान जैसे ब्राह्मण राजा की बेटी होना सुदन बिहइया की जाति
का ओडि़या होना,
राजा
महमदेव की भी जाति ब्राह्मण होना यह साबित करता है कि प्रेम न जाति देखती है न
भाषा। लेकिन छत्तीसगढ़ की महिलाएँ अपने हृदय में आंचलिकता को समेटे अपने पति और
परिवार के प्रति एकनिष्ठ होकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती हैं। माता-पिता ने
उसके लिए जो किया उसे वह अपना कर्तव्य और फर्ज समझकर निभाना स्वीकार कर पति में ही
परमेश्वर का रूप देख कष्टों को सहकर भी विचलित नहीं होती तभी तो राजा की पुत्री
दसमत जो सत्य के मार्ग पर अडिग है। वह राजा की कृपा पात्र बनने के लिए सत्य के पथ
से विचलित न होकर निर्भिकता से अपनी बात कहती है। फिर पिता द्वारा क्रोधित होकर
देवार जाति का कुरूप व्यक्ति उसके लिए चुनकर उसका ब्याह कर देने को भी वह अपनी
तकदीर मानकर स्वीकार कर लेती है। ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर राजा की पुत्री होकर
भी वह भूख,
गरीबी और
अभावों के बीच खाना बदोश जिन्दगी जीती है मगर अपनी आन पर, अपने शील पर आंच नहीं आने देती।
भले ही आज हम दसमत कैना की आपबीती को गाथा के रूप में गायन कर रहे हैं किन्तु यह
सत्य से परे नहीं। सारे सबूत आज भी विद्यमान हैं। वह ओडार बांध भी है वे घुमन्तु
जाति देवार भी हैं और सबसे खास बात दसमत कैना की समाधि जो ओडार बांध के निकट
विद्यमान है। अतः धन्य है छत्तीसगढ़ की वह नारी जिसने अपनी मर्यादा की खातिर पति के
साथ सती हो जाना स्वीकार किया किंतु कभी किसी पुरूष की संगिनी बनना नहीं। वह अंत
तक अपने पति के प्रति समर्पित थी उसका साथ पूरे समाज ने यानि नौ लाख ओडि़या नौ लाख
ओड़नीन ने दिया दसमत मर कर भी अमर हो गई।
ए
सींयरी दीनानाथ
अरे
नौ लाख ओडि़या नौ लाख ओड़नीन डेरा परे सारी रात
अब
यहाँ सवाल ये उठता है कि जिस काल की ये गाथा इतिहासकारों ने बताया है क्या वह
सत्यता के निकट है ?
क्या उस
समय ओडिया लोगों की जनसंख्या नौ लाख ओडिया $ नौ लाख ओडनिन त्र 18 लाखकी जनसंख्या रही
होगी या यह केवल गायन की सरलता के लिए नौ शब्द का प्रयोग किया गया। आज ओडार बाँध
अस्तित्व में है यह सभी जानते हैं इसलिए यह भ्रम भी नहीं हो सकता कि ऐसी कोई
मनगंढ़त कथा होगी। दसमत कैना तो देवार लोक गायक ही बरसों से गाते चले आ रहे हैं
अर्थात हम यह कह सकते हैं कि यह देवार जाति की जातिगत लोक गाथा है। इसलिए इसके
अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता। हाँ यह बात अलग है कि भिन्न-भिन्न
गायकों की गायकी में गाथा के विस्तार के बीच-बीच में भिन्नता परिलक्षित होती है।
किन्तु कथा का मूल स्वरूप वही है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि आज हम जिस भी गाथा
को सुन व पढ़ रहे हैं वह हमारे लोक गायकों ने मौखिक रूप से वाचिक परंपरा के तहत
जीवित रखा है भौतिक सुख सुविधाओं से परे जब मानव जीवन था तब लोगों की अपनी चैपाल
हुआ करती थी जहाँ दुःख की बातें किस्से कहानियाँ गढ़ी जाती थी और होता था लोकाचार।
इसी
लोकाचार के तहत गाथाओं का गायन किया जाता था और लोग वाचिक परम्परा का निर्वाह करते
हुए अपने बड़ों का अनुसरण करते थे तभी तो आज तक ऐसी कई गाथाएँ हैं जो हमारे सम्मुख
चुनौती के रूप में खड़ी हैं।

No comments:
Post a Comment