Saturday, December 21, 2013

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''जहाँ भोर होते अम्मा आँगन बुहारे ----साथियो  गीत के बोल से ही आप समझ गए होंगे कि यह गाँव के परिवेश पर आधारित गीत है चूँकि गाँव मेरा प्रिय विषय है तो मेरा हर तीसरा चौथा गीत ग्राम्यांचल को रेखांकित करता हुआ होता  है। ''

Thursday, December 19, 2013

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छत्तीसगढ़ की गंगा महानदी जो जीवन दायिनी है कहाँ से निकलती है और कहाँ गिरती है उस पर केंद्रित एक गीत महानदी की धारा हूँ मैं महानदी की धारा हूँ

Monday, December 9, 2013

विगत दिनों  प्रिंट मीडिया और इलेक्टॉनिक मीडिया की  कुछ महिला पत्रकारों ने एक दूसरे से मुलाक़ात की --- यह छत्तीसगढ़ की महिला पत्रकारों के लिए सुखद संकेत है 


डॉ रमन सिंह --चांउर वाले बाबाजी ला मोर डाहर ले जय जोहार ----डॉ साहाब आपोमन ला चाउंर लेये बर परथे कि नहीं--- एला तो मंय आज तक ले गम नी पाय हववं --फेर बबा गा ए दरी दू रूपया ले ऊपर उठके अपन मध्यमवर्ग के बहिनी मन के घलो चिंता कर डारहु काबर की हमन चालीस ले ब्यालीस रूपया मा चांउर लेथन अउ चिंता के मारे मोटाय मरत हन। ....... शकुंतला तरार

Monday, December 2, 2013

अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा विरोधी दिवस पर एक दिवसीय सम्मलेन के कार्यक्रम में मंचस्थ अतिथियों ने महिलाओं पर किये जाने वाले  घरेलु हिंसा पर अपने विचार रखे उक्त अवसर  का चित्र 

Thursday, November 28, 2013

''आरुषि होने के मायने''
दस से सोलह वर्ष का उम्र, बच्चों के जीवन में नए मोड़ देने का संकेत है ..इन चार-छै सालों  में बच्चों का शारीरिक-मानसिक विकास तेजी से होने लगता है. उन के पास सिर्फ पढाई के अलावा भी बहुत कुछ जानने- समझने  के लिए होता है। यही वह समय है जब वे  अपने शरीर में, अपने जीवन में बदलाव महसूस करते  हैं । खासकर लड़कियां जो होती हैं, जो बच्चियां हैं उनमे शारीरिक बदलाव होने लगते हैं वे घबरा जाती हैं  कि उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है, इस होने वाले बदलाव के बारे में वे अपनी माँ से बात करना चाहती हैं. उन्हें  लगता है कि पल-पल उनके इस बदलाव की  साक्षी उनकी माँ  बने। उस वक़्त किसी भी बच्ची को माँ के लाड़-दुलार कीमाँ  के स्नेह की  आवश्यकता होती  है ताकिवह उन आने वाले परिवर्तनों से भयभीत होने के बजाय उनका साक्षात्कार करने को तैयार रहे, मगर जब इस वक्त बच्चियां  स्वयं  को अकेला पाती हैं तो अपना कोई हमराज़ ढूंढने लगती  हैं, उन्हें पल-पल  भारी होने लगता है तब उनके पास अपनी बात बताने के लिए माँ नहीं बल्कि आया होती है, वे  अपने भीतर के परिवर्तनों से घबराने लगती हैं , अपनी बात को साझा करना चाहती हैं  मगर किससे कहें फिर वे  अपनी सखी सहेलियों से कहेंगी  ..अब वह ज़माना तो नहीं रहा कि जहाँ बच्चे दादी, नानी, ताईचाची के बीच रहकर कुछ सीखें, संयुक्त परिवार का दौर अब रहा नहीं जहाँ भाई-बहन, बड़ी बहन, छोटी बहन, बीस पच्चीस लोग एक ही घरों में हुआ करते थे, आज एकाकी परिवार के बच्चों में उन्मुक्तता ज्यादा बढ़ रही है इसका एक कारन यही है कि अभिभावकों के पास बच्चो के लिए समय का अभाव है ..बच्चों से ज्यादा उन्हें अपना प्रोफेशन प्यारा होता है उनकी अथाह संपत्ति कमा लेने की चाह और अभिजात्य जीवन से बच्चों को नौकर नौकरानियों का साथ मिलता है ...
महानगरों में या बड़े शहरों के उच्च वर्गीय परिवारों के बच्चों की स्थिति यह है कि वे अपने माता-पिता के साथ समय बिताने के लिए तरस जाते हैं स्कूल से लौटने पर बच्चों को नुपुर छनकाती दरवाजे पर उनके आने की बाट  जोहती माँ जिससे वह मनुहार करे, दिल की  बातें कह सके, पर यह माँ जैसे कोई दिवा स्वप्न जैसी है किताब की  लिखी कहानियों की तरह नहीं यह माँ, जो उससे लाड़  लड़ाये ....तब उसका सामना होता है घरेलु नौकर या नौकरानी से, मन की  उत्कंठा मन के भीतर ही दब जाती है वहाँ न माँ होती है न माँ की ममता, न प्यार न झिड़की, न माँ के हाथ के चावल-दाल-फुलके ...फिर जब उनका आगमन होता है तो सिर्फ औपचारिकता, आपने होमवर्क किया या नहीं , आप अब तक सोये नहीं ,आपने  खाना खा लिया , जल्दी सो जाओ  सुबह स्कूल जाना नहीं है क्या ? इतनी रात गए तक टी वी  क्यों देख रहे हो  यानि शिकायतों का अम्बार।  तब बच्चे का मन करता है काश ! माँ आज आपने मेरे सर पर हाथ रखकर मेरा हाल चाल तो पूछा होता , मेरे मनोभावों को जाना होता , मगर यहाँ न झिड़की, न स्नेह भरा स्पर्श, न सर पर  हाथ या ऐसा कि चल मैं आज तुम्हारे साथ सो जाती हूँ किशोरवय बच्चों के मन के भावों को वे समझ सकें ऐसा कम ही होता है या वे जानबूझकर समझना नहीं चाहते। एक समय ऐसा भी आता है जब     बच्चे को  माँ बाप की  झिड़की अच्छी नहीं लगती वह अपने ही मन का करने का आदि हो जाता है ...  टी वी चैनल, इंटरनेट पर परोसे गए विविध अश्लीलता से उसका साक्षात्कार होता है मन की  उत्कंठा पतन की  ओर अग्रसर करती है वैसे भी विपरीत सेक्स के प्रति खिंचाव महसूस करना मानव प्रवृत्ति है  तब वहाँ मार्गदर्शन देने के लिए अभिभावक नहीं बल्कि पेट्रोल को चिंगारी मिलती है और तब हश्र होता है आरुषि हेमराज हत्याकांड के रूप में ...यहाँ आरुषि ऐसी अकेली बच्ची नहीं इन जैसी न  जाने  कितनी बच्चियाँ हैं जो समय से पहले ही जवान हो जाती  हैं। आरुषि के साथ जो हुआ उसकी पुनरावृत्ति न हो इसके लिए उन अभिभावकों को सचेत होकर अपने बच्चों के लिए  समय निकालना ही होगा ..वे  अपने पारिवारिक, सामाजिक दायित्वों को सिर्फ रुपयों की खनक के आगे भूल न जाएँ  ....सबक लेना होगा उन अभिभावकों को जो अपने व्यवसाय को अहम् मानते हैं ,ठीक है किन्तु अपनी ज़िम्मेदारियों से मुँह न मोड़ें, दोस्तों की  महफ़िल उन्हें प्यारी होती है शराब शवाब की रंगीनियां उन्हें भाती  हैंबच्चे तो वे इसलिए पैदा करते हैं कि यह वैवाहिक जीवन की महती  आवश्यकता है और आगे चलकर ये बच्चे उनकी संपत्ति का भरपूर उपयोग कर सकें, ऐश्वर्य से भरा जीवन जी सकें, किन्तु … 
   एक आरुषि हेमराज के मारे जाने  से यह सिलसिला थम नहीं सकता क्योंकि आरुषि होने के मायने हैं  अभिजात्य वर्ग और उससे जुडी विडंबनाएँ .......
शकुंतला तरार  स्वतंत्र पत्रकार

Tuesday, November 12, 2013

पुस्तक विमोचन संपन्न

रायपुर / 12 -11 -2013 / श्रीमती रीता  वेणुगोपाल, प्रो - शारीरिक शिक्षण विभाग पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय ,की  अध्यक्षता श्री सतीश जैन ,  छत्तीसगढ़ी फ़िल्म निर्माता, निर्देशक के  मुख्य आतिथ्य , एवं श्री लक्षमण मस्तुरिया कवि,गीतकार  श्री रामेश्वर वैष्णव कवि,गीतकार,श्री जीवेश   प्रभाकर साहित्यकार के विशिष्ट आतिथ्य में प्रवेश भट्ट के  उपन्यास विम्बलडन-----ज़िंदगी और जीत  का विमोचन कार्यक्रम प्रेस क्लब , मोती  बाग़, रायपुर के सभागार में  संपन्न हुआ।  कार्यक्रम का शुभारम्भ कवयित्री  लतिका भावे के सरस्वती वंदना से हुआ सञ्चालन किया कवयित्री ,पत्रकार शकुंतला तरार ने।  आयोजन के मुख्य वक्ता थे--श्री कृष्ण कुमार भट्ट साहित्यकर, डॉ राजेश कुमार मानस ,एवं तुलसी देवी तिवारी ----यह आयोजन ''सन्दर्भ'' साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था द्वारा किया गया था --------। 










Monday, November 11, 2013

vimochan samaroh

साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था द्वारा  आयोजित ओमप्रकाश भट्ट के  उपन्यास 'विम्बल्डन  … ज़िन्दगी और जीत '' का विमोचन छत्तीसगढ़ के   प्रसिद्द   निर्माता निर्देशक सतीश जैन के कर कमलों से संपन्न हो रहा है इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी मुझे भी बनाया गया है।  कार्यक्रम का सञ्चालन मेरे द्वारा संपन्न होना तय किया गया है 






Wednesday, October 30, 2013

साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका ''नारी का संबल '' का जुलाई- सितम्बर अंक  के रचनाकार। … मुखपृष्ठ पर बस्तर का आदिवासी बालक चेंदरू के 1 9 5 7 के आसपास की तस्वीर। …. कुछ दिनों पूर्व ही इस बस्तरिया टार्जन का देहांत हुआ है 76 साल की उम्र में निपट गरीबी और अभावों के बीच -----
26 अक्टूबर  कवयित्री सम्मलेन का समाचार dainik bhaskar

Saturday, October 26, 2013

 बहुत याद आते हैं स्कूल के वे दिन-------------  मेरी दो सहेलियाँ मेरे दायें मंजुला और बाएं संगीता अरे हाँ भई सही पहचाना मैं बीच में ही हूँ। .... ग्यारहवीं क्लास की फ़ोटो 

Friday, October 25, 2013

राष्ट्रीय  किताब मेला में राज्य स्तरीय  कवयित्री सम्मलेन संपन्न 

टॉपर्स एजुकेशन सोसायटी द्वारा 18 से 28 अक्तूबर तक चलने वाले राष्ट्रीय किताब मेला  में  ---साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका ''नारी का संबल'' द्वारा राज्य स्तरीय  कवयित्री सम्मलेन का आयोजन किया गया था। कवयित्री सम्मलेन में प्रमुख रूप से  शकुंतला तरार , लतिका भावे ,रेवा रानी  मंडल, सीमा श्रीवास्तव, नीता  श्रीवास्तव,मधु सक्सेना , गीता विश्वकर्मा, संध्या नलगुंडवार ने अपनी प्रस्तुति से दर्शकों, श्रोताओं की खूब तालियाँ बटोरीं।  श्रोताओं ने इस कार्यक्रम की बहुत सराहना की --कार्यक्रम का सफल सञ्चालन किया शकुंतला तरार ने ---। 
इस कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही की अब से प्रतिवर्ष राष्ट्रीय  पुस्तक मेला  में ''नारी का संबल'' के द्वारा कवयित्री सम्मलेन का आयोजन किया जावेगा और इसे अखिल भारतीय  कवयित्री सम्मलेन का स्वरूप प्रदान किया जावेगा। 

Tuesday, October 1, 2013

  जन्म -2  अक्तूबर
            हाजी हसन अली  हसन      
धानी धरती छत्तीसगढ़  जिस तरह  अपनी हरियाली, अपनी   खेती  के लिए मशहूर है, वन, खनिज, प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर है यहाँ का रहन-सहन,खान-पान, भाषा -बोली, हंसी-ठिठोली,लोक गीत, साहित्य संस्कृति पूरी दुनिया में प्रसिद्द है , ठीक उसी तरह हमारे यहाँ बहुत सारी  महान विभूतियाँ हुईं जिनका मूल्याङ्कन छत्तीसगढ़ बनने के बाद से किया जा रहा है । ऐसे ही एक विभूति थे मुस्लिम संप्रदाय के रहनुमा हाजी हसन अली ।
            हाजी हसन अली हसन का जन्म आज ही के दिन यानि 2  अक्तूबर सन 1913 को रायपुर में हुआ था। आपके पिता डी बी खमिसा एक अच्छे शायर रहे और आपकी माताजी सक़ीना  बानो को समाज सेवा करने में ख़ुशी होती थी अतः शायरी और समाज सेवा यह दोनों आपको विरासत में मिली। आपकी शिक्षा दीक्षा उर्दू माध्यम से हुई और आपने बी ए तक  की डिग्री हासिल की । उर्दू की सेवा करते हुए आपने उर्दू जैसे कठिन लिपि और ज़बान को लोगों तक पहुंचाने के लिए सरल  और सुगम तरीक़ा  अपनाकर --उर्दू कैसे सीखें, हिंदी से उर्दू सीखें, और लिखना -पढ़ना उर्दू कैसे सीखें जैसी क्किताबें लिखीं जो की हिंदी और उर्दू दोनों के लिए रह आसन हो सके 
             आप समाज सेवा के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे । अंजुमने पंजतनी के आप अध्यक्ष रहे और सद्र की हैसियत से आपने आल इंडिया उर्दू कांफ्रेंस कार्यान्वित किया । उर्दू की खिदमत करने उसे बढ़ावा देने -प्रसार करने के लिये  आपने 1972 में मदरसा स्कूल की बुनियाद रखने के साथ ही ग़रीबों और पिछड़े वर्गों की हौसला अफजाई के लिए ईनाम देने की भी शुरुआत की । समाज सेवा और उर्दू की सेवा करने के लिए आपको कई सम्मान मिले जिनमे--महाफ़िज़े उर्दू, अदबे उर्दू, उर्दू रत्न, रहे उर्दू, उर्दू की जान और शान आदि थे।
आपने हमेशा कवियों एवं शायरों की हौसला अफजाई करते रहे । आप समझते थे की उर्दू केवल मुसलमानों की ज़बान नहीं बल्कि हिंदुस्तान की भी ज़बान है . आप वतन परस्ती और  क़ौम की ख़िदमत में  रहे  उर्दू  के लिए आजीवन  फ़िक्रमंद रहे । आपके चार पुत्र और तीन पुत्रियाँ थीं ।
                 पुत्र  इनायत अली छत्तीसगढ़ राज्य अल्प संख्यक आयोग के अध्यक्ष रहे ..और हाजी मोहसिन अली सुहैल अंतर्राष्ट्रीय शायर वरिष्ठ पत्रकार हैं और आपकी रचनाओं को समाज के आगे लेन का अभिनव कार्य कर रहे हैं । कहीं  धूप कहीं छाँवऔर मिरास -ए -हसन आपकी ग़ज़लों,नज़्म,क़तआत,अशआर  की दो किताबें उन्होंने प्रकाशित की है ।
                   छत्तीसगढ़ सरकार ने उर्दू अदब के प्रचार-प्रसार के लिए छत्तीसगढ़ के शायरों और अदीबों को हाजी हसन अली सम्मान से प्रतिवर्ष राज्य स्थापना दिवस पर दो लाख के सम्मान से सम्मानित करती है ।
आपके चंद अशआर, नज़्म ----
 पैदा हुए हैं हम तो मोहब्बत के वास्ते
हम ज़िन्दगी लुटाएंगे भारत के वास्ते ।\

कौन जलवानुमा है तुम्हारी तरह
तुम हो या आइना है तुम्हारी तरह ,
ज़ेरेलब गुनगुनाती हुई हर कली
आज नगमा सारा है तुम्हारी तरह । ।

आग ख्वाबों में लगी है इन दिनों
रौशनी ही रौशनी है इन दिनों
दर्द का सूरज चमकता ही नहीं
बर्फ आँखों में जमी है इन दिनों । ।

Wednesday, September 18, 2013

एक ग़ज़ल आप सबके लिए….

उनके सपने बिखरने लगे
आशियाने उजड़ने लगे

प्यार से जो बनाया था घर 
कंक्रीटों में बदलने लगे

शाम ढलते ही रोया बहुत
अपने साये बिछुरने लगे

गाँव के खेत खलिहान घर
राजधानी में ढलने लगे

पाके दौलत अचानक युवा
आदतों से बिगड़ने लगे …… शकुंतला तरार

Sunday, August 11, 2013

छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला सांसद स्व. मिनी माता के 41 वाँ स्मृति दिवस समारोह आज 11 अगस्त को  प्रदेश में बड़ी धूमधाम से मनाया गया। ।इस अवसर पर प्रदेश की विभिन्न क्षेत्रों की  प्रतिभाशाली महिलाओं का सम्मान किया गया -----इस अवसर पर आज  गुरु घासीदास साहित्य एवं संस्कृति अकादमी,रायपुर (छ.ग.) द्वारा कृषि राज्य मंत्री भारत सरकार मान. डॉ. चरणदास महंत जी एवं महापौर डॉ किरणमयी नायक के करकमलों से   साहित्य और पत्रकारिता के लिए शकुंतला तरार  (मेरा  सम्मान) चिकिसा के क्षेत्र से डॉ पद्मिनी सोनवानी, समाज सेवा से डॉ शुभांगी आप्टे का सम्मान किया गया  
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Wednesday, August 7, 2013

 सावन के छै दोहे------------   


1 - सावन की लगे झरी, बरसे नेह फुहार

 रूठ गए मोसे पिया ,फीकी लगे फुहार  


2 - युग युग से बरस रहे,  ले बूंदन के हार
पिया बसे परदेस में, फीकी लगे फुहार 


3 - झूले बंध गए अमुवा, रिमझिम रस के हार
नेह झरे जियरा जरे.  फीकी लगे फुहार 


4 -नेह भरा अनुबंध है, अनुबंधी सिंगार  

आँख मिचौली सावनी,  फीकी लगे फुहार

5 - टूटा छप्पर भीगा मन, आफत बरसे द्वार

 धुंधलाई आँखों से, फीकी लगे फुहार 


6 - सखियाँ मिल किलोल करें, मन के खुले किवार 

आवारा सावन हुआ] फीकी लगे फुहार  शकुंतला तरार 

Tuesday, July 30, 2013

छत्तीसगढ़ के रामगिरी पर्वत  स्थित सीता बेंगरा  और जोगी मारा  की गुफाएं  जहाँ विश्व की सबसे प्राचीनतम नाट्यशाला है। …यहीं  सम्राट  अशोक के समय के दो भित्तिलेख हैं जो पाली अक्षर में अंकित हैं जिसमे  देवदासी सुतनुखा द्वारा  बनारस के देवीदीन नामक रूपदक्ष के प्रणय निवेदन को अस्वीकार करने पर कवि द्वारा लिखी गई है। ।सथ ही यह वह ऐतिहासिक जगह है जहाँ महाकवि कालिदास ने मेघदूतम की रचना की थी >…… शकुंतला तरार





Saturday, July 13, 2013


 
1अगस्त जन्म जयंती पर 
 ''मीना कुमारी -प्यार के एहसास से दर्द के समंदर तक '' 
टुकड़े -टुकड़े दिन बीता धज्जी-धज्जी रात हुई 
जिसका जितना आँचल था उतनी ही सौगात मिली ।। 
         माहज़बीं बानो अर्थात मीना  कुमारी असाधारण व्यक्तित्व की मलिका  थीं  मीना कुमारी की नानी विश्व गुरु कविवर रविन्द्र नाथ टैगोर की भतीजी थी   मां  प्रभावती  देवी पारसी रंगमंच के कलाकार अलीबख्श से   निकाह कर इकबाल बानो हो गईं  आशिक मिज़ाज पिता की वजह से परिवार आर्थिक तंगी के दौर से गुजरने लगा और गुड्डे गुडिया खेलने की उम्र में मीना कुमारी को संवादों से खेलना पड़ा  
 दर्द में डूबा हुआ इन्सान क्या चाहता है वह किसी की सहानुभूति या उसके स्पर्श मात्र से ज़िन्दगी के सरे गम भुला देना चाहता है  उसी को वह अपना मजबूत सहारा मान लेता है यही हुआ मीना  जी के साथ भी  कमाल अमरोही की सहानुभूति ने दोनों को एक दूसरे के करीब ला  दिया और दोनों ने इस रिश्ते को विवाह के बंधन में बांध लिया   मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था तकदीर ने एक बार फिर से छला और दोनों अलग हो गए  फिर तो मीना  ने अपने दर्द का साथी शराब को बना लिया कुछ इस तरह की कि '' दर्द में डूबा हुआ एक गीत अब मैं हो चली ।''  
वही दर्द  उनके द्वारा निभाए गए विभिन्न किरदारों में साफ नज़र आता है  भला साहिब बीवी और गुलाम की छोटी बहू  को कभी भुलाया जा सकता है जिसमें उन्होंने  एक ऐसी पत्नी का चरित्र निभाया जो पति के इंतजार में पलक पावडे बिछाये रहती है तरह-तरह के श्रृंगार कर उसे रिझाने का प्रयत्न करती है ;किन्तु  बेवफा 
पति उसे अकेली तडपता छोड़ जाता है | बहू बेगम की मीना स्मरणीय है  पाकीजा की मीनाकुमारी ने दर्द की उस सीमा को छुआ जहाँ तक पहुँचने के लिए आज की अभिनेत्रियाँ तरस जाती हैं  जो कुछ कहना है उसकी 
भाव प्रणव आँखें ही सब कुछ कह जाती। उनके भीतर के उसी दर्द ने उनके किरदारों को उठाने में स्तम्भ के रूप में काम  किया है  

          मीनाकुमारी जितनी ही अच्छी अदाकारा थीं उतनी ही अच्छी शायरा भी थीं उनकी गज़लें , उनके एक -एक
 शेर , नज़्म ....ऐसा महसूस होता है जैसे एक-एक शब्दएक-एक जज़्बात  दर्द से निचोड़ कर लिखा गया हो ...वे कहती हैं ....
चाँद तन्हा है ये जहाँ तन्हा 
दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा 
बुझ गई आस छुप गया तारा 
थरथराता रहा धुआं तन्हा 
 मीना जी गुलज़ार साहब पर भरोसा किया करती थीं तभी तो उन्होंने  अपनी सारी  ग़ज़लों और नज्मों को 
 गुलज़ार साहब के नाम वसीयत कर दिया था और कहना  होगा  कि गुलज़ार साहब ने भी उस वसीयत की पूरी देखभाल की , ...उसे दुनिया के आगे ला खड़ा किया '' मीना कुमारी की शायरी ''  के नाम से हिन्द पॉकेट बुक्स ने उसे छापा है ........वे कहते हैं कि ....मैं , इस मैं से मैं बहुत डरता हूँ  शायरी मीना जी की है फिर मैं कौन?  मीना जी की वसीयत में पढ़ा की अपनी रचनाओं , अपनी डायरियों के सर्वाधिकार मुझे दे गई हैं  हालांकि उन पर अधिकार  उनका भी नहीं था, शायर का हक़ उनका शेर भर सोच लेने तक तो है ;कह लेने के बाद उस पर हक़  लोगों का हो जाता है   मीना जी की शायरी पर वास्तविक अधिकार तो उनके चाहने वालों का है और वह मुझे अपने चाहने वालों के अधिकारों की रक्षा का भार  सौंप गई हैं   
बतौर हिरोइन 1946 में उनकी पहली फिल्म  ''दुनिया एक सराय '' से लेकर 1971 में आई पाकीज़ा तक का 
लम्बा सफ़र उन्होंने  तय किया   बैजू बावरा 1 9 5 4 , परिणीता 1 9 5 5 ,साहिब बीवी और गुलाम  1 9 6 3 और काजल 1 9 6 6 के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला था  वे एक सर्वश्रेष्ठ अदाकारा होने के साथ ही साथ एक अच्छी शायरा  भी थीं ,उन्हें  श्रद्धांजलि देते हुए उन्हीं की चंद पंक्तियों से लेखनी को विराम देती हूँ कि ....
ये रात ये तन्हाई 
ये दिल धड़कने की आवाज़ 
ये सन्नाटा 
ये डूबते तारों की  
खामोश ग़ज़ल रवानी 
ये वक़्त की पलकों पर 
सोती हुई वीरानी 
जज़्बात  मुहब्बत की 
ये आखिरी अंगडाई 
बजती हुई हर जानिब 
ये मौत की शहनाई 
सब तुम को बुलाते हैं 
पल भर को तुम  जाओ 
बंद होती मेरी आँखों में 

मुहब्बत का इक ख्वाब सजा जाओ ......... शकुंतला तरार