जय माँ दंतेश्वरी
-1-एक भाषा के मरने पर एक संस्कृति का क्षरण हो जाता है –सन्दर्भ
हल्बी
30-07-2026 -कही अनकही में छप चुका है
किसी भी अंचल के विकास का मापदंड वहाँ की कला, साहित्य और सांस्कृतिक उत्कर्ष पर अवलंबित होता है । हमारा
यह जो छत्तीसगढ़ अंचल है ना यहाँ की धानी धरती अपने गर्भ में अकूत नैसर्गिक
सम्पदा और वैभव छिपाये हुए है तो लोक कलाओं ,लोक संस्कृति, लोक साहित्य, परम्पराओं
का अक्षय भण्डार भरा होने का गौरव भी इसे विरासत में मिला है |
अपने सांस्कृतिक वैभव पुरातात्विक धरोहरों एवं भौगोलिक
विशेषताओं के कारण सम्पूर्ण विश्व में अपनी अलग पहचान रखता है छत्तीसगढ़ अंचल का यह
बस्तर संभाग | सामजिक रहन-सहन, पूजा पद्धति, संस्कार परम्पराओं के कारण इसका अलग
ही आकर्षण है | यह एशिया महाद्वीप का सबसे बड़ा ‘’आदिवासी’’ अंचल है |
यहाँ निवास करने वाले मुरिया, माड़िया, अबूझमाड़िया, दण्डामी माड़िया, हल्बा, भतरा, धुरवा, गदबा, गोंड, दोरला
जनजातियों के साथ ही, अन्य पिछड़ी जातियों में कोष्टा, कलार, धाकड़, पनारा, राउत, केंवट, कुम्हार, घसिया, पनका, लोहार, गाँडा, माहरा इत्यादि यहाँ की मूलतः
निवास करने वाली जातियाँ हैं | बस्तर से बाहर के लोगों को यदि छोड़ दें तो सभी जातियों-जनजातियों के रहन-सहन, खान –पान लगभग एक जैसे ही हैं |
रही बात सीमावर्ती भाषाओं में हल्बी के स्थान की तो, पूर्व में उड़ीसा, दक्षिण में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना , पश्चिम में महाराष्ट्र से लगे
होने के करण यहाँ आपको ओड़िया संस्कृति, तेलुगु
संस्कृति एवं मराठी संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है | ओडिया भाषा के संपर्क संसर्ग से भतरी लोक भाषा विकसित
हुई और साथ ही बामनी बोली भी | दक्षिण में आंध्र व तेलंगाना के
राज्य के संपर्क से गोंडी ,दोरली, माड़ी लोक
भाषा का विकास हुआ | हल्बी लोक भाषा में ओड़िया, मराठी
और संस्कृत का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है | आप यदि
भोपालपट्टनम , बीजापुर की तरफ जाएँगे तो हल्बी के साथ ही गोंडी लोक भाषा बोलने वालों
की संख्या ज्यादा पाएँगे |
यहाँ व्यवहृत बोलियों में प्रमुख रूप से हल्बी , गोंडी, माड़िया, बस्तरी, धुरवा, भतरी के अलावा अनेक जातिगत लोक
भाषा, बोलियाँ भी व्यवहार में लाई जाती हैं | किन्तु “हल्बी” बस्तर की प्रमुख संपर्क लोक भाषा है अब छत्तीसगढ़ी भी
बोली जाने लगी है |
डब्ल्यू ए ग्रियर्सन ने 1936 में लिखा है कि बस्तर में उनकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से
हुई जो बस्तर की 36 बोलियाँ
जानता था। आज वे सभी बोलियाँ कहाँ गईं, किसी को नहीं पता। अगर बस्तर की लोक भाषा , बोलियों की ऐसे ही उपेक्षा होती रही तो ये भी कब विलुप्त हो
जाएँगी, पता भी नहीं चलेगा।
हल्बी बस्तर क्षेत्र में बहुतायत से निवास करने वाले हल्बा
लोगों की मुख्य भाषा है। यह एक आर्य बोली है एवं भाषा शास्त्री इसे पूर्व हिन्दी
भाषा के अंतर्गत रखते हैं । मुझे याद है पति की नौकरी के दौरान मेरे पड़ोस में एक
रीवाँ निवासी रहते थे जब कपड़ों की गंदगी की बात करते तो कहते एत्तो रोंगट एत्तो
रोंगट इसी को हल्बी में हम कहेंगे इतरो रोंगट रली या खूबे रोंगट होलिसे | अर्थात भाषा बोलियाँ एक दूसरे प्रान्त से इतनी गुम्फित हैं
कि विद्वान यह दबाव नहीं डाल सकते कि हल्बी लोक भाषा इस भाषा का अपभ्रंश है या इस
भाषा से बनी है | किन्तु हल्बी लोक भाषा का स्वतन्त्र अस्तित्व था, है और रहेगा |
हल्बी की उत्पत्ति हल्बा लोगों की उत्पत्ति से जुड़ी
हुई है। हल्बी एक संपर्क भाषा के रूप में विकसित हुई है | इसमें
संस्कृत, हिन्दी, मराठी,अवधी, छत्तीसगढ़ी, फारसी इत्यादि भाषा के शब्दों
का समावेश है। छिंदक नागवंशी राजाओं के शासन काल से ही हल्बा बस्तर क्षेत्र में
निवास किया करते थे आज भी वे अपने को नागवंश का ही मानते हैं । काकतीय नरेशों के
शासन काल में हल्बा जनजाति विश्वसनीय सैनिकों का कार्य किया करते थे।
अतः इस सम्बन्ध में मेरा मानना है कि ---- किसी भी भाषा में लोक तत्वों का समावेश होना
जरूरी है। “जब तक जंगल है गाँव है, जब तक गाँव है तब तक लोक है ,जब तक लोक है तब तक गाँव है ”वहीँ“ जब तक गाँव है तब तक भाषा है, जब तक भाषा है संस्कृति जिंदा रहेगी” | यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि एक भाषा के
मरने पर एक संस्कृति का क्षरण हो जाता है | बिना संस्कृति, बिना लोक दिग्दर्शन के भाषाई
सौंदर्य का दर्शन कठिन है।

No comments:
Post a Comment